बिजनेस स्टैंडर्ड - 'राजग के साथ सपा के कोई मतभेद नहीं'
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'राजग के साथ सपा के कोई मतभेद नहीं'

शिखा शालिनी /  01 13, 2019

बीएस बातचीत

समाजवार्दी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने शिखा शालिनी को बताया कि 2019 के चुनावों के बाद केंद्र में किसी एक पार्टी की सरकार बनने की संभावना कम ही दिखती है। बातचीत के प्रमुख अंश:

2019 के चुनावों की क्या तस्वीर बनेगी?

बिजनेस स्टैंडर्ड 2019 के चुनावों की बात करें तो अभी जनता का रुख भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी है। मौजूदा सरकार ने जो वादे किए उनमें से कोई भी वादा पूरा नहीं हुआ बल्कि किसानों और देश के नौजवानों को काफी दिक्कत आई। मौजूदा सरकार ने 15 लाख रुपये देने, किसानों के हित में काम करने, बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया। लेकिन ये सभी वादे खोखले पड़ गए। झूठ बोलकर जनता को ठगना सही बात नहीं है। एक बात तो तय है कि भाजपा अब पिछले चुनावों की तरह प्रदर्शन नहीं कर पाएगी लेकिन विपक्ष में जो लोग ठीक से काम करेंगे उनको ही ज्यादा सीटें मिलेंगी। 

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के गठबंधन में सीटों को लेकर दिक्कतें नहीं आएंगी जिसके लिए बातचीत जारी है?

अभी कोई गठबंधन नहीं हो रहा है। (यह बातचीत गठबंधन की घोषणा के पहले की गई थी) हम उम्मीद कर रहे हैं कि 2019 के चुनाव में सपा का प्रदर्शन अच्छा रहेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में हमारी पार्टी का खराब प्रदर्शन रहा और हमारे परिवार के ही पांच लोग ही जीत सके।  अभी मैं एक हफ्ता था लखनऊ में था और वहां रोजाना कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की। उनमें काफी उत्साह दिखा और जनता में भी विपक्ष के लिए उत्साह है अब आगे देखिए क्या होता है। 

गठबंधन के बगैर सपा की राह मुश्किल नहीं होगी?

सभी जानते हैं मायावती की पार्टी बसपा किसका नुकसान करेगी। गठबंधन करने से हमें क्या फायदा है? कई सालों से जिन्होंने पार्टी के लिए काम किया है, उनके टिकट कटेंगे। जिन्होंने पार्टी बनाने में अहम भूमिका निभाई है उनके टिकट कटेंगे। मैंने इसके लिए साफ  मना किया है। हम पार्टी कमजोर नहीं होने देंगे। अगर गठबंधन इतना ही जरूरी हो जाए तो मैंने कहा कि सीटों पर पहले ही बात होनी चाहिए क्योंकि असली झगड़ा वहीं से शुरू होता है। किसको कहां से चुनाव लडऩा है यह पहले तय होना जरूरी है क्योंकि बाद में यह सब होगा नहीं। सपा हो या बसपा सबके अपने कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम करते हैं। गठबंधन में अपने अपने वफादार कार्यकर्ताओं का टिकट काटना मजबूरी हो जाती है। इसका गलत संदेश जाता है और कार्यकर्ता ही पार्टी के खिलाफ  हो जाते हैं। इन सब परिस्थितियों पर पहले विचार करना तो जरूरी है।

भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस संभवत: सपा-बसपा गठबंधन से बाहर रहने के लिए भी तैयार है। इस पर आपका क्या कहना है?

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन बेहद कमजोर है। बिहार में तो और भी ज्यादा खराब स्थिति है। मध्यप्रदेश में चुनाव के बाद कांग्रेस को समर्थन इस वजह से दे दिया गया क्योंकि यह संदेश जाता कि हमने भाजपा की सरकार बनने दी और इसका असर उत्तर प्रदेश और बिहार में भी पड़ता।

पहले समाजवादियों में बिखराव दिखा और आपने डॉक्टर राममनोहर लोहिया की प्रेरणा से जो पार्टी बनाई उसमें भी अब बिखराव है। इस पर नियंत्रण करने के लिए आपका क्या कदम होगा?

अगर परिवार की बात करें तो हर परिवार में आपस में कुछ न कुछ मतभेद होते हैं। लेकिन मेरा परिवार वही करेगा जो मैं कहूंगा। यह अच्छी बात है कि हमारी पार्टी में जो युवा नेता आ रहे हैं वे भाषण अच्छा देते हैं और सवाल भी ठीक करते हैं। पहले मुझे लगता था कि हमारी पार्टी बूढ़ी हो रही है लेकिन हमारी तो अब युवा हो रही है। मैंने पार्टी के युवाओं से कहा कि ये पार्टी आपको ही चलानी है। 

आप शिवपाल यादव और अखिलेश यादव दोनों के साथ नजर आते हैं। लोगों में यह भ्रम पैदा होता है कि आप किसके साथ हैं?

