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जारी है 'फजट' का दौर

टी. एन. नाइनन /  January 11, 2019

सन 1990 के दशक के आरंभ में देश के वित्त सचिव रहे केपी गीताकृष्णन को बजट को 'फजट' का नाम देने का श्रेय दिया जाता है। यहां फजट से संदर्भ इस बात से था कि कैसे राजकोषीय घाटा कई कंपनियों द्वारा की गई मुनाफे की घोषणा से कतई अलग नहीं रहता। बजट प्रस्तुत किए जाने के बाद मैंने वित्त मंत्रालय के तत्कालीन मुख्य सलाहकार अशोक देसाई से पूछा था कि बजट के उन आंकड़ों में कितना 'फज'(हेरफेर) है। उनका जवाब था, 'हमने फजिंग में 50 फीसदी की कमी की है। आज फजट एक ऐप का नाम है जो आपके निजी वित्त का प्रबंधन करता है।'

उस वक्त सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ऋण की शर्तों के दबाव में थी। एक शर्त घाटे को सीमित करने की भी थी। वर्ष 1980 के दशक के आरंभ में आईएमएफ के ऋण की एक पुरानी व्यवस्था थी और घाटे के लक्ष्य हासिल करने थे। सरकार ने ऋण की आखिरी किस्त नहीं ली। उस वक्त इसे उपलब्धि के रूप में पेश किया गया। कहा गया कि भारत ने विदेशी मुद्रा की समस्या से समय से पहले निजात हासिल कर ली। उस वक्त वित्त मंत्रालय में रहे एक व्यक्ति ने वर्षों बाद सच बयानी करते हुए कहा कि सरकार ने आईएमएफ को प्रसन्न रखने के लिए राजकोषीय आंकड़ों से छेड़छाड़ की थी लेकिन इसे लगातार जारी रखना मुश्किल था इसलिए उसने ऋण व्यवस्था को समाप्त करना उचित समझा।

आज आईएमएफ का कोई ऋण नहीं है और न ही कोई शर्त, लेकिन देश में वित्तीय जवाबदेही कानून बन चुका है। इसमें केंद्र के राजकोषीय घाटे को चरणबद्घ ढंग से कम करके जीडीपी के 3 फीसदी के स्तर पर लाने की बात कही गई है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की मूल समय सीमा समाप्त हो चुकी है लेकिन सरकार दर सरकार हम इस पथ से दूर रहे हैं। लक्ष्य बार-बार पुनर्निर्धारित और स्थगित होते हैं। जब सारे उपाय चूक गए तो सरकार ने आंकड़ों में नए सिरे से हेरफेर की राह अपनाई।

यह आखिरी बिंदु संसद में प्रस्तुत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट में शामिल है। इसमें विस्तार से बताया गया है कि कैसे विभिन्न सरकारों ने सब्सिडी भुगतान और परियोजनाओं को आर्थिक मदद जैसे कामों में होने वाले व्यय को बहीखाते से बाहर रखा और सरकार नियंत्रित वित्तीय संस्थाओं से इन्हें धन मुहैया कराया। या फिर इन्हें अगले साल पर टाल दिया गया। चूंकि सरकार का नकदी लेखा तंत्र बहुत पुराना है इसलिए इसमें भविष्य की देनदारियों को चिह्निïत नहीं किया जाता। ऐसे में छेड़छाड़ आसान हो जाती है। ऐसे में यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि सीएजी रिपोर्ट के आंकड़े वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली के कार्यकाल से पहले पी चिदंबरम के कार्यकाल तक जाते हैं। 

आखिर वित्त मंत्री पर प्रभावी रूप से लगाम कैसे लगाई जा सकती है? एक तरीका सीएजी ने सुझाया है। एक ऐसी व्यवस्था अपनाई जा सकती है जहां बहीखाते से बाहर की देनदारियों को चिह्निïत किया जाए और उनकी रिपोर्ट की जाए। एक अन्य तरीका है संसद को सूचित करना। इसे सार्वजनिक क्षेत्र की ऋण आवश्यकता (पीएसबीआर) कहा जाता है। यह ऐसी व्यवस्था है जिसे ब्रिटिशों ने बहुत लंबे समय तक अपनाया था। इसमें इस बात की पूरी तस्वीर पेश की जाती है कि सरकार अपने धन का क्या करेगी? जब सरकार का राजकोषीय रिकॉर्ड विश्वसनीय दिख रहा हो लेकिन सरकारी ऋण को कम करके बताया जा रहा हो तब आवश्यक अनुशंसाएं की जाती हैं।

राज्यों का प्रदर्शन कुछ मायनों में ज्यादा खराब है। उनका घाटा लगातार बढ़ रहा है। जेपी मॉर्गन के साजिद जेड चिनॉय ने केंद्र और राज्यों के अलावा सरकारी उपक्रमों तथा बहीखाते से बाहर के लेनदेन की पीएसआरबी का आकलन किया। वर्ष 2017-18 में यह जीडीपी के 8.2 फीसदी के बराबर था जो पांच वर्ष पहले के स्तर से कतई अलग नहीं था। कहा जा सकता है कि अगर मुद्रास्फीति की दर और बाह्यï खाता घाटा नियंत्रण में रहता है तो कोई नुकसान नहीं। परंतु यहां दो बातें हैं: पहला, अगर सरकार कम ऋण लेती है तो ब्याज दरों में कमी आएगी और वृद्घि को मदद मिलेगी। दूसरा, एन के सिंह समिति ने कहा है कि जीडीपी की तुलना में सरकारी ऋण का स्तर बहुत अधिक है। चिनॉय कहते हैं कि लोकलुभावन घोषणाएं वृहद आर्थिक नुकसान का कारण बनती हैं। क्या जेटली ये बातें सुनेंगे या चुनाव से ऐन पहले यह मांग कुछ ज्यादा है? फिलहाल जो संकेत हैं वे उत्साहवद्र्घक नहीं हैं। 

Keyword: Budget, Fudget, Profit, Company, Fudge, IMF, Fiscal Deficit,
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