बिजनेस स्टैंडर्ड - राहुल का मोदी विरोध और पार्टी का जनाधार
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राहुल का मोदी विरोध और पार्टी का जनाधार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 13, 2019

वह गुजरे जमाने की बात हो गई जब लोकतांत्रिक देशों के नेता सभी नागरिकों से बातचीत किया करते थे। निर्वाचित होने के बाद वे सब के हितों का ध्यान रखते थे, इनमें वे लोग भी बड़ी तादाद में शामिल होते थे जो उनको वोट नहीं देते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि वे सार्वजनिक पद पर होते और यह मामला सार्वजनिक विश्वास का था। अब वे केवल अपने 'आधार' को ही संबोधित करते हैं। बाकियों से उनको कोई मतलब नहीं होता। अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड टं्रप को लाखों लोग मूर्ख, नस्लवादी और जाने क्या-क्या कहते हैं। इसके बावजूद वह अपने समर्थकों के बीच लोकप्रिय होते जाते हैं। संदेश एकदम स्पष्ट है कि अगर आप मुझे वोट नहीं देते हैं तो मुझसे कोई अपेक्षा भी मत रखिए।

 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का उदाहरण लीजिए। वह हिंदू मतों की बदौलत सत्ता में आई। उसने उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी नहीं उतारा जबकि वहां 20 फीसदी से अधिक आबादी मुस्लिम है। इसके बावजूद पार्टी को राज्य के दोनों चुनावों में एकतरफा जीत मिली। वे मुस्लिमों और अधिकांश दलितों को सत्ता से बाहर रख सकते हैं क्योंकि सवर्ण उनके साथ हैं। यही कारण है कि चुनाव में जाने के पहले मोदी सरकार ने उनके लिए 10 प्रतिशत आरक्षण जैसा बड़ा कदम उठाया है।  
 
प्रश्न यह है कि राहुल गांधी आखिर किन मतदाताओं को संबोधित कर रहे हैं? उनका आधार क्या है? क्या उनको पता भी है? भारत में केवल मोदी विरोध के बल पर चुनाव नहीं जीता जा सकता। हमें पता है कि 2014 में केवल 31 फीसदी भारतीयों के वोट से मोदी सत्ता में आए थे। आप कह सकते हैं कि बड़ी आबादी उनसे असहमत या उन्हें नापसंद करने वालों की भी है। राहुल गांधी के मोदी पर अनवरत हमले ऐसे लोगों को रास आते हैं। परंतु इसका यह मतलब नहीं कि वे उन्हें वोट भी देंगे। अगर मोदी के विरुद्ध नाराजगी ही आपकी प्रेरक शक्ति है तो काफी संभावना है कि आप उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ का चयन कर लें। बंगाल में यह ममता बनर्जी हो सकती हैं, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी, बिहार में लालू प्रसाद, केरल में वाम, तेलंगाना, ओडिशा और दिल्ली में क्रमश: केसीआर, नवीन पटनायक और अरविंद केजरीवाल हो सकते हैं।
 
अगर राहुल के इस अभियान की बदौलत मोदी की छवि को इतना नुकसान हो कि लोग उन्हें पराजित कर दें तो भी क्या वे बदले में कांग्रेस को चुनेंगे? फिलहाल यह संभव नहीं दिखता क्योंकि मोदी को बुरा मानने का यह अर्थ नहीं है कि लोग कांग्रेस को श्रेष्ठ मान बैठेंगे। सन 1989 तक कांग्रेस का आधार इतना तो था कि वह चुनावी जीत हासिल कर सके। निचली जातियां, अल्पसंख्यक, जनजातियां, ब्राह्मण, मध्य वर्ग का कुछ हिस्सा और बड़ी तादाद में गरीब उसके साथ थे। उस वक्त भाजपा शहरी कारोबारियों और हिंदू मध्य वर्ग तक सीमित थी। यही कारण है कि इंदिरा गांधी जनसंघ/भाजपा को बनिया पार्टी कहती थीं, न कि हिंदू पार्टी।
 
इसके साथ ही जब तक इंदिरा गांधी रहीं भाजपा कभी कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी नहीं कह सकीं। कांग्रेस की मुस्लिम परस्त छवि की शुरुआत संप्रग के कार्यकाल के दशक में बनी। इसकी शुरुआत पोटा (प्रीवेंशन ऑफ टेररिज्म ऐक्ट) को खत्म करने से हुई। सन 1989 में जब राजीव गांधी अपना आधार गंवाने लगे तब कांग्रेस ने अपने बचे खुचे वोट और भाजपा विरोधी राजनीतिक ताकतों को एकजुट कर खुद को बचाए रखा। 2014 के बाद पार्टी को सत्ता में वापसी करने के लिए कहीं अधिक प्रयास करने होंगे।
 
लोकसभा चुनाव में करीब तीन महीने का समय बचा है और कांग्रेस के पास पंजाब को छोड़कर किसी राज्य में ऐसे वफादार मतदाता नहीं हैं जिन पर वह भरोसा कर सके। पूर्वी और मध्य क्षेत्र के जनजातीय इलाकों के वोट उसके और भाजपा के बीच बंटे हुए हैं। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और असम जैसे प्रमुख राज्यों में मुस्लिम मतदाताओं के पास अन्य विकल्प हैं। शहरी मध्यवर्ग, खासकर 25 की आसपास की उम्र के युवा अभी भी मोदी समर्थक हैं। ऐसे में केवल मोदी विरोधियों को साथ लेकर मनमाफिक मतदाता वर्ग तैयार नहीं किया जा सकता है। मोदी को नुकसान पहुंचाया जा सकता है लेकिन इसके लाभार्थी कई धड़ों में बंटे रहेंगे।
 
