बिजनेस स्टैंडर्ड - विकासशील से विकसित देश तक का सफर
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विकासशील से विकसित देश तक का सफर

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  January 09, 2019

क्या चीन अभी भी विकासशील देश है? यह सवाल आने वाले दिनों में बार-बार पूछा जाने वाला है। भारत सरकार को भी इस पर एक निर्णायक राय रखनी होगी।  चीन अब महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला देश है। यह दुनिया की दो शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उसका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद अनुमानत: 10,000 डॉलर का स्तर पार कर चुका है। जल्दी ही यह औसत वैश्विक प्रति व्यक्ति आय का स्तर पार कर जाएगा।चार वर्ष के भीतर ही विश्व बैंक इसे उच्च आय वाले देश का दर्जा दे देगा। 

 
चीन में एक ताकतवर सरकार है और उसके पास धन संसाधन की भी कमी नहीं। उसके पास इतना मुद्रा भंडार है जो उसे आसानी से किसी भी घरेलू संकट से बचा सकता है। यह नकदी बुनियादी विकास तथा विदेशों में काम कर रही कंपनियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में भी काम आ सकती है। उसकी समस्याएं भी अमीर राष्ट्रों वाली हैं। उसे अधिक नवाचारी वृद्धि पथ की ओर बदलाव का प्रबंधन करना है, बिजली वितरण नेटवर्क का विस्तार करने के बजाय उसे अपने कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण कायम करना है, शहरी जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है, विदेश और व्यापार नीति को अपने नए कद के अनुसार समायोजित करना है आदि। परंतु चीन के नेता इसे इस नजरिये से नहीं देखते। उनका जोर इस बात पर है कि चीन को विकासशील देश की दृष्टि से देखा जाए क्योंकि उसके पास भी वही समस्याएं और अवसर हैं जो यह दर्जा प्राप्त अन्य देशों के पास हैं। यह केवल परिभाषा के स्तर पर व्याप्त अंतर नहीं है क्योंकि अन्य सभी पहलुओं में चीन का शी चिनफिंग प्रशासन यह जताता आया है कि विश्व परिदृश्य पर चीन का आगमन हो चुका है। 
 
सच यही है कि चीन चुनिंदा समस्याओं के साथ विकासशील देश होने के तमाम फायदे भी उठाना चाहता है। उदाहरण के लिए जो विकासशील देश अपने यहां मुक्त, अधिकारप्राप्त और स्वतंत्र निजी क्षेत्र का विकास कर पाने में नाकाम रहे हैं, उन्हें कारोबारी चर्चाओं में कुछ रियायत दी जाती है। यह इसलिए क्योंकि ऐसे देशों में निजी क्षेत्र की सहायता की जरूरत होती है। इस बीच सरकारी कंपनियां आर्थिक राष्ट्र निर्माण की प्राथमिक वाहक बनी रहती हैं। परंतु चीन बहुत पहले उस चरण को पार कर चुका है। अब वह अपने मजबूत सरकारी क्षेत्र का इस्तेमाल न केवल अर्थव्यवस्था पर कम्युनिस्ट पार्टी के निरंतर नियंत्रण के लिए करता है बल्कि वह अपनी आक्रामक विदेश नीति में भी इसे प्रयोग में लाता है। अन्य लोग स्वाभाविक तौर पर यह प्रश्न पूछेंगे कि आखिर विकासशील देश के दर्जे का इस्तेमाल चीन के निजी क्षेत्र में सुधार के प्रति अनिच्छा की आलोचना के बचाव के लिए क्यों किया जाना चाहिए?
 
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इस व्यवहार की झलक देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग में चीन की इस बात के लिए सराहना की जा रही है कि उसने जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते को संभव बनाने के लिए अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौते पर अग्रिम हस्ताक्षर किए। हकीकत तो यह है कि उसने अतीत में जलवायु परिवर्तन पर बाध्यकारी समझौते से बचने के लिए विकासशील देशों के पीछे छिपने का प्रयास किया। पेरिस समझौता संधि नहीं है, इसलिए यह बाध्यकारी भी नहीं है। इससे केवल चीन के हित का पोषण हुआ। चीन का विनिर्माण और बुनियादी विकास का काम हो चुका है तो वह रियायत देने को तैयार है। 
 
विकसित देशों के लिए यह व्यवहार पहले से ही खतरनाक है। पश्चिमी देशों में इससे लोकलुभावनवाद का संदेश जाता है। वे इसे चीन तथा उस जैसे अन्य देशों को दी जा रही प्राथमिकता के रूप में देखते हैं। हकीकत में वैश्वीकरण के विभिन्न संस्थान, समझौते और मानक विकसित और विकासशील देशों में समुचित भेद करते हैं। दोनों के बीच का भेद सुस्पष्ट नहीं है और न ही व्यापक। अगर अब विकसित देश इस भेद को समाप्त करना चाहते हैं प्राथमिक तौर पर ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि माना जाता है कि चीन अवांछित लाभ ले रहा है। 
 
ऐसे में जरूरत इस बात की है कि अन्य विकासशील देश अपने राष्ट्रीय हितों पर खुलकर नजर डालें। दो बातें एकदम स्पष्ट हैं: पहली, विकसित देशों को उनके और विकासशील देशों के बीच का भेद खत्म करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। दूसरा आधारभूत बिंदु यह है कि चीन को अब अन्य विकासशील देशों के समान रियायत नहीं दी जानी चाहिए। भारत की प्रतिव्यक्ति आय चीन की तुलना में पांचवें हिस्से के बराबर है और हम निम्र मध्य आय वाले देश हैं। अंतरराष्ट्रीय जगत में हमारे और चीन के हित अलग-अलग हैं। उसे चीन और पश्चिम दोनों द्वारा चीन के समकक्ष बताए जाने पर आपत्ति करनी चाहिए। चीन के साथ अंतर स्पष्ट करना भारत के हित में हैं। अन्य देश भी चीन के साथ जोड़े जाने के खतरे को पहचानें तो यह उनके भी हित में होगा। खासतौर पर तब जबकि चीन पर यह इल्जाम हो कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का लाभ ले रहा है जबकि भारत को ऐसा कोई लाभ नहीं है। भारत को आगे बढ़कर यह पहल करनी चाहिए कि विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष दर्जा मिले और वे देश इस सूची से बाहर हो जाएं जिन्हें अब विशेष दर्जे की आवश्यकता नहीं रही। 10,000 डॉलर से 12,000 डॉलर का प्रति व्यक्ति आय का स्तर तय करके चरणबद्घ ढंग से काम शुरू किया जा सकता है। यानी इस श्रेणी में आने वाले देशों को विकासशील देशों की श्रेणी में नहीं गिना जाएगा। माना जा सकता है कि इन देशों के पास अन्य विकसित देशों की तरह अपनी राह बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। अगर भारत तथा अन्य विकासशील देश ऐसा नहीं करते तो भविष्य में उन्हें काफी नुकसान हो सकता है। अतीत में भारत को खुद को चीन से अलग करके न देखने का काफी नुकसान उठाना पड़ चुका है। 
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