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अपनी-अपनी पसंद का मामला है मांसाहारी या शाकाहारी होना

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  January 14, 2019

मैं शाकाहार अपनाने की सलाह देना मुनासिब नहीं समझूंगी।  मैंने कुछ वर्ष पहले इस स्तंभ में इसकी वजह बताई थी तो मुझे आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। आम तौर पर लोग यह मानते हैं कि किसी पर्यावरणविद को शाकाहारी होना चाहिए। कई लोगों ने इस बात पर गौर नहीं किया कि मैं क्या कहना चाहती थी, 'मैं ये बातें एक भारतीय पर्यावरणविद के नाते कह रही हूं, ना कि किसी पश्चिमी देश के पर्यावरणविद के तौर पर।' मेरा आशय था कि भारतीय किसान एक ऐसी व्यवस्था में रहते हैं, जिसमें पशु धन, कृषि आदि उनकी अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। ऐसे में उनसे मांस बेचने या खाने का अधिकार छीन लेने से उनकी संपदा का मूल्यांकन कम हो जाएगा और उनकी आय अर्जित करने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ेगा। हम मांस की कितनी मात्रा खाते हैं और इसका उत्पादन कैसे होता है, ये दोनों बातें हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण की सेहत के लिए मायने रखता है। 

 
औद्योगिक स्तर पर मांस का उत्पादन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। इसमें जंगलों का विनाश होने के साथ ही मवेशी को अनाज खिलाया जाता है और एंटीबायोटिक्स जैसी दवाओं का इस्तेमाल होता है, जो नहीं होना चाहिए। भारतीय किसानों की अर्थव्यवस्था अब भी गाय-भैंस-बकरी आधारित है, जिसका आकार काफी छोटा है। यह अर्थव्यवस्था इसलिए काम कर रही है क्योंकि  इसका संचालन छोटे किसानों के हाथों में रहा है। किसानों के लिए मवेशी एक तरह से बीमा सुविधा की तरह होते हैं, जिनकी मदद से वे बुरे वक्त से निपटने में सहज महसूस करते हैं। हालांकि जलवायु परिवर्तन और मौसम के मिजाज में आने वाले अचानक बदलाव से पशु धन बुरे दौर से गुजर रहा है। 
 
हमें इस अर्थव्यवस्था के पोषण के ऐसे तरीके खोजने की जरूरत है, जिनमें हरेक किसान को छोटे स्तर पर काम करने वाली व्यवस्था का लाभ मिले। भारत में श्वेत क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन ने यह कारनामा कर दिखाया था। युवती, महिलाएं और पुरुष स्थानीय डेरी में मवेशी का दूध लाते हैं, जहां से उन्हें वसा की मात्रा और उनकी बकाया रकम की प्राप्ति रसीद मिलती है। यह स्थानीय डेरी उद्योग लघु, विभिन्न मवेशी मालिकों की संकल्पना पर आधारित है। इस व्यवस्था में ये मवेशी मालिक एक बड़े डेरी फार्म से जुड़े रहते हैं। यह एक सहकारी-उत्पादक मॉडल है, जो देश में बड़ी संख्या में रोजगार की तलाश कर रहे लोगों के लिए सबसे उपयुक्त है। 
 
हम उबर और एयरबीएनबी को विकास की राह में आए एक बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। इसी कारोबारी प्रारूप का कुरियन ने प्रचार-प्रसार किया था। इसके तहत उन्होंने प्रत्येक परिसंपत्ति से अधिक से अधिक प्रतिफल पाने की व्यवस्था शुरू करने का शंखनाद किया था। आज हम जब टैक्सी बुलाते हैं तो वह किसी टैक्सी कंपनी के अधीन नहीं है या होटल में कमरा बुक करते हैं तो वह किसी कंपनी के नियंत्रण में नहीं है। कुरियन ने बस यही किया। उन्होंने दुग्ध उद्योग को छोटे उत्पादकों एक बड़ा कारोबार बना दिया। यह नई व्यवस्था सफल रही, क्योंकि गाय-भैंस आधारित अर्थव्यवस्था मौजूद थी। इस अर्थव्यवस्था में दूध के लिए मवेशी रखने पर आने वाला खर्च और बाद में मांस के लिए इनकी (मवेशी) बिक्री आदि शामिल थे। एक बात तो हमें अवश्य मान लेनी चाहिए कि किसी काम के लायक नहीं रह गई गाय रखने के लिए किसानों के पास कोई कारण मौजूद नहीं है। यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच है। 
 
