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सहज बोध पर हावी हैं हड़बड़ी और सांठगांठ

देवाशिष बसु /  January 10, 2019

एमएसएमई को राहत पैकेज मिला और अब आरबीआई के आरक्षित भंडार से भारी मात्रा में नकदी चुनाव पूर्व जारी की जाने वाली योजनाओं में लगाई जा सकती है। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारी आंखों के सामने जब हमारे नेता और बाबू पुरातनपंथी नीतियां लागू करते हैं तो कैसा लगता है? हाल के दिनों में वित्तीय क्षेत्र में जो कुछ घटा है वह इसी बात की बानगी है। बीते दो महीनों के दौरान जो नीतिगत निर्णय लिए गए हैं उन्होंने सरकार को यह मौका दिया है कि वह सरकारी बैंकों के मामले में यथास्थिति बरकरार रख सके। ये वही सरकारी बैंक हैं जिनके फंसे हुए कर्ज में आम करदाताओं का धन बड़ी मात्रा में डूब गया है। इतना ही नहीं इसकी बदौलत सांठगांठ वाले पूंजीपति अत्यधिक समृद्घ भी हो गए हैं। 
 
इसकी शुरुआत वर्ष 2017 में हुई थी लेकिन वास्तविक कदम 2018 की तीसरी तिमाही में देखने को मिला जब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई)और सरकार के बीच दो मसलों पर विवाद गंभीर हो गया। पहला, सरकार आरबीआई के नकदी भंडार का एक बड़ा हिस्सा अपने लिए चाह रही थी और दूसरा शीघ्र सुधारात्मक उपाय (पीसीए) के मानकों को शिथिल करने को कहा जा रहा था। ये मानक कुछ बेहद खराब प्रदर्शन करने वाले सरकारी बैंकों पर लगाए गए थे ताकि वे दोबारा ऋण देने लायक बन सकें। इस बीच कई सरकारी बैंक तो ऐसे थे जहां कोई मुखिया ही नहीं था। 
 
सितंबर 2018 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) डिफॉल्ट कर गई। इससे तमाम गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को लेकर भरोसे का संकट उत्पन्न हो गया। इन कंपनियों ने मदद की गुजारिश के साथ वित्त मंत्रालय की शरण ली। अब सरकार की ओर से आरबीआई के पास तीसरी मांग आई- इन एनबीएफसी की मदद के लिए और अधिक नकदी उपलब्ध कराने की मांग। इसके अलावा अगस्त में जब स्वदेशी जागरण मंच के विचारक गुरुमूर्ति आरबीआई के बोर्ड में शामिल हुए तो उन्होंने नीतिगत एजेंडे को लेकर अपनी निजी मांगें रखनी शुरू कर दीं। उन्होंने कहा कि सूक्ष्म, मझोले और लघु उद्यमों (एमएसएमई) को उबारने के लिए प्रोत्साहन पैकेज दिए जाएं। उपरोक्त चारों विचार पूरी तरह पिछली सरकारों की तरह ही उपयोगिता और सांठगांठ से जुड़े हुए थे। 
 
परंतु आंकड़े बताते हैं कि इनमें से किसी उपाय की कोई आवश्यकता नहीं थी इसलिए जाहिर तौर पर सरकार की राह भी आसान नहीं थी। ये मांगें विशुद्घ रूप से राजनीतिक थीं और इनसे अर्थव्यवस्था को कोई खास लाभ नहीं होना था। बल्कि लंबी अवधि के दौरान इसका नकारात्मक प्रभाव ही पडऩा था। ऐसे में 26 अक्टूबर को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने एक भाषण के दौरान चेतावनी दे डाली कि जो सरकारें केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान नहीं करती हैं वे आज नहीं तो कल वित्तीय बाजारों का संकट पैदा करती हैं, आर्थिक मोर्चे पर आग भड़कने की वजह बनती हैं और आखिर में उन्हें पछताना पड़ता है कि उन्होंने एक अहम नियामक संस्थान की स्वायत्तता को सीमित किया। तीन दिन बाद आरबीआई के एक अन्य डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन ने कह दिया कि बैंकों का काम कठिन समय में कर्जदारों को उबारना नहीं है, उनकी प्राथमिक प्रतिबद्घता जमाकर्ताओं के प्रति होनी चाहिए। यह बात सीधे तौर पर सरकार की इस मांग पर चोट थी कि आरबीआई सरकारी बैंकों और एनबीएफसी के प्रति नरम बनी रहे। 
 
