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असम गण परिषद की राजग से जुदाई वजूद की लड़ाई

आदिति फडणीस /  January 11, 2019

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से अलग होने वाली असम गण परिषद (अगप) ने राज्य की सर्वानंद सोनोवाल सरकार में शामिल अपने मंत्रियों को इस्तीफा देने को कह दिया है। इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुआई वाली सोनोवाल सरकार की स्थिरता पर फिलहाल कोई संकट नहीं है।

भाजपा और अगप ने 2016 के विधानसभा चुनावों के पहले हाथ मिलाया था। उस चुनाव में 126 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 61 सीटें जीती थीं जबकि अगप के पाले में 14 सीट आई थीं। बोडो पीपुल्स फ्रंट के 12 विधायकों का भी साथ मिलने से इस गठबंधन की संख्या 87 तक जा पहुंची थी। ऐसे में अगप के अलग होने के बाद भी सरकार के बहुमत पर कोई खतरा नहीं है। अजीब विरोधाभास है कि यह अलगाव अगप के लिए राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के साथ ही अपने वजूद के लिए जद्दोजहद को भी बयां करता है।

प्रफुल्ल कुमार महंत ने असम आंदोलन के चरम पर रहने के दौरान अगप का नेतृत्व किया था और महज 33 साल की उम्र में असम के मुख्यमंत्री बन गए थे। अब 60 साल से ऊपर के हो चुके महंत की बनाई यह पार्टी अपने अतीत की परछाईं भर रह गई है। इस पार्टी की कमान अतुल बोरा के हाथ में है जो महंत के विरोधी धड़े के नेता हैं। कई लोगों का कहना है कि अगप का सियासी ग्रहण स्वत: आरोपित है। भाजपा और अगप ने 2001 में भी विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ा था। लेकिन 2006 के चुनाव में अगप भाजपा का साथ छोड़कर वामदलों के साथ चली गई थी।

हालांकि 2009 के आम चुनाव में अगप एक बार फिर राजग का हिस्सा बन गई लेकिन दो साल हुए विधानसभा चुनाव में फिर से दूर जा बैठी। नतीजे बताते हैं कि भाजपा के साथ किया गया हरेक गठबंधन अगप के आधार में चोट पहुंचाता रहा और उसकी मत हिस्सेदारी कम होती रही। खासकर 2016 में हुआ पिछला विधानसभा चुनाव तो खास नुकसानदायक साबित हुआ क्योंकि भाजपा का अगप की कीमत पर इस कदर विस्तार हुआ कि वह असम में पहली बार सरकार बनाने की स्थिति में जा पहुंची।

1970 के दशक के अंतिम और 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में असम में जनांदोलन को तीव्रता देने वाले तमाम बिंदुओं में से एक मुद्दा अब भी कायम है। बांग्लादेश का मुद्दा अब भी असम की राजनीति में काफी अहम बना हुआ है। केंद्र की नव-उपनिवेशवादी नीतियां और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन जैसे दूसरे मुद्दे समय के साथ पृष्ठभूमि में जा चुके हैं। लेकिन असम के असली निवासी की पहचान का मुद्दा इतने वर्षों बाद भी बड़ा सियासी मसला बना हुआ है। असम को अब भी लगता है कि 'बाहरी' लोग उसका शिकार कर रहे हैं और धमका रहे हैं।

'बाहरी' लोगों में बंगाली मुस्लिम, बंगाली हिंदू, मारवाड़ी, बिहारी मजदूर और उत्तर भारतीय शामिल हैं। लेकिन अब नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 के लोकसभा से पारित होने के बाद इन लोगों में एक और श्रेणी आ गई है। इस कानून में बांग्लादेशी हिंदुओं को धार्मिक यंत्रणा से बचने के लिए भारत आने, यहां की नागरिकता लेने और यहां बसने की इजाजत दी गई है। असम की सीमा से बांग्लादेश महज कुछ किलोमीटर दूर ही होने से समझा जा सकता है कि ये लोग कहां बसेंगे?

अगप नहीं चाहती है कि असम में कोई भी बाहरी व्यक्ति आकर बसे। हिंदू, मुस्लिम, आदिवासी कोई भी यहां न आए। अगप को असम की परंपराओं और संस्कृति में किसी भी तरह का दखल पसंद नहीं है। उसने इसी मुद्दे को आधार बनाते हुए राजग का साथ छोड़ा है। उसका दावा है कि भाजपा के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन होने से ऐसे कानून पर उसके रुख के बारे में भाजपा को पहले से ही पता था। इसके बाद भी भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने इस विधेयक को सदन से पारित करवा दिया। अगप के मुताबिक, इसका यही मतलब है कि भाजपा ने अपने गठबंधन साझेदार की भावनाओं का थोड़ा भी ध्यान नहीं रखा। 

वहीं भाजपा के लिए अलग तरह की मजबूरियां हैं। आदर्श स्थिति में भाजपा अगप के साथ बने रहना चाहती लेकिन उसकी नजरें असम के पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल पर टिकी हैं। भाजपा चाहती है कि अगर बंगाल में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी को सत्ता से हटा न पाए तो कम-से-कम उन्हें तगड़ी चोट जरूर पहुंचा दे। भाजपा यह जताने की कोशिश कर रही है कि बंगाली मुस्लिम और बांग्लादेशी ममता के शासन का पसंदीदा हिस्सा बन चुके हैं और वहां के हिंदुओं की बात सुनने वाला कोई नहीं है। इस तरह नागरिकता संशोधन विधेयक से भाजपा एक तीर से दो निशाना साधने की कोशिश में है। असम की ब्रह्मïपुत्र नदी घाटी में अपना जनाधार बढ़ाने के साथ ही पश्चिम बंगाल में अपना वजूद बढ़ाना उसके दोहरे निशाने हैं। 

यह समझना मुश्किल नहीं है कि भाजपा की मजबूरी की उपज- नागरिकता संशोधन विधेयक ने न केवल असम के निवासियों के भीतर भय, असुरक्षा और घबराहट बढ़ाने का ही काम किया है। राष्ट्रीय नागरिक पंजी में भारतीय पहचान वाले निवासियों के नाम दर्ज करना और अन्य लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे जाने से असम में पहले से ही डर और आशंका का माहौल बना हुआ था। नागरिकता संशोधन विधेयक के कानून बन जाने के बाद हजारों की संख्या में बांग्लादेशी हिंदुओं के भी असम आने की आशंका चिंता को और बढ़ा रही है।

इन लोगों को कहां रखा जाएगा, उनका पेट कैसे भरा जाएगा और किसकी जमीन पर वे खेती करेंगे? अगप असम के निवासियों की इन्हीं चिंताओं और डर का सियासी दोहन करना चाहती है। राजग से बाहर आने को वह इस दिशा में पहला कदम मान रही है। लेकिन क्या इतना ही करना काफी है? असम मामलों के जानकार सौभद्र चटर्जी कहते हैं, 'गुवाहाटी के दिल आमबाड़ी में अगप का कार्यालय अब भी मौजूद है। लेकिन क्या अब भी असम के लोगों के दिल में उसकी जगह बची हुई है?' 

Keyword: NDA, Assam Gan Parishad, AGP, BJP, Assembly Seat, MLA,
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