अब सवाल उठना लाजिमी है कि मैं आज यह सब क्यों लिख रही हूं? पिछले कुछ सालों के  दौरान गाय की सुरक्षा के पक्ष में लगातार उठ रहे स्वर और कभी-कभी हिंसक प्रदर्शनों से गरीब लोगों की रोजी-रोटी पर बुरा असर पड़ा है। अब हालत यह है कि मवेशी स्वतंत्र छोड़ दिए गए हैं। स्वतंत्र घूम रहे जानवर अब खुलेआम खेतों में लगी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह बात दिमाग में रखनी जरूरी है कि भारत में किसान अपने खेतों को चारों तरफ से घेरते नहीं हैं और ना ही ऐसा करना उनके लिए संभव है। ऐसा नहीं करना मृदा एवं जल संरक्षण के लिहाज से भी ठीक है। मौजूदा हालात में यह ताना-बाना काम नहीं करने जा रहा है। एकमात्र बदलाव मुझे यह दिख रहा है कि किसान गाय पालन छोड़कर अब भैंस आधारित अर्थव्यवस्था की बुनियाद खड़ी कर सकते हैं। हालांकि यह भी तभी काम करेगा जब सरकार गायों से जुड़े मामले में हिंसा का शिकार हुए लोगों के मामलों पर कड़ा रुख अपनाएगी। यहां यह बात रखनी भी जरूरी है कि जितने भी मामलों में मांस की जांच हुई है, वे सभी भैंस के पाए गए हैं। ऐसा लगता है कि  इस बात से किसी को फर्क नहीं पड़ा है। देश में गायों की तथाकथित सुरक्षा जारी है। इसकी एक वजह यह भी है कि सरकार ने निरीह गायों की सुरक्षा के बजाय इसकी 'पूजा' करने वाले लोगों को संरक्षण दिया है। इन लोगों ने कानून अपने हाथों में ले लिया है। यह सिलसिला बंद होना चाहिए। 
 
मैं यह कहने में भी संकोच नहीं करूंगी कि हमें पश्चिमी देशों की तरह प्रोटीन से भरपूर भोजन के प्रति अत्यधिक लगाव नहीं रखना चाहिए। यह चलन भी स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी दिक्कतों के लिए जिम्मेदार है। ब्रिटेन के दैनिक 'द गार्जियन' में हाल में छपे एक आलेख में कहा गया है कि  प्रोटीन को लेकर बढ़े उन्माद से इसके अधिक उपभोग को बढ़ावा मिल रहा है। अमेरिका और कनाडा के लोग एक दिन में 90 ग्राम प्रोटीन खाते हैं, जो औसत उपभोग (62 किलोग्राम वजन वाले एक वयस्क की प्रोटीन आवश्यकता के आधार पर) का दोगुना है। यूरोप के लोग रोजाना औसतन 85 ग्राम प्रोटीन खाते हैं। भारत में प्रोटीन की कमी का सामना कर रहे और कुपोषित लोगों की तादाद खासी ज्यादा है, इसलिए यहां का औसत मायने नहीं रखता है। इतना तो तय है कि देश के शहरी क्षेत्रों के लोगों में प्रोटीन के अधिक से अधिक उपभोग का चलन तेजी से बढ़ रहा है। मांसाहारी या शाकाहारी होना एक व्यक्तिगत पसंद का मामला है। हमें इसके लिए भी लड़ाई लडऩी चाहिए। 
Keyword: environment, veg, non veg,,
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