बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकिंग क्षेत्र के इन सात रुझानों पर रखें नजर
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, October 17, 2019 02:10 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बैंकिंग क्षेत्र के इन सात रुझानों पर रखें नजर

तमाल बंद्योपाध्याय /  January 11, 2019

केंद्रीय बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की वर्ष में दो बार आने वाली वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट बैंकिंग तंत्र की सेहत के बारे में जानकारी देती है। ताजा रिपोर्ट, बैंकिंग जगत के दिग्गजों और बैंक शेयरों में निवेश करने वालों के लिए सुखद खबर लेकर आई है। सरकारी बैंकों में फंसी हुई परिसंपत्तियों से निजात मिली है और सुधार की प्रक्रिया नजर आ रही है। 

देश के बैंकिंग उद्योग की ऋण पुस्तिका के प्रतिशत के रूप में सितंबर में फंसा हुआ कर्ज 10.8 फीसदी के स्तर पर था, यानी मार्च 2018 के 11.5 फीसदी के स्तर से कम। आरबीआई को उम्मीद है कि मार्च 2019 तक यह घटकर 10.3 फीसदी रह जाएगा। इससे संकेत मिलता है कि देश का बैंकिंग तंत्र सुधार की राह पर है। बैंक अपनी फंसी परिसंपत्तियों के लिए अधिक राशि का प्रावधान कर रहे हैं। इससे उनका प्रॉविजनिंग कवरेज अनुपात सुधर रहा है। वर्ष के आगे बढऩे के साथ-साथ इसमें और गति आएगी और यह सन 2019 में देश के बैंकिंग क्षेत्र का अहम रुझान साबित होगा। 

बैंकों को भविष्य में फंसी परिसंपत्तियों के लिए उतनी राशि का प्रावधान नहीं करना होगा जितना वे अतीत में कर रहे थे। इन बातों का असर मुनाफे पर भी होगा और उसमें सुधार आएगा। इस वर्ष अधिक तादाद में बैंकों के मुनाफे में सुधार होगा और भारतीय स्टेट बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा जैसे अपेक्षाकृत मजबूत बैंक जिन्हें हालिया तिमाहियों में संकट का सामना करना पड़ा, वे तेजी से वृद्घि पथ पर अग्रसर होंगे।

सितंबर 2018 में 21 सरकारी बैंकों में से 12 घाटे में थे। दिसंबर 2015 में जब आरबीआई द्वारा परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा के बाद बैंकिंग तंत्र में फंसा हुआ कर्ज बढऩे लगा तो सरकारी बैंकों ने 1.84 लाख करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया। बॉन्ड प्रतिफल में आई गिरावट भी बैंकों का मुनाफा बढ़ाने में मदद करेगी। सितंबर 2018 तक बॉन्ड प्रतिफल बढ़ता रहा और 10 वर्ष का प्रतिफल बढ़कर 8.23 फीसदी तक पहुंच गया था। इससे सभी बैंकों को नुकसान हुआ। आरबीआई ने उन्हें भारी-भरकम मार्क टु मार्केट (एमटीएम) नुकसान को क्रमबद्घ करने की इजाजत दी। पहले मार्च और उसके बाद जून 2018 में ऐसा किया गया। एमटीएम से तात्पर्य परिसंपत्ति मूल्यांकन की लेखा व्यवस्था से है। यहां इसे सरकारी बॉन्ड के लिए प्रयोग किया जा रहा है।

एमटीएम से तात्पर्य हर तिमाही के अंत में इनकी कीमत से होता है न कि इनके क्रय मूल्य से। बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट (दिसंबर के आखिर में यह 7.21 फीसदी था) और कीमतों में उछाल के बाद उन बैंकों को प्रावधान बदलने का फायदा होगा जिन्होंने अपने एमटीएम नुकसान को क्रमबद्घ करने के बजाय नुकसान सहना तय किया। कृषि ऋण, कृषि संकट, कृषि कर्ज माफी समेत किसानों के लिए चाहे जिस तरह राहत प्रदान की जाए, बैंक उनको कर्ज देने से बचेंगे और वास्तविक मुद्दों पर चर्चा तो होगी लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलेगा। यही कारण है कि सरकारी बैंकों के लिए मुनाफे की वापसी इस वर्ष चर्चा का दूसरा विषय रहेगी। 

