बिजनेस स्टैंडर्ड - अगले वित्त वर्ष पर टलेगी 25,000 करोड़ रु. पेट्रो सब्सिडी
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अगले वित्त वर्ष पर टलेगी 25,000 करोड़ रु. पेट्रो सब्सिडी

शाइन जैकब और अरूप रायचौधरी / नई दिल्ली January 13, 2019

सरकार पेट्रोलियम सब्सिडी के 25,000 करोड़ रुपये का लंबित बोझ आगामी वित्त वर्ष 2019-2020 पर डाल सकती है। बिजनेस स्टैंडर्ड को मिली जानकारी के मुताबिक 1 अप्रैल से शुरू हो रहे नए वित्त वर्ष पर 2018-19 के बजट अनुमान इतना का बोझ डाला जा सकता है।  सरकार के ऊपर दबाव है कि वह 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद के 3.3 प्रतिशत राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर कायम रहे। वित्त वर्ष 2019 में सब्सिडी 24,933 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया था, जिसमें 20,377 करोड़ रुपये तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी या रसोई गैस) और 4,555 करोड़ रुपये केरोसिन के लिए रखा गया था। सूत्रों ने संकेत दिए कि चल रहे वित्त वर्ष के पुनरीक्षित बजट में इस क्षेत्र की सब्सिडी राशि 20,000-21,000 करोड़ रुपये हो सकती है, जिसमें 16,500 करोड़ रुपये एलपीजी के लिए और 4,200 करोड़ रुपये केरोसिन के लिए रखा गया है। 
 
इस वित्त वर्ष में सब्सिडी का असल बोझ 46,000 करोड़ रुपये पहुंच सकता है क्योंकि कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें अक्टूबर में 4 साल के उच्चतम स्तर 86 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई थीं और अप्रैल सितंबर के बीच कच्चे तेल का औसत मूल्य 73.69 डॉलर प्रति बैरल रहा।  एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'पेट्रोलियम सब्सिडी आगे इसलिए बढ़ाना पड़ रहा है क्योंकि अंतराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बहुत ज्यादा उतार चढ़ाव होने के कारण इस क्षेत्र पर सब्सिडी का बोझ 2018-19 में बहुत ज्यादा 46,000 करोड़ रुपये हो सकता है।' 
 
कच्चे तेल के दाम बढऩे से से 3 सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन पर दबाव बढ़ा। वहीं अन्वेषण व उत्पादन करने वाली अपस्ट्रीम सरकारी कंपनियों जैसे तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) और ऑयल इंडिया पर सब्सिडी का बोझ पडऩे की संभावना कम है।  कच्चे तेल व उत्पादों की बिक्री से अपस्ट्रीम कंपनियों पर पडऩे वाले बोझ की आंशिक भरपाई कर दी गई थी। वित्त वर्ष 2017-18 में एलपीजी पर सब्सिडी 20,905 करोड़ रुपये थी। इस वित्त वर्ष की पहली छमाही में यह राशि 14,013 करोड़ रुपये थी। इसी तरह से केरोसिन सब्सिडी पहली छमाही में 3,309 करोड़ रुपये थी, जबकि 2017-18 में यह 4,785 करोड़ रुपये थी। 
 
चालू वित्त वर्ष 2019 के पहले 8 महीनों में अप्रैल से नवंबर के दौरान एलपीजी की खपत 4.9 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि केरोसिन की खपत पिछले साल से 10 प्रतिशत कम हुई है।  पहली छमाही में कच्चे तेल के दाम ज्यादा होने की वजह से चालू साल में इसका आयात बिल करीब 55 प्रतिशत बढ़कर 2017-18 के 5.66 लाख करोड़ रुपये से 8.8 लाख करोड़ रुपये हो गया। अगर कीमतों में 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है तो भारत का आयात बिल 6,158 करोड़ रुपये बढ़ता है।  सरकारों ने अतिरिक्त सब्सिडी का बोझ पहले भी कई बार अगले साल के बजट पर टाला है, और मंत्रालयों की बगैर खर्च की गई राशि वापस लेकर, कुछ व्यय में बदलाव कर उसे अग्रिम बनाकर और नकद भंडार से इसकी भरपाई की गई है। अब राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करने के लिए बोझ को अगले साल पर टालना और पूंजीगत व्यय में कटौती न करना सरकारों की नियमित गतिविधि बन गई है। इसके बावजूद इस बार राजकोषीय लक्ष्य हासिल करना मुश्किल लग रहा है क्योंकि जीएसटी और प्रत्यक्ष कर से लक्ष्य के मुताबिक धन जुटाने को लेकर गंभीर संदेह है। 
 
वित्त वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 6.24 लाख करोड़ रुपये है। नवंबर के अंत तक यह 7.17 लाख करोड़ रहा, जो बजट अनुमान से करीब 15 प्रतिशत ज्यादा हो चुका है। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार को अगले 4 महीने में लक्ष्य हासिल करने के लिए 93,000 करोड़ रुपये और जुटाने होंगे।  
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