नीति निर्माण से जुड़ा एक सामान्य सबक देते हुए विश्वनाथन ने कहा, 'बैंकों को कर्जदारों की कठिनाई के वक्त झटका सहने वाले जरिये के रूप में नहीं बरता जाना चाहिए क्योंकि उनके पास यह सुविधा नहीं होती कि वे अपने जमाकर्ताओं का भुगतान टाल दें।' पीसीए को शिथिल करने के मामले में उन्होंने कहा, 'ढांचागत सुधारों के स्थान पर नियामकीय शिथिलताओं को अपनाना, अर्थव्यवस्था के हित के लिए घातक हो सकता है।' परंतु देश की मजबूत 'राष्टï्रवादी सरकार' का इरादा अलग ही था। दबाव बनाए रखते हुए वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने खुलकर आरबीआई की आलोचना की और वे केंद्रीय बैंक के खिलाफ अपनी शक्तियों का प्रयोग करने को भी तैयार दिखे। 
 
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक नवंबर के मध्य में प्रधानमंत्री ने आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर ऊर्जित पटेल से मुलाकात की और मामले को समझने का प्रयास किया। इसके बाद विधानसभा चुनाव नतीजों के एक दिन पहले पटेल ने त्यागपत्र दे दिया। एक दिन बाद ही शक्तिकांत दास को आरबीआई का गवर्नर बना दिया गया जो 'वित्त मंत्रालय के आदमी' हैं। इसके तत्काल बाद पीसीए के कड़े मानक निलंबित किए गए, एमएसएमई को राहत पैकेज दिया गया और चुनाव के पहले योजनाओं में इस्तेमाल के लिए आरबीआई के भंडार से बड़ी मात्रा में नकदी निकालने की योजना तैयार की गई। नेताओं के समर्थन से अधिकारियों ने इस तमाम कवायद को अंजाम दिया। 
 
सरकार ने कुछ एनबीएफसी के कारण खड़े संकट को भी थामने का प्रयास किया। बीते कुछ वर्षों में एनबीएफसी बाजार चर्चा में रहा है क्योंकि वे अल्पावधि में अधिक ऋण देकर लंबे समय के लिए उसे उधारी दे रही थीं। इससे उनके कारोबार में जबरदस्त प्रगति नजर आ रही थी और खूब पैसा एकत्रित हो रहा था। इनमें से अधिकांश के पास मजबूत जोखिम प्रबंधन और विविधतापूर्ण पोर्टफोलियो था। परंतु कुछ बड़ी एनबीएफसी ने बिना आधार वाली अचल संपत्ति कंपनियों को जमकर ऋण दिया। ये परिसंपत्तियां चुनिंदा मित्रवत निजी कंपनियों की बदौलत अच्छी नजर आ रही थीं। 
 
आईएलऐंडएफएस संकट के विस्तार के साथ ही इस पर विराम लग गया और ये कंपनियां गहरे संकट में आ गईं। वे बचाव के लिए नकदी चाहती थीं लेकिन पटेल के नेतृत्व में आरबीआई इसके लिए तैयार नहीं था। आमतौर पर कारोबारियों के साथ कम ही दिखने वाले प्रधानमंत्री बुधवार 26 दिसंबर को कुछ घबराए एनबीएफसी कारोबारियों से मिले। यह इस बात का संकेत था कि आरबीआई को उनकी मदद करनी होगी। नए गवर्नर के अधीन आरबीआई इसके लिए तैयार हो गया।  बहुत संभव है कि अप्रत्याशित परिस्थितियों में किसी खास क्षेत्र को सहायता की आवश्यकता पड़े लेकिन यहां मामला ऐसा नहीं था। अधिकांश एनबीएफसी को मदद की आवश्यकता नहीं थी। कुछ खराब एनबीएफसी ने अपने लिए समस्या खड़ी कर ली थी क्योंकि वे किसी भी कीमत पर अपना विकास चाहती थीं। उनको प्रतिस्पर्धा का सामना करने देने के बजाय सरकार ने हमेशा उन्हें उबारा। 
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