बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई गवर्नर और मीडिया का मोह
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, May 22, 2019 04:39 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

आरबीआई गवर्नर और मीडिया का मोह

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  January 10, 2019

फिल्म, खेल, राजनीति और सेक्स के बाद अब केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी मीडिया कवरेज में शामिल हो गए हैं। आपने कभी नहीं सोचा होगा कि किसी दिन मीडिया का एक हिस्सा गवर्नर के बारे में भी उतनी ही शिद्दत से कवरेज देगा।  एक वक्त था जब किसी को गवर्नरों के नाम तक नहीं पता होते थे और न ही किसी को इससे फर्क पड़ता था। मुझे 1973 में नौकरी के लिए दिए एक साक्षात्कार की याद है जिसमें आरबीआई गवर्नर के बारे में पूछे जाने पर मुझे कुछ सूझा ही नहीं। मैं तो तुलमोहन राम का नाम भी लेने जा रहा था जो उन दिनों एक बड़े घोटाले की वजह से सुर्खियों में थे। 

 
केंद्रीय बैंक के गवर्नरों की गुमनामी 1980 में उस समय दूर हुई जब पॉल वॉल्कर अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बने और अमेरिका में मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए उन्होंने तरलता पर बेहद कड़ा रुख अपनाया। बढ़ती बेरोजगारी और किसी को दोषी ठहराने की सियासी जरूरत के चलते अमेरिकी मीडिया ने वॉल्कर को बो डेरेक के स्तर तक पहुंचा दिया। डेरेक अपनी फिल्मों में अक्सर कम कपड़ों में नजर आती थीं। हालांकि देर से होड़ में शामिल होने का सिलसिला भारत में जारी रहा। इस तरह भारत में 1980 के दशक में भी कमोबेश पुराना दौर ही  जारी रहा। हालत यह थी कि आरबीआई के बारे में खबरें देते समय भी गवर्नर के नाम को तवज्जो नहीं दी जाती थी। वर्ष 1977 से 1990 के बीच आरबीआई के चार गवर्नर हुए लेकिन समाचारपत्रों में उनका नाम साल भर में मुश्किल से 10 बार ही आता था। जब एक गवर्नर ने अपना पद छोडऩे की धमकी दी थी तब भी कोई सुगबुगाहट नहीं हुई थी। एक अन्य गवर्नर ने तो वास्तव में पद छोड़ भी दिया था। उस समय खबरों में आरबीआई होता था, गवर्नर नहीं।  हालांकि खुद आरबीआई का नाम भी अप्रैल और अक्टूबर में क्रेडिट नीति की घोषणा के समय ही चर्चा में आता था।
 
हालांकि 1990 के दशक में यह तस्वीर बदलने लगी लेकिन उसकी रफ्तार सुस्त थी। एस वेंकटरमणन और सी रंगराजन पुरानी सोच के गवर्नर थे और प्रचार से दूर रहते हुए काम करना पसंद करते थे। यहां तक कि प्रेस के साथ तालमेल रखने वाले विमल जालान भी सिर झुकाकर काम करने में यकीन करते थे और अपने डिप्टी गवर्नरों को बात करने का मौका देते थे। उस समय तक मीडिया की शक्ल नहीं ले पाया प्रेस भी गवर्नर के प्रति नाममात्र की रुचि ही रखता था।  लेकिन वर्ष 2001 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भारत को अपना दोस्त बनाने का फैसला किया और अमेरिकी नीति में अचानक बड़ा बदलाव आ गया। वर्ष 1998 में यही अमेरिका परमाणु परीक्षण करने पर भारत पर प्रतिबंध लगा चुका था लेकिन अमेरिकी नीति में आए बदलाव ने भारत में अचानक ही अमेरिकी डॉलरों का प्रवाह तेज कर दिया। पश्चिमी प्रेस ने भी लंदन और वॉल स्ट्रीट की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आरबीआई गवर्नर को तवज्जो देनी शुरू कर दी। इसका अनुसरण करने में भारतीय मीडिया भी पीछे नहीं रहा। भारतीय मीडिया ऐसा सिरदर्द बन गया कि एक गवर्नर ने मुझसे यह पूछ लिया था कि 'बाइट' (टेलीविजन की शब्दावली में बयान) के लिए इंतजार कर रहे टीवी पत्रकारों के झुंड से कैसे बचा जाए? मैंने उन्हें सलाह दी थी कि किसी ऐसी जगह पर न जाएं जहां पिछला दरवाजा न हो।
 
