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ई-कॉमर्स नीति पर सरकारी रुख और चुनावी गणित

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  January 08, 2019

ई-कॉमर्स सेवा-प्रदाता कंपनियों के बारे में अपनी नीति पर सरकार के रुख में बार-बार बदलाव इस ओर इशारा करता है कि देश आम चुनाव की तरफ बढ़ रहा है और प्रभावशाली तबकों की लॉबीइंग की ताकत आने वाले दिनों में अधिक तीव्रता से दिखेगी। एमेजॉन और फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों को बिक्री सेल के लिए खास सौदे करने से रोकने वाला परिपत्र जारी होने के कुछ दिन बाद ही सरकार ने यह स्पष्टीकरण जारी किया है कि पाबंदियों के दायरे में इन कंपनियों के अपने ब्रांड नहीं आते हैं। 

 
एमेजॉन और फ्लिपकार्ट अपने 30 ब्रांड के तहत 200 से अधिक श्रेणियों में उत्पाद मुहैया कराते हैं। इस लिहाज से सरकार का गुरुवार को आया आदेश दोनों ही ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए राहत लेकर आया है। हालांकि उनकी सभी चिंताएं दूर नहीं हुई हैं और नीति में बदलाव के नतीजे कुछ समय बाद ही पता चल पाएंगे। देखने से यही लगता है कि सरकार का ई-कॉमर्स कारोबार संबंधी पुराना निर्णय उन सभी छोटे खुदरा विक्रेताओं के लिए समान अवसर मुहैया कराने से प्रेरित था जो एमेजॉन और फ्लिपकार्ट के जरिये भारत में अपने उत्पाद बेचना चाहते हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को अपनी इक्विटी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के उत्पाद बेचने से रोकने वाले उस फैसले में राजनीति की भूमिका साफ नजर आ रही थी। दरअसल ई-कॉमर्स एक ऐसा क्षेत्र है जहां सौ फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति है लेकिन ऐसे खुदरा विक्रेताओं पर प्रतिबंध की शर्त यह है कि वे केवल दूसरी विक्रेता कंपनियों की बिक्री का ही प्लेटफॉर्म बन सकते हैं।
 
खुदरा कारोबारा में विदेशी निवेश भारत में हमेशा एक विवादास्पद राजनीतिक मुद्दा रहा है। मनमोहन सिंह की अगुआई वाली संप्रग सरकार ने वर्ष 2011 में मल्टी-ब्रांड खुदरा कारोबार में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और एकल-ब्रांड खुदरा कारोबार में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी देने का फैसला किया था। लेकिन उसके साथ एक अनूठी शर्त भी रखी गई थी। भारत की एफडीआई नीतियां कभी भी राज्य-स्तरीय अनुमति का विषय नहीं रही हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और वामपंथी दलों के कड़े विरोध के चलते संप्रग सरकार ने खुदरा कारोबार में एफडीआई के लिए यह शर्त रख दी कि भारत में एकल या बहुल-ब्रांड का खुदरा प्रतिष्ठान खोलने की मंशा रखने वाली विदेशी कंपनियों को उन राज्यों से भी मंजूरी लेनी होगी जहां पर वे कारोबार करना चाहती हैं। इस तरह जब भाजपा ने वर्ष 2014 में केंद्र में अपनी सरकार बनाई तो खुदरा क्षेत्र के लिए एफडीआई नीति में किसी भी राहत की उम्मीद नहीं थी। भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में कारोबारियों की बड़ी तादाद रही है, लिहाजा विदेशी खुदरा विक्रेता कंपनियों को यह डर सता रहा था कि कहीं एफडीआई नीति में दी गई रियायतों को वापस न ले लिया जाए। लेकिन ऐसा होने के बजाय वर्ष 2016 में भाजपा सरकार ने मार्केटप्लेस ई-कॉमर्स में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी देकर सबको अचरज में डाल दिया। इस कदम का सर्वाधिक फायदा एमेजॉन और फ्लिपकार्ट को हुआ। उस समय तक एमेजॉन भारत में अपनी ई-कॉमर्स गतिविधियां शुरू कर चुका था जबकि फ्लिपकार्ट ऑनलाइन खुदरा बाजार की बड़ी कंपनी बन चुकी थी। सरकार की इस नीति से ही प्रोत्साहित होकर वॉलमार्ट ने 2018 की शुरुआत में फ्लिपकार्ट में निवेश का मन बनाया। इसने फ्लिपकार्ट में नियंत्रक हिस्सेदारी लेने के लिए करीब 16 अरब डॉलर का निवेश किया था।
 
इस सौदे ने भाजपा के भीतर एक सियासी तूफान पैदा कर दी थी। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी भारतीय प्रवर्तकों वाली कंपनी फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण की इजाजत एक अमेरिकी कंपनी को दिए जाने पर सवाल उठाए थे। तीन हिंदीभाषी राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में गत महीने मिली चुनावी शिकस्त ने भाजपा के परंपरागत वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकने वाली नीतियों को लेकर पार्टी के भीतर सुगबुगाहट तेज कर दी है। छोटे कारोबारियों के प्रतिनिधि संगठनों ने इस नीति में बदलाव की मांग तेज कर दी थी। ऐसे में आम चुनावों के कुछ महीने ही दूर रहने से ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ऐसी पाबंदियों की आशंका पहले से थी।
 
कुछ हफ्ते पहले सरकार सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों (एमएसएमई) की मदद के लिए कर्ज मंजूरी के सरल मानकों वाला नीतिगत पैकेज लेकर आई थी। इसमें एमएसएमई को 59 मिनटों के भीतर कर्ज मंजूर करने का वादा किया गया है। इसी तरह, इन इकाइयों को रोजमर्रा के कई नियमों के अनुपालन के लिए अदालतों के चक्कर काटने की परेशानी से भी निजात दे दी गई है। तेजी से ऋण स्वीकृत करने और अधिक सरल नियामकीय अनुपालन होने का वास्तविक असर यह हुआ है कि कई तरह की समस्याएं पैदा हो गई हैं। लेकिन सरकार यह संदेश देने में सफल रही कि वह एमएसएमई क्षेत्र की मुश्किलों से परिचित है और उन्हें नोटबंदी से लगी चोट से उबारने में मदद करने के लिए वह तैयार है।
 
गुरुवार का परिपत्र जारी होने के बाद बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां अब अपने कारोबार को नए मानकों के अनुरूप नए सिरे से ढालने में जुट गई हैं। सरकार नए कारोबारों में विदेशी निवेश को आकर्षित करना आगे भी जारी रख सकती है। लेकिन दुनिया के बीच यह संदेश गया है कि भारत में चुनाव होने वाले हैं और सरकार राजनीतिक रूप से अहम उद्योगों और कारोबारों को ध्यान में रखते हुए फैसले लेने से गुरेज नहीं करेगी। अगर इन फैसलों से कारोबार के बुनियादी नियमों में अचानक फेरबदल होता है तो भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। चुनाव करीब आते ही विदेशी निवेशक भारत में नई पूंजी लगाने या मौजूदा कारोबार के विस्तार से खुद को दूर रखने की सोच सकते हैं। चुनाव खत्म होने के बाद ही कारोबारी गतिविधियां तेजी पकड़ेंगी। इस तरह चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। 
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