बिजनेस स्टैंडर्ड - रक्षा खरीद विभाग के पुनर्गठन की जरूरत
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रक्षा खरीद विभाग के पुनर्गठन की जरूरत

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  January 07, 2019

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला है लेकिन रक्षा खरीद परिदृश्य नाकामी से भरा है। रक्षा मंत्री रहते समय मनोहर पर्रिकर ने रक्षा खरीद में तेजी लाने के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) को सरल बनाने का वादा किया था। एक साल की देरी के बाद जब वर्ष 2016 में डीपीपी जारी हुआ तो वह 2013 के 421 पृष्ठों वाले पिछले संस्करण से 9 पृष्ठ ज्यादा ही था। इसमें खरीद प्रक्रिया को 137 हफ्ते से घटाकर 126 हफ्ते करने की बात कही गई थी। गत मार्च में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने रक्षा उत्पादन नीति (डीपीआरपी) 2018 का मसौदा जारी किया था जिसमें कुछ बड़े लक्ष्य रखे गए थे। वर्ष 2025 तक भारत को दुनिया के शीर्ष पांच रक्षा उत्पादकों में शामिल करना और रक्षा क्षेत्र में 30 लाख रोजगार पैदा करने की बातें की गई थीं। उस साल तक भारत को रक्षा निर्यात दस गुना बढ़ाकर 5 अरब डॉलर पहुंचाने के साथ ही लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, हथियारबंद वाहन और मिसाइल विनिर्माण में आत्मनिर्भर बनना होगा। इतनी जल्दबाजी दिखाई गई कि हितधारकों को एक हफ्ते में ही अपनी राय देने को कहा गया। लेकिन उसके बाद से कुछ भी सुनाई नहीं दिया है। 

 
रक्षा मंत्रालय ने अप्रैल में समायोजन नीति का मसौदा जारी किया था जिसमें रक्षा विनिर्माण ढांचा खड़ा कर वेंडरों को ऑफसेट पूरा करने की मंजूरी देने का प्रस्ताव था। इसके लिए उच्च तकनीक पैदा करने वाली परियोजनाओं के प्रायोजन और भारत में अभी तक नदारद तकनाकों के हस्तांतरण को जरिया बनाने की बात कही गई थी। इसमें उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो रक्षा उद्योग गलियारों में निवेश करने पर विशेष प्रोत्साहन देने का भी प्रस्ताव था। लेकिन अभी तक इस मसौदे पर कोई प्रगति नहीं हो पाई है। फरवरी में रक्षा मंत्री ने अहम हथियार खरीद की पड़ताल और उनमें हो रहे विलंब के कारण जानने के लिए 13 सदस्यीय परामर्श समिति बनाई थी। समिति को 31 मार्च 2018 तक प्रारंभिक स्थिति रिपोर्ट देनी थी लेकिन अभी तक इसकी बैठक ही नहीं हो पाई है। 
 
रक्षा खरीद संगठन (डीपीओ) बनाने की पहल भी परवान नहीं चढ़ पाई है। भाजपा ने 2014 के चुनाव में कांग्रेस की अगुआई वाले संप्रग पर रक्षा खरीद में ढिलाई बरतने के आरोप लगाते हुए सैन्यबलों को आधुनिक बनाने और रक्षा शोध एवं विकास को बढ़ावा देने का वादा किया था। स्वदेशी रक्षा तकनीकों के विकास और रक्षा सौदों के जल्द क्रियान्वयन की बात भी कही गई थी। राजग सरकार को रक्षा खरीद में सुधार करने में दो साल लग गए। धीरेंद्र सिंह समिति ने रक्षा मंत्रालय से इतर एक डीपीओ बनाने की जरूरत पर बल दिया था जिसके बाद पर्रिकर ने इसे विवेक राय की अध्यक्षता वाली एक और समिति के हवाले कर दिया। राय मौजूदा रक्षा खरीद ढांचे को ही मजबूत बनाना चाहते थे लेकिन सहमति नहीं बन पाने पर उन्होंने सितंबर 2016 में इस्तीफा दे दिया। उसके बाद 'प्रबंधन विशेषज्ञ' प्रीतम सिंह इस समिति के चेयरमैन बने। मार्च 2017 में रक्षा मंत्रालय ने संसद में बताया कि इस समिति ने एक केंद्रीय, स्वायत्त एवं अधिकार-संपन्न पेशेवर संगठन बनाने की अनुशंसा की है। उसके बाद से इस पर चुप्पी छाई हुई है।
 