फिर ऐसा वक्त आया जब गवर्नर को ही सारी कवरेज मिलती देख वित्त मंत्री को जलन महसूस होने लगी और उन्होंने भी बाइट देनी शुरू कर दी। ऐसे में एक वित्त सचिव को अपने मंत्री से यह कहना पड़ा कि बिना सोचे-समझे अचानक कोई बयान न दिया करें। सितंबर 2008 के बाद गवर्नर को मीडिया में और ज्यादा कवरेज मिलने लगी और इसने आरबीआई के मीडिया प्रबंधन में एक अलग मुकाम आ गया। आरबीआई गवर्नर ने सीधे दर्शकों से मुखातिब होना शुरू कर दिया। फिर वर्ष 2013 में रघुराम राजन गवर्नर बने जो देखने में अपने दो पूर्ववर्तियों से एकदम अलग थे। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी, स्पष्ट वक्ता, आईआईटी-आईआईएम-एमआईटी से शिक्षित और वित्त के प्रोफेसर राजन के रूप में भारत को भी अपना बो डेरेक मिल चुका था। मीडिया उनके पीछे पागल हो गया और राजन को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। उनकी सारी विद्वता और सीख भी संदर्भ से हटकर की जाने वाली रिपोर्टिंग को निष्प्रभावी नहीं कर पाई।
 
राजन के बाद ऊर्जित पटेल आरबीआई गवर्नर बने जो मिजाज में 'ट्रैपिस्ट' भिक्षुओं को भी शर्मसार कर सकते हैं। लेकिन अपने विवेक से काम करने का फैसला उनके किसी काम का नहीं साबित हुआ। गवर्नर के मुख्य काम मुद्रास्फीति को काबू में रखने के लिए अगर राजन को 'टोस्ट' किया गया था तो पटेल को 'रोस्ट' कर दिया  गया। शक्तिकांत दास को एक घुमावदार पिच पर बल्लेबाजी करने के लिए भेजा गया है। उन्हें न केवल मीडिया के साथ तारतम्य बिठाना होगा बल्कि एक नए गठजोड़ से भी निपटना होगा जो किसी बजट फंड के बगैर हकदारी का विस्तार कर रहा है। हालांकि दास मीडिया के लिए नए नहीं हैं। वह बीते दशक में कभी अकेले तो कभी समूह में मीडिया से रूबरू होते रहे हैं। खासकर नोटबंदी के दौरान हालात को काबू में रखने की कोशिश के दौरान उनका मीडिया से बखूबी सामना हो चुका है। दास को अब यह तय करना है कि उन्हें आरबीआई गवर्नर के तौर पर अगले तीन साल मीडिया से किस तरह निपटना है? मैं अपनी तरफ से उन्हें दो सुझाव दे सकता हूं। पहला, अपने रुतबे और प्रोटोकॉल को बहुत गंभीरता न दें। रिजर्व बैंक कवर करने वाले पत्रकारों से आप निजी लंच के बहाने मिलें। मेरे खयाल से विमल जालान भी ऐसा करते थे। जहां तक संंपादकों का सवाल है तो वे अधिक अहम नहीं हैं, उनसे समूह में मिला जा सकता है।  दास के लिए मेरा दूसरा सुझाव यह है कि आरबीआई कवर करने वाले संवाददाताओं से वाई वी रेड्डïी की बात का जिक्र कीजिए: 'मैं जो करता हूं उसे देखो, मेरे कहे शब्दों पर न ध्यान दो।'
Keyword: RBI, shaktikant das, bank, loan, NPA,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या म्युचुअल फंड को जिंस डेरिवेटिव की अनुमति उचित है?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.