बिजनेस स्टैंडर्ड - उथलपुथल में भी टिकेंगे तो फायदे में रहेंगे
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उथलपुथल में भी टिकेंगे तो फायदे में रहेंगे

संजय कुमार सिंह /  January 06, 2019

साल 2018 तो गुजर गया, लेकिन म्युचुअल फंड निवेशकों को चोट दे गया, जिन पर दोहरी मार पड़ी। सबसे पहला झटका तो प्रतिफल के मोर्चे पर मिला क्योंकि इक्विटी फंडों से प्रतिफल बहुत मायूस करने वाला रहा। डेट फंड से भी मामूली राहत ही मिली क्योंकि पूरे साल ब्याज दरों में काफी उतार-चढ़ाव रहा। आईएलऐंडएफएस संकट के कारण ऋण का जोखिम भी सामने खड़ा हो गया। नए साल यानी 2019 से भी बहुत उम्मीद रखना बेमानी होगा क्योंकि यह साल भी उथलपुथल भरा रहने वाला है। इसकी वजह वैश्विक स्तर पर तरलता यानी नकदी की तंग हालत और आने वाले लोकसभा चुनाव हैं। मगर इसका यह मतलब नहीं है कि पूरी तरह मायूस हो जाएं। निवेशकों को भरोसा बरकरार रखना होगा और स्थिति बदतर होने पर भी निवेश जारी रखना पड़ेगा।

 
इक्विटी निवेशकों के लिए मायूसी भरा साल
 
पिछले कुछ सालों में शेयर बाजार तेजी से कुलांचे भरते रहे हैं, जिसकी वजह से शेयरों का मूल्यांकन आसमान पर पहुंच गया। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) के कार्यकारी निदेशक और मुख्य निवेश अधिकारी एस नरेन अपना नजरिया सामने रखते हुए कहते हैं, 'हमें लगता है कि बाजार का अधिक मूल्यांकन ही खराब प्रदर्शन का प्रमुख कारण रहा।' पिछले कई साल से कंपनियों की आय कमजोर ही रही है। हालांकि जुलाई-सितंबर तिमाही में आय में कुछ सुधार दिखा, लेकिन सुधार बरकरार रहेगा या नहीं, यह देखने की बात है।
 
भारत और विदेश सभी जगहों पर केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं और तरलता की स्थिति तंग हो गई है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 2018 के दौरान ब्याज दरों में चार बार इजाफा किया। ब्याज दरें बढ़ती हैं तो शेयरों का प्रदर्शन कमजोर हो जाता है। कच्चे तेल ने भी पिछले साल नहीं बख्शा। अक्टूबर में ब्रेंट क्रूड 86.67 डॉलर प्रति बैरल तक चढ़ गया। इसकी वजह से रुपये की हालत पतली हो गई और चालू वित्त वर्ष के दौरान चालू खाते के घाटे में इजाफा होने की आशंका खड़ी हो गई। चूंकि भारत की वृहद आर्थिक तस्वीर बिगड़ गई (और ब्याज दरों ने अमेरिका को निवेश के लिहाज से आकर्षक ठिकाना बना दिया), इसलिए विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारत के शेयर बाजारों से रकम निकालकर हवा हो गए। पिछले एक साल के दौरान उन्होंने भारत से करीब 38,400 करोड़ रुपये निकाले हैं।
 
लार्ज कैप ने दिखाया दम
 
लार्ज कैप इक्विटी फंड झंझावात को ज्यादा झेलते दिखे और मिड तथा स्मॉल कैप फंडों की तुलना में उनमें कम गिरावट आई। नरेन कहते हैं, 'मूल्यांकन की बात करें तो लार्ज कैप के मुकाबले मिड और स्मॉल कैप शेयरों की कीमत कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर लगाई गईं। इसलिए जब बाजार में गिरावट आई तो बढ़ी हुई कीमत वाले ये शेयर सबसे ज्यादा पिटे।' वृहद आर्थिक माहौल का भी इस पर असर पड़ा। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के मुख्य वित्तीय योजनाकार विशाल धवन का कहना है, 'जब ब्याज दरें बढ़ रही होती हैं तो मिड और स्मॉल कैप शेयरों पर लार्ज कैप शेयरों की तुलना में ज्यादा ही असर होता है।'
 
इस साल भी रहेगी उथलपुथल!
 