जहां तक अखिलेश और शिवपाल का सवाल है, इन दोनों में कोई गंभीर मतभेद नहीं हैं। चुनाव से पहले मेरी कोशिश होगी कि ये मौजूदा मतभेद भी खत्म हो जाएं और पार्टी एकजुट होकर चुनाव में उतरे। सपा के महामंत्री रामगोपाल यादव इस कोशिश में हैं कि सपा और शिवपाल यादव की पार्टी चुनाव से पहले आपने मदभेद दूर कर लें और एक होकर भाजपा के खिलाफ  चुनाव लड़ें।

एक वक्त था जब आप प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए और उस वक्त इस राह में राजद नेता लालू प्रसाद ने बाधा डाली थी जो अब आपके रिश्तेदार है। अब फिर से गठबंधन के लिए उपयुक्त चेहरे की तलाश होगी। आप संभावित उम्मीदवार होंगे?

बात आपकी सही है कि उस दौरान सब सहमत हो गए थे। लेकिन अब वह वक्त बीत चुका है। वह परिस्थितियां अलग थीं। अब ऐसी बात नहीं है। पहले चुनाव हो जाए उसके बाद नए प्रधानमंत्री के लिए नाम ढूंढे जाएंगे तब उस वक्त की स्थिति देखी जाएगी। 

राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की कोशिश जारी है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी उसके समर्थन में हैं और द्रमुक के अध्यक्ष एम के स्टालिन ने तो यह बयान भी दिया की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी महागठबंधन का चेहरा हो सकते हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर के गठबंधन को लेकर आपका क्या कहना है?

जो लोग राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की बात कर रहे हैं, उन्हें करने दीजिए। इन्हीं दलों को सोचना है कि इस गठबंधन का उन्हें क्या करना है। हमारी पार्टी अभी किसी से गठबंधन नहीं कर रही है। हालांकि मेरी बात चंद्रबाबू नायडू से हुई थी। उन्होंने मुझे बताया कि उनकी बातचीत भी अभी शुरुआती स्तर पर है। बाकी चुनाव के बाद परिस्थितियों पर निर्भर करेगा कि गठबंधन किया जाएगा या नहीं। द्रमुक और कांग्रेस का गठबंधन पुराना है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के दौर से ही इन कांग्रेस और द्रमुक एक-दूसरे को समर्थन देते रहे हैं। स्टालिन का बयान उनके अपने पुराने संबंधों के हिसाब से दिया गया है।

विपक्ष के संभावित गठबंधन के सामने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) कितना मजबूत या कमजोर है?

राजग गठबंधन कोई खास मजबूत नहीं है। हालांकि राजग गठबंधन से हमारा कोई झगड़ा भी नहीं है। कांग्रेस की मौजूदगी देश भर में है चाहे वह कमजोर हो या मजबूत। राजग गठबंधन में भी दरार दिखने लगी है। उत्तर प्रदेश में भी राजग गठबंधन में मतभेद दिख रहे हैं और यहां भाजपा के सहयोगी दलों का   असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। शिवसेना भी राजग से अलग चुनाव लडऩे की घोषणा कर रही है। 

तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस में बारे में क्या आकलन है?

कांग्रेस मजबूत नहीं हो रही है। ध्रुवीकरण वाली स्थिति में विपक्षी पार्टी का मजबूत होना जरूरी है लेकिन ऐसा जमीन पर नहीं दिखता।

कांग्रेस पर परिवारवाद के आरोप के साथ विपक्ष के दूसरे दलों पर भी इस तरह के आरोप लगते रहे हैं। इस पर आपका क्या कहना है?

यह सच्चाई है कि परिवार के खिलाफ  जनता नहीं है। पिछले चुनाव की बात करें तो पूरी कोशिश की गई थी कि हमें उत्तर प्रदेश में हराया जाए लेकिन अगर कोई जीत रहा है तो जीते हुए को कैसे हराया जा सकता है? इससे भी साबित हुआ कि जनता का परिवार को लेकर कोई विरोध नहीं है। अपनी क्षमता और योग्यता के साथ परिवार का कोई व्यक्ति अगर चुनाव में उतरता है और उसको जनसमर्थन हासिल होता है।

आपको क्या ऐसा लगता है कि आगामी चुनावों के बाद केंद्र में किसी एक पार्टी की सरकार नहीं बन पाएगी?

अभी के हालात को देखते हुए तो ऐसा ही लग रहा है। चुनाव के बाद की परिस्थितियां कैसी होंगी यह उस वक्त पर ही निर्भर करेगा और नए गठबंधन के साथ नए समीकरण आकार ले सकते हैं।

आप कहां से चुनाव लड़ेंगे?

मैं मैनपुरी से ही चुनाव लडूंगा।
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