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हड़बड़ाहट भरा कदम

संपादकीय /  January 13, 2019

गत सप्ताह केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के प्रमुख के पद पर आलोक वर्मा की बहाली और वहां से 48 घंटे के भीतर उनकी विदाई ने सरकार की उस छवि को और प्रबल किया है कि वह संस्थानों की स्वायत्तता का बहुत अधिक सम्मान नहीं करती। वर्मा के खिलाफ चल रही केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की जांच की निगरानी कर रहे सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए के पटनायक की टिप्पणियों के हिसाब से देखा जाए तो सीबीआई प्रमुख को उनका कार्यकाल पूरा करने देना चाहिए था। तीन सदस्यीय चयन समिति ने 2:1 के निर्णय से वर्मा को उनके पद से हटा दिया था। समिति ने कहा कि सीवीसी द्वारा वर्मा के खिलाफ किए गए पर्यवेक्षण की गंभीरता को देखते हुए उन्हें पद से हटाया जा रहा है।  
 
तीन सदस्यीय समिति में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े इकलौते ऐसे सदस्य थे जिसने उन्हें पद से हटाने की सहमति नहीं दी थी। खडग़े ने कहा कि सीवीसी की जांच में वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दिया गया है। उनके खिलाफ प्रस्तुत शिकायतों में स्पष्ट तौर पर ईमानदारी के अभाव के बजाय कुछ प्रमुख मामलों में शिथिलता बरतने की शिकायतें अधिक हैं। खडग़े की बातों को आम चुनाव के पहले विपक्षी दल की सामान्य असहमति मानकर खारिज कर दिया जाता लेकिन न्यायमूर्ति पटनायक की टिप्पणी उनकी दलीलों को मजबूत करती है। पटनायक ने कहा कि सीवीसी की रिपोर्ट सुनिश्चित तौर पर किसी नतीजे पर नहीं जाती। उनका इशारा यह भी है कि जांच को पूरा करने के दौरान भी अन्य तरह की अनियमितताएं बरती गईं। उन्होंने वर्मा को पद से हटाने के समिति के निर्णय को बहुत उतावली में उठाया गया कदम बताया। 
 
सर्वोच्च न्यायालय के अनुरोध पर सीवीसी की जांच की निगरानी कर रहे न्यायमूर्ति पटनायक ने समाचार पत्र द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई मामला नहीं था। न्यायमूर्ति पटनायक ने कुछ अतिरिक्त बातें कहीं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली बात, उन्होंने कहा कि यह जांच केवल और केवल वर्मा के अधीनस्थ राकेश अस्थाना के दावों पर आधारित थी और 9 नवंबर को अस्थाना ने आरोप लगाते हुए जिन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए वे उनकी उपस्थिति में हस्ताक्षरित नहीं थे। दूसरी बात, सीवीसी रिपोर्ट के निष्कर्ष उनके दिए हुए नहीं थे। तीसरी बात, उन्होंने कहा कि सीवीसी का कहना अंतिम नहीं है। यह बात जरूर अजीब है कि समिति ने इस बात पर विचार करना प्रासंगिक नहीं समझा कि वर्मा के खिलाफ आरोप उसी व्यक्ति ने लगाए थे जिसके खिलाफ खुद सीबीआई ने भ्रष्टाचार के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई थी और जिसके खिलाफ फिलहाल छह मामलों में जांच चल रही है। भारतीय पुलिस सेवा से अपने त्यागपत्र में वर्मा ने ये मुद्दे उठाए और कहा कि चयन समिति ने उन्हें अपनी वे बातें स्पष्ट करने का अवसर नहीं दिया जो निर्णय पर पहुंचने के पहले सीवीसी ने दर्ज की हैं। 
 
देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी में घटी इस विशिष्ट घटना को लेकर इन प्रमाणों के बाद सरकार के इरादे पर सवाल उठना तय है। यह अजीब है कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को गंभीर मान रही सरकार को वर्मा एक अन्य महत्त्वपूर्ण पद के लिए उपयुक्त लगे। उन्हें अग्निशमन सेवा का महानिदेशक बनाया गया, हालांकि उन्होंने इस पद को नकार दिया। यह बात भी अजीब है कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सदस्यों में से एक न्यायमूर्ति सीकरी जिन्होंने वर्मा के निष्कासन में निर्णायक मत दिया, उन्होंने भी विधि और प्रक्रिया से जुड़े ये प्रश्न नहीं उठाए।
Keyword: CBI, raid, alok verma, court,,
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