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रतनइंडिया पावर के लिए आदित्य बिड़ला एआरसी की बोली जल्द

देव चटर्जी / मुंबई January 10, 2019

आदित्य बिड़ला समूह की ऐसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी रतनइंडिया पावर लिमिटेड के लिए औपचारिक बोली लगाने के करीब है, जिसने 8,200 करोड़ रुपये के कर्ज के भुगतान में चूक की है। अमेरिकी कंपनी वर्डे पार्टनर्स के साथ गठजोड़ कर चुकी आदित्य बिड़ला एआरसी, गोल्डमैन सैक्स और कंपनी के प्रवर्तक राजीव रतन को भी बोली के लिए साझेदार बनाने पर विचार कर रही है। एक अग्रणी बैंक के सूत्र ने यह जानकारी दी। अगर यह कामयाब हुआ तो यह एआरसी के लिए पहला लेनदेन होगा, जिसका गठन पिछले साल अगस्त में किया गया था।
 
लेनदार एआरसी से 21 जनवरी तक बोली मिलने की उम्मीद कर रहे हैं और इस पर 1 फरवरी तक फैसला ले सकते हैं। बैंकों को अमरावती की परियोजना को दी गई उधारी पर 50 फीसदी का घाटा उठाना पड़ सकता है। यह कंपनी महाराष्ट्र में 1350 मेगावॉट बिजली का उत्पादन करती है। रतनइंडिया सात बिजली परियोजनाओं में शामिल है, जिसकी पहचान भारतीय लेनदारों ने कर्ज पुनर्गठन के बाद बेचने के लिए की है। हालांकि पिछले साल 12 फरवरी को जारी भारतीय रिजर्व बैंक के परिपत्र में कर्ज पुनर्गठन पर पाबंदी लगी है, लेकिन लेनदारों को इस मसले पर सर्वोच्च न्यायालय से फैसले की उम्मीद है। बिजली उत्पादक एसोसिएशन की तरफ से दाखिल याचिका अभी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।
 
रतनइंडिया को नासिक व अमरावती में 5600 मेगावॉट बिजली उत्पादन के लिए कोयला आधारित संयंत्र लगाना था। कंपनी पहले इंडियाबुल्स पावर के नाम से जानी जाती थी, लेकिन इंडियाबुल्स के प्रवर्तकों की राह अलग होने के बाद कंपनी का नाम बदल गया। भारतीय लेनदारों ने भारतीय बिजली क्षेत्र को 2.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया है और ये लेनदार भविष्य में कर्ज के पुनर्भुगतान की क्षमता वाले नए निवेशकों को परियोजनाएं बेचने की कोशिश कर रहे हैं। लेनदारों की तरफ से अपनी हिस्सेदारी बिक्री की पेशकश के बाद अदाणी समूह दो बड़ी बिजली परियोजनाएं कोस्टल एनर्जेन व जीएमआर छत्तीसगढ़ को खरीदने में जुट गया है।
 
टाटा पावर और आईसीआईसीआई वेंचर्स के संयुक्त उद्यम रीसर्जेंट पावर वेंचर्स ने जेपी समूह से प्रयागराज पावर प्रोजेक्ट की 75 फीसदी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया है, जब कंपनी कर्ज का भुगतान करने में नाकाम हो गई। प्रयागराज उत्तर प्रदेश में 1980 मेगावॉट का बिजली संयंत्र परिचालित करती है। भारतीय बैंंकिंग क्षेत्र पहले ही 210 अरब डॉलर के फंसे कर्ज से जूझ रहा है। इसमें से 90 फीसदी फंसा कर्ज सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों का है। पिछले साल आरबीआई ने 30 कंपनियों की दो सूची सामने रखी थी, जिन्हें दिवालिया संहिता 2016 के तहत कर्ज समाधान के लिए एनसीएलटी भेजा गया था। लेकिन कुछ मामलों को छोड़ दें तो ज्यादातर मामले कानूनी प्रक्रिया में फंसे हुए हैं। विश्व बैंक के मुताबिक, भारतीय लेनदार औसतन 4.3 साल में अपने कर्ज का महज 26.4 फीसदी हिस्सा ही रिकवर कर पाते हैं जबकि अमेरिका में बैंक अपने कर्ज के एक साल के भीतर 82.1 फीसदी की रिकवरी कर लेते हैं।
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