राहुल की रणनीति काफी हद तक 2010-2014 के दौर के अरविंद केजरीवाल की तरह है। केजरीवाल ने अन्ना हजारे और आरएसएस की ताकत का इस्ेमाल करते हुए संप्रग और कांग्रेस की विश्वसनीयता को समाप्त कर दिया था। यह इतने सलीके से किया गया था कि कांग्रेस के लोगों तक को भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाव करना मुश्किल हो रहा था। भाजपा और विवेकानंद फाउंडेशन को श्रेय देना आसान है लेकिन कांग्रेस के खिलाफ उस लड़ाई में असली हथियार केजरीवाल थे। वह युवा और भरोसेमंद थे, उन पर भ्रष्टाचार का कोई इल्जाम नहीं था और वह पारंपरिक राजनीति से भी नहीं आते थे। उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ सब चोर हैं का जुमला दिया। हुआ यह कि कांग्रेस विरोधी सभी वोट उनके पास नहीं आए। उनकी तैयारी इतनी नहीं थी। यही कारण है कि वह दिल्ली तक सिमट गए। अन्य स्थानों पर कांग्रेस विरोधी मत नरेंद्र मोदी को चले गए।
 
बिना विकल्प की नकारात्मक राजनीति का यही परिणाम होना था। वैकल्पिक राजनीति के लिए एक तयशुदा आधार की आवश्यकता होती है। राहुल के साथ भी ऐसा ही हो सकता है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा अधूरा विरोध आपके बजाय दूसरे को सत्ता दिलाने की वजह बन सकता है। तीन हिंदी भाषी राज्यों में राहुल गांधी की सफलता, सुर्खियां बटोरने में उनकी काबिलियत और ट्विटर पर उन्हें मिल रहे समर्थन ने उनके बौद्धिक समर्थकों और मोदी विरोधी वाम-उदारवादियों की कल्पनाशीलता को पंख लगा दिए हैं। परंतु यह बहुत बड़ा मतदाता वर्ग नहीं है। लाखों की तादाद में आ रहे रीट्वीट और लाइक्स ईवीएम में नहीं गिने जाते। राहुल गुरिल्ला शैली में हमले तो कर रहे हैं लेकिन इसका हासिल नजर नहीं आ रहा।
 
मुस्लिम पार्टी की छवि तोडऩे के लिए राहुल मंदिरों की यात्राएं कर रहे हैं, अपना जनेऊ दिखा रहे हैं और अपना उच्च ब्राह्मण गोत्र उचार रहे हैं। इसी दौरान उनकी पार्टी तीन तलाक, शबरीमला, अगड़ों के आरक्षण जैसे अहम धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी मुद्दों पर खामोश रही। भरोसे की यही कमी तब नजर आई जब उनकी पार्टी नागरिकता अधिनियम में संशोधन के मुद्दे पर लोकसभा का बहिष्कार कर गई। यह अधिनियम एक तरह से देश में यहूदीकरण को विधिक जामा पहनाता है। यहां बहस यहूदीवाद को लेकर नहीं है। इजरायल ने स्वयं को वैचारिक आधार पर यहूदी राष्ट्र बनाया जबकि इसके उलट भारत ने गैर वैचारिक धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाया। अब इसे चुनौती दी जा रही है और कांग्रेस बहिष्कार के अलावा कुछ नहीं कर पा रही। असम समेत देश भर के हिंदू और मुस्लिम यह सब देख रहे हैं।
 
यह भाजपा को रास आता है। पार्टी का जनाधार भी यही चाहता है। पार्टी जब अवैध प्रवासियों को दीमक कहती है तो उसके समर्थक प्रसन्न होते हैं। अगर पार्टी संविधान में संशोधन करके यह स्पष्ट कर देती है कि इनमें भी केवल मुस्लिम ही दीमक हैं तो उनके जोश का ठिकाना नहीं रहेगा। कांग्रेस को यह भी नहीं पता कि उसका आधार क्या है या अगले कुछ महीनों में जब चुनाव प्रचार शुरू हो जाएगा तो वह अपना जनाधार कैसे बनाएगी?  विशुद्घ मोदी विरोध चाहे जितना क्रोध से भरा हो, वह कभी विचारधारा या चुनावी विकल्प नहीं बन सकता। वह ज्यादा से ज्यादा मोदी को इतना नुकसान पहुंचा सकता है कि लोकसभा में पार्टी की सीटें 200 से कम हो जाएं। परंतु क्या इससे आपकी सीटों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर जाएगी? भारत के मानचित्र को करीब से देखिए। राज्यवार तरीके से देखिए तो आप पाएंगे कि अगर मई तक लोगों का भाजपा से बुरी तरह मोहभंग हो जाए तो भी कांग्रेस ज्यादा राज्यों में प्रमुख विकल्प नहीं बन पाएगी। राहुल गांधी के लिए यही कड़वी हकीकत है। 
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