बिजनेस स्टैंडर्ड - बढ़ते दाम से खाद्य मुद्रास्फीति की आशंका
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बढ़ते दाम से खाद्य मुद्रास्फीति की आशंका

दिलीप कुमार झा / मुंबई January 08, 2019

किसानों को बड़ी राहत के रूप में प्रमुख कृषि जिंसों के दामों में मजबूती आनी शुरू हो गई है। रकबे और रबी के मौजूदा कटाई सीजन में कम उत्पादन के अनुमान के कारण ऐसा हो रहा है। अलबत्ता कृषि जिंसों में मूल्य वृद्धि से खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ेगी। बेंचमार्क लातूर (महाराष्ट्र) बाजार में अरहर की कीमतें दो महीने में 32 प्रतिशत तक बढ़कर 48.5 रुपये प्रति किलोग्राम हो गईं जो 31 अक्टूबर को 37 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। इसी तरह दालों की अन्य सभी किस्मों की कीमतें भी इस अवधि में बढ़ चुकी हैं। न केवल दाल बल्कि अन्य कृषि जिंसों जैसे रागी, बाजरा और ज्वार के दामों भी नवंबर और दिसंबर के बीच तीव्र वृद्धि देखी गई है।
 
कृषि जिंसों की यह मूल्य वृद्धि आने वाले महीनों में निश्चित रूप से थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) को बढ़ा देगी। लेकिन निकट भविष्य में होने वाले आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए संभवत: सरकार डब्ल्यूपीआई और सीपीआई में वृद्धि का कोई जोखिम नहीं उठाना चाहेगी और इसलिए कृषि जिसों की कीमतों पर नजर रखी जा सकती है। केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि रबी सीजन में रकबे और उत्पादन में कमी के अनुमान के कारण कृषि जिंसों  की कीमतें बढऩे लगी हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु में सूखे तथा गुजरात और कुछ अन्य प्रमुख कृषि प्रधान राज्यों में भी बारिश का असमान वितरण होने के बाद कुछ विशेष मामलों में इस साल भी खरीफ का उत्पादन कम रहा है। फिलहाल मूल्य वृद्धि पर दबाव बना रहेगा। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि कृषि जिंसों की कीमतों में तेजी आएगी। किसानों की आय में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकार पर बहुत अधिक दबाव की बात को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि इससे भी कीमत वृद्धि का रुख रहेगा। इसलिए मार्च से खाद्य मुद्रास्फीति में इजाफे की संभावना है।
 
कृषि मंत्रालय द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार रबी के इस बुआई सीजन में कुल रकबे में 4 जनवरी तक 3.41 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और चालू सीजन में यह घटकर 5.644 करोड़ हेक्टेयर रह गया जबकि पिछले वर्ष इस दिन तक यह 5.844 करोड़ हेक्टेयर था। वार्षिक उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान करने वाले रबी सीजन के चावल का रकबा 25 प्रतिशत कम होकर 14 लाख हेक्टेयर हो गया। दूसरी ओर दलहन के अंतर्गत रकबा इस वर्ष 6.44 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1.436 करोड़ हेक्टेयर रह गया। पिछले साल इस समय तक इसका रकबा 1.534 करोड़ हेक्टेयर था। मोटे अनाज के रकबे में भी इस साल 17.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह घटकर 43.3 लाख हेक्टेयर रह गया जबकि पिछले साल यह 52.4 लाख हेक्टेयर था। इस साल तिलहन के अंतर्गत रकबा 1.54 प्रतिशत कम होकर 75.2 लाख हेक्टेयर रहा जो पिछले साल 76.3 लाख हेक्टेयर था।
 
क्रिसिल रिसर्च की निदेशक हेतल गांधी ने कहा कि किसानों के हाथों में कम पैसा (फसलों से कम आमदनी) होने से भी इस साल रबी की बुआई पर असर पड़ा है। प्रमुख फसलों के मंडियों के दाम (14 में से 11 फसलों के दाम बढ़ चुके हैं। इस साल खरीफ उत्पादन में करीब एक प्रतिशत वृद्धि के बावजूद इन 14 फसलों की आवक में 17 प्रतिशत की गिरवाट आई है) भी यही इशारा कर रहे हैं कि किसान या बिचौलिए स्टॉक रोक रहे हैं। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सीजन दीर्घ अवधि के औसत (एलपीए) की 9.4 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ। हालांकि इसे भारतीय मौसम विभाग द्वारा सामान्य रूप में वर्गीकृत किया गया है लेकिन वर्षा का वितरण समय और क्षेत्रों के लिहाज से काफी हद तक पेचीदा रहा है। 
Keyword: agri, farmer, crop, jins,,
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