बिजनेस स्टैंडर्ड - कानूनी पेच में अटकीं दूरसंचार फर्में
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कानूनी पेच में अटकीं दूरसंचार फर्में

सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली 01 15, 2019

दूरसंचार क्षेत्र

दूरसंचार कंपनियों को करना पड़ सकता है 1,500 अरब रुपये का भुगतान
900-1,000 अरब रुपये लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम उपयोगकर्ता शुल्क तय करने के लिए एजीआर की परिभाषा
400-500 अरब रुपये एकमुश्त स्पेक्ट्रम शुल्क
250 अरब रुपये बीटीएस के उन्नयन पर ईएमएफ जुर्माना

बिजनेस स्टैंडर्ड कानूनी पेच में अटकीं दूरसंचार फर्मेंभारतीय दूरसंचार कंपनियां एक ऐसे टाइम बम पर बैठी हैं जो कभी भी फट सकता है। सरकार ने इन कंपनियों पर अपना बकाया वसूलने के लिए उच्चतम न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों में मामले दायर किए हैं। अगर अदालत का फैसला कंपनियों के खिलाफ आता है तो उन पर 1,250 अरब रुपये से 1,500 अरब रुपये तक की चोट पड़ सकती है। सरकार और कंपनियों के बीच विभिन्न मुद्दों पर कई वर्षों से विवाद चल रहा है।  इस दौरान विभिन्न अदालतों और पंचाटों में इन मुद्दों पर कई उतार-चढ़ाव आए हैं। ये विवाद समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) की परिभाषा, एकमुश्त स्पेक्ट्रम शुल्क के भुगतान और बीटीएस टावरों के उन्नयन पर स्व-प्रमाणपत्र जमा नहीं कराने पर जुर्माने से संबंंधित हैं।

एजीआर के आधार पर ही लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम उपयोगकर्ता शुल्क (एसयूसी) का निर्धारण किया जाता है जिसका कंपनियों को हर साल भुगतान करना पड़ता है। एकमुश्त स्पेक्ट्रम शुल्क को कंपनियों ने अदालत में चुनौती दी थी। इस तरह मुकदमा हारने की स्थिति में दूरसंचार कंपनियों को न केवल बकाये का भुगतान करना होगा बल्कि जुर्माना और भारतीय स्टेट बैंक की उधारी दर से दो फीसदी अधिक दर से ब्याज का भी देना पड़ेगा। 

दूरसंचार कंपनियों पर अभी 7,000 अरब रुपये से अधिक का कर्ज है। वित्त वर्ष 2018 में उनका सालाना सकल राजस्व 2,500 अरब रुपये के आसपास रहने की संभावना है जिसमें से उनका एबिटा मार्जिन 20 से 22 फीसदी यानी करीब 550 अरब रुपये है। इस तरह इन कंपनियों को अपने एबिटा का करीब तीन गुना सरकार को देना पड़ सकता है। किसी भी कंपनी ने अपनी बैलेंस शीट में इस राशि के भुगतान के लिए कोई प्रावधान नहीं किया है, इसलिए प्रतिकूल फैसले की स्थिति में उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।

सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक राजन मैथ्यू ने कहा, 'उद्योग के लिए स्पेक्ट्रम भुगतान की स्थगित देनदारी को चुकाना मुश्किल हो रहा है और अब अगर उसे बाकी भुगतान भी करना पड़े तो उसकी कमर पूरी तरह टूट जाएगी।' सूत्रों के मुताबिक रिलायंस जियो और आरकॉम के बीच सौदे में देरी का एक कारण यह है कि जियो स्पेक्ट्रम भुगतान के मामले में ज्यादा स्पष्टीकरण चाहती है ताकि उसे आरकॉम के स्पेक्ट्रम के लिए भुगतान न करना पड़े।  दूरसंचार कंपनियों पर सबसे अधिक बकाया एजीआर के रूप में है। सरकार की दलील है कि कंपनियों को दूरसंचार सेवाओं और दूसरी गतिविधियों से होने वाले राजस्व पर भुगतान करना चाहिए जबकि कंपनियां केवल दूरसंचार सेवाओं से मिलने वाले राजस्व पर भुगतान करना चाहती हैं। 

अगर जुर्माने और ब्याज को जोड़ दिया जाए तो कंपनियों पर सरकार का करीब 900 अरब रुपये बकाया है। दूरसंचार कंपनियां 3.5 फीसदी से पांच फीसदी तक एसयूसी देती हैं और लाइसेंस फीस के रूप में एजीआर के 8 फीसदी का भुगतान करती हैं। एकमुश्त स्पेक्ट्रम शुल्क को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच विवाद है। वर्ष 2012 के एक आदेश के आधार पर सरकार ने सभी दूरसंचार कंपनियों को नोटिस जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि उन्हें 4.4 मेगाहट्र्ज से अधिक स्पेक्ट्रम पर एकमुश्त शुल्क देना होगा। पिछली नीति के तहत कंपनियों को 4.4 मेगाहर्ट्ज के इतर अतिरिक्त स्पेक्ट्रम दिए गए थे जो ग्राहकों की संख्या पर आधारित था। तब कंपनियों से 200 अरब रुपये से अधिक की मांग की गई थी।
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