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प्रतिस्पर्धा आयोग की शक्तियों में की जा सकती है कटौती

वीणा मणि / नई दिल्ली January 11, 2019

सरकार प्रतिस्पर्धा अधिनियम में बड़े बदलाव करने की योजना बना रही है। संशोधन पर चर्चा के लिए बनी समिति में कार्य समूह एक 'प्रासंगिक बाजार' की परिभाषा को बदलने पर चर्चा कर रहे हैं। इसके तहत विलय और अधिग्रहण के लिए शुरुआती सीमा को बदलने पर चर्चा हो रही है। 

समिति अधिनियम में उद्यम की परिभाषा को भी बदलने पर चर्चा कर रही है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) प्रासंगिक बाजार के कुल कारोबार के आधार पर उद्यमों पर दंड लगाता है। चर्चा में शामिल सूत्र कहते हैं, 'सरकार के मुताबिक विलय और अधिग्रहण की मौजूदा शुरुआती सीमा जिसे प्रतिस्पर्धा नियामक की मंजूरी से मिली हुई छूट बहुत ही कम है, इसे बढ़ाया जाना चाहिए।' फिलहाल अगर अधिग्रहीत की जाने वाली कंपनी की संपत्ति 250 करोड़ रुपये से अधिक नहीं है और कुल कारोबार 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का नहीं है तो उसे विलय और अधिग्रहण की दृष्टिï से सीसीआई के दायरे से बाहर रखा जाता है। 

कार्य समूह इस पर भी विचार कर रहा है कि दिल्ली में एक केंद्रीकृत पीठ की सीसीआई के विभिन्न पीठ बनाए जाएं। सूत्रों के मुताबिक समिति इस पर भी चर्चा कर रही है कि विलय की जांच के लिए आयोग में कहां पर एक अलग पीठ बनाने की जरूरत है और कहां एंटी-ट्रस्ट मामलों के लिए अलग पीठ की जरूरत है।

सरकार सीसीआई की भूमिका को बढ़ाकर उसे एक ऐसे तंत्र के रूप में विकसित करने पर विचार कर रही है जिसे केंद्र और राज्यों की नीतियां तैयार करने और उसमें सुधार करने के लिए शामिल किया जाएगा। सरकार ऐसा इसलिए करना चाहती है ताकि प्रतिस्पर्धा पर प्रभाव न पड़े। सरकार चाहती है कि सीसीआई थिंक टैंक के तौर पर भी काम करे, जिसके तहत वह केवल प्रतिस्पर्धा नियम को तोडऩे वालों की जांच करने और उस पर जुर्माना लगाने के बजाय नीति प्रारूप का विश्लेषण भी करे।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम को 2002 में लागू किया गया था लेकिन सीसीआई ने 2009 में पूरी तरह से काम करना शुरू किया। मंत्रालय ने कहा कि अधिनियम में बदलाव करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि अब आयाम बदल चुके हैं और इन 9 वर्षों में अर्थव्यवस्था का आकार भी काफी बढ़ गया है। भारत की अर्थव्यवस्था अब दुनिया पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है और आने वाले वर्षों में और आगे बढ़ेगी।  

इस साल के आरंभ में कॉर्पोरेट मामलों के सचिव इंजेति श्रीनिवास ने कहा था कि आयोग को एक नियामक के तौर पर काम करना चाहिए न कि अधिकरण या न्यायालय की तर्ज पर। उन्होंने यह भी कहा था कि अपनी सलाहकारी भूमिका के निर्वहन के दौरान आयोग को और भी कुछ करने की जरूरत है। उन्होंने कहा था कि इसके अलावा, सरकार ने आयोग के क्षेत्रीय कार्यालय बनाने की योजना इसलिए बनाई ताकि केंद्रीय तंत्र पर अधिक दबाव न पड़े।

हाल ही में सरकार ने आयोग में सदस्यों की संख्या को छह से घटाकर तीन कर दिया था। सरकार आयोग को अपने काम का दबाव कम करने के लिए अंशकालिक सदस्य रखने की मंजूरी देने पर विचार कर रही है। इन सदस्यों के निचले स्तर पर आयोग के सचिव, सलाहकार, निदेशक, संयुक्त निदेशक और उप निदेशक के स्तर पर स्वीकृत 91 पदों में आधे से ज्यादा खाली पड़े हैं।

सीसीआई के अंतर्गत महानिदेशालय के कार्यालय, जो मामलों की जांच करता है, में महानिदेशक, अतिरिक्त महानिदेशक, संयुक्त महानिदेशक और उप निदेशक के स्वीकृत 33 पदों में से 17 खाली पड़े हैं। वर्षों से सीसीआई द्वारा पारित कुछ ही आदेशों को प्रतिस्पर्धा अपीलों पर विचार करने वाले अपील निकाय द्वारा रद्द किया गया है। पहले प्रतिस्पर्धा अपीलीय न्यायाधिकरण (सीओएमपीएटी) अपील संस्था थी जिसके स्थान पर 2017 में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय अधिकरण (एनसीएलएटी) का गठन किया गया था।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 में अपील न्यायाधिकरण में सीसीआई द्वारा पारित 87 आदेशों को दरकिनार कर दिया था जो 2016-17 में घटकर 69 और 2017-18 में महज चार हो गई। 

Keyword: , CCI, Competition Commission of India, COMPAT, NCLAT, Government,
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