तीसरा मुद्दा ब्याज दर चक्र में बदलाव हो सकता है। खुदरा महंगाई नवंबर में 17 महीनों के निचले स्तर पर आकर 2.33 फीसदी रह गई। यह आरबीआई के लक्ष्य से काफी कम है। ऐसे में दरों में कटौती की मांग बढ़ेगी क्योंकि आम चुनाव करीब हैं। अगर कच्चे तेल की कीमत कमजोर बनी रहती है तो फरवरी में दरों में कटौती की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। क्या फंसे हुए कर्ज की रिकवरी गति पकड़ सकती है? आदर्श स्थिति में ऐसा होना चाहिए। हर वर्ष डिफॉल्ट के मामलों से जूझते हुए बैंक भी कारोबारी तौर तरीके सीख चुके हैं। हालांकि कई कंपनियां अभी भी व्यवस्था को धता बनाने में कामयाब रहती हैं। दिवालिया संहिता के नियमों में सुधार का दबाव लगातार बढ़ रहा है। जिन बदलावों की मांग की जा रही है अगर उन्हें अंजाम दिया गया तो यह संहिता अपनी धार खो देगी। इसका असर सुधार की प्रक्रिया पर भी पड़ेगा। 

किसानों के संकट का मामला भी इस वर्ष सुर्खियों में रहेगा। कांग्रेस द्वारा तीन राज्यों में कृषि ऋण माफी को राजनीतिक स्टंट करार देने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समस्या से बुनियादी तौर पर निपटने का निर्णय किया है। स्वरूप भले बदल जाए लेकिन प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद हमारे देश की हकीकत है। राहत पैकेज चाहे जिस स्वरूप में आए लेकिन बैंक किसानों को नया ऋण देने से बचेंगे। 

वर्ष 2019 में ऋण वृद्घि की गति भी चर्चा में रहेगी। बैंकों पर पहले ही ऐसे क्षेत्रों को ऋण देने का दबाव पड़ रहा है जिन्हें लेकर वे आश्वस्त नहीं हैं या जिनके ऋण के जोखिम का आकलन करने में उनकी विशेषज्ञता नहीं है। जबरन ऋण वितरित कराने से फंसे कर्ज का संकट पुन: सर उठा सकता है। 

वर्ष 2019 में सबसे अहम मुद्दा होगा आरबीआई और सरकार के बीच का रिश्ता। अगर गवर्नर शक्तिकांत दास के शुरुआती तीन सप्ताह को किसी तरह का संकेत माना जाए तो कहा जा सकता है कि उन्हें अपने क्षेत्र की जानकारी है। दास ने अपनी पहली बोर्ड बैठक सहजता से निपटाई और केंद्रीय बैंक के आर्थिक पूंजी खाते की देखरेख के लिए बनी विशेषज्ञ समिति भी कमाल की है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर वाई वी रेड्डïी ने आरबीआई और सरकार के बीच रचनात्मक तनाव की बात की है। साफ कहा जाए तो इसमें कुछ भी रचनात्मक नहीं है। यह मौद्रिक प्राधिकार को लेकर राजकोषीय रसूख का मामला है। 

सरकारी बैंकों में पूंजी डालने की ताजा घटना को सरकार द्वारा बैंकों को मजबूत बनाने के सटीक उपाय के रूप में देखा जा सकता है। परंतु क्या इसका निर्णय नियमन के आधार पर होना चाहिए? इस पर निर्णय लें कि एक बैंक को कितनी राशि की आवश्यकता है और किस बैंक को कहां ऋण देना चाहिए? चूंकि सरकार इन बैंकों में बहुलांश हिस्सेदार है इसलिए क्या यह हितों के टकराव का मामला नहीं? क्या नियमन, स्वामित्व निरपेक्ष नहीं होने चाहिए? सारी दुनिया की निगाह आरबीआई और उसके नए गवर्नर पर है। 

यकीनन बाहरी घटनाएं, मसलन धीमी वृद्घि, व्यापारिक तनाव और अमेरिकी ब्याज दरें आदि भारतीय वित्तीय और बैंकिंग जगत को प्रभावित करेंगी लेकिन वर्ष 2019 में कम से कम पहली छमाही में आंतरिक जोखिम अधिक होंगे। एमएसएमई ऋण का एक बारगी पुनर्गठन होने के बावजूद ऐसे ऋणोन्मुखी, वृद्घि कारक रुख हो सकते हैं जो चुनावी वर्ष में और उसके बाद बैंकों की सेहत के लिए अच्छे नहीं होंगे। यह भी चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा। 

(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्माल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता एवं लेखक हैं) 

Keyword: Automated teller machine, ATM, Central Bank, RBI, Reserve Bank of India, Banking, Financial Report, Farmer,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या अक्षय ऊर्जा क्षेत्र पर भी बढ़ेगा दबाव?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.