हालांकि कोई भी सरकार डीपीओ में सुधार को देर तक टाल नहीं सकती है। इस दौरान चार पहलू ध्यान में रखे जाने चाहिए। पहला, नए डीपीओ का ध्यान महज रक्षा खरीद पर नहीं बल्कि समग्र रूप में रक्षा अधिग्रहण पर होना चाहिए। रक्षा अधिग्रहण में सैन्य जरूरतों को स्वदेशी विकास से भी पूरा करने पर जोर रहता है। रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) फिलहाल 370 अरब रुपये से अधिक मूल्य की 52 परियोजनाएं चला रहा है। मिशन मोड में चलने वाले इन परियोजनाओं (एमएमपी) पर सेना को खुली छूट होती है क्योंकि वह इनमें हितधारक नहीं है और इन्हें अधिग्रहण विकल्प भी नहीं मानती है। इस स्थिति को दूर करने के लिए सेना को एमएमपी में वित्तीय भागीदार बनना चाहिए। संशोधित डीपीओ को ऐसे अधिकार मिलें कि वह सीधी खरीद, तकनीक हस्तांतरण के तहत विनिर्माण या एमएमपी के जरिये सेना की जरूरत पूरी कर सके। डीआरडीओ के प्रयासों और अधिग्रहण का काम देखने वालों के बीच की खाई भरनी होगी। 
 
दूसरा, डीपीओ सुधार में एकदम नया ढांचा खड़ा करने से परहेज किया जाना चाहिए। हरेक अधिग्रहण एक अलग गतिविधि होती है लिहाजा उसका संचालन कार्यक्रम प्रबंधकों के हाथों में देना चाहिए।  एकीकृत कार्यक्रम दल (आईपीटी) में उस रक्षा उत्पाद के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए। हरेक खरीद परियोजना के लिए अलग विशेषज्ञों की जरूरत होगी लिहाजा आईपीटी का गठन और पुनर्गठन होते रहना चाहिए। ऐसा लचीला ढांचा कठोर एवं केंद्रीकृत डीपीओ के आधार को खत्म करेगा। तीसरा, संशोधित डीपीओ को रक्षा उपकरणों के अधिग्रहण पर खास ध्यान देना होगा ताकि वरिष्ठ अधिकारियों का वक्त बचे। फिलहाल  खरीद प्रक्रिया में सेना के सभी अंगों के प्रमुखों के अलावा रक्षा, रक्षा उत्पादन और रक्षा शोध ïएवं विकास के सचिव शामिल होते हैं। रक्षा सचिव दीर्घावधि रणनीति बनाने के बजाय अपना 60 फीसदी वक्त खरीद संबंधी गतिविधियों में ही लगाते हैं। रक्षा अधिग्रहण प्रकोष्ठ को उन्नत कर सचिव स्तर के अधिकारी के अधीन अलग विभाग बना देना इसका उपाय है।
 
अंतिम और शायद सबसे मुश्किल मसला नए डीपीओ में विशेषज्ञता रखने वाले अधिग्रहण प्रबंधकों की नियुक्ति का है। एक तरफ आईएएस अधिकारी किसी दूसरे कैडर को रक्षा अधिग्रहण का वरिष्ठ पद देनेे के प्रस्ताव का विरोध करेंगे। दूसरी तरफ मेधावी अधिकारी भी अधिग्रहण में लंबा कार्यकाल नहीं चाहेंगे क्योंकि यह बेहद जोखिम वाला काम है। 
Keyword: defense, military, navy, NDA, BJP,,
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