अमेरिकी फेड दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रखना चाहता है (उसने ब्याज दरों में दो बार इजाफा करने की बात कही है) और दूसरे वैश्विक केंद्रीय बैंक भी तरलता कम कर रहे हैं। साथ ही अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्घ जारी है। ऐसे में एफआईआई से निवेश की आवक में भी उतार-चढ़ाव दिख सकता है। करीब 54 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क चुके कच्चे तेल में एक बार फिर उबाल आ सकता है। अगर पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने उत्पादन में कटौती की तो इसकी आशंका ज्यादा है। देश में आम चुनाव भी होने ही वाले हैं। चुनाव से पहले और बाद में बाजार पर असर नजर आना तय है।
 
लालच में मत निकलें बाजार से
 
चुनावों से ऐन पहले यह सोचकर बाजार से मत निकलें कि चुनाव निपटने के बाद दोबारा निवेश करने पहुंच जाएंगे। नरेन कहते हैं, 'चुनावी साल में हमेशा ही शेयर बाजारों के लिए उथलपुथल भरा समय होता है। इससे पहले 2004, 2009 और 2014 में आम चुनाव हुए थे और तीनों साल में एसआईपी तथा एसटीपी के जरिये निवेश करना सबसे फायदेमंद साबित हुआ है। तीन साल का नजरिया लेकर 2019 में भी निवेश बरकरार रखना चाहिए।' मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक-प्रबंधक शोध कौस्तुभ बेलापुरकर की राय भी कुछ ऐसी ही है। वह कहते हैं, 'अपने संपत्ति आवंटन पर डटे रहिए और कुछ समय के लिए आने वाली उथलपुथल से बचने के लिए लंबे समय तक निवेश करते रहिए।' धवन एक और नुस्खा देते हैं। उनकी सलाह है कि देसी बाजार में उथलपुथल से बचने के लिए अपने इक्विटी फंड पोर्टफोलियो का एक हिस्सा अंतरराष्ट्रीय फंडों में लगाना अच्छा रहेगा। 
 
आपके लार्ज-कैप आवंटन का एक हिस्सा, मान लीजिए 25 फीसदी हिस्सा इंडेक्स फंड या एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में जा सकता है। आदित्य बिड़ला सन लाइफ एएमसी के मुख्य कार्य अधिकारी ए बालसुब्रमण्यन कहते हैं, '2018 जैसे साल भी आते हैं, जब ज्यादातर फंड प्रबंधक सूचकांक से बेहतर प्रदर्शन करने में नाकाम रहते हैं। ऐसे साल में अगर आप पैसिव फंड में निवेश करते हैं तो साल आपके लिए कुल मिलाकर अच्छा रह सकता है।'
 
कम अवधि के डेट फंड रहे बेहतर
 
2018 के दौरान ब्याज दरों में बहुत उतार-चढ़ाव रहा। साल में ज्यादातर समय दरें चढ़ती ही रहीं और पिछले दो महीनों में ही इनमें गिरावट देखी गई। एफआईआई ने पिछले कैलेंडर वर्ष के दौरान डेट बाजार से तकरीबन 502 अरब रुपये निकाल लिए हैं। अधिक लंबी अवधि के फंडों का प्रदर्शन खासा खराब रहा। बालसुब्रमण्यन बताते हैं, 'जब ब्याज दरों में इजाफा होता है तो लंबी अवधि के फंडों पर अधिक चोट पड़ती है। कम अवधि के फंड कम परिपक्वता अवधि वाले बॉन्डों में निवेश करते हैं। जब ये बॉन्ड परिपक्व हो जाते हैं तो दर बढऩे की सूरत में इनसे मिली रकम को अधिक प्राप्ति वाले बॉन्डों में लगा दिया जाता है। यही वजह है कि ऐसे फंडों का प्रदर्शन बेहतर रहता है।'
 
अवधि और क्रेडिट जोखिम पर रखें नजर
 
2918 में ब्याज दरों में भारी उतार-चढ़ाव से निवेशकों को सबक लेना चाहिए। धवन की सलाह है, 'डेट फंड को बेहतर कर बचत वाले सावधि जमा (एफडी) मानकर मत बैठ जाइए। इन फंडों में भी उतार-चढ़ाव आ सकता है। अब तो फंड प्रबंधकों के लिए भी ब्याज दरों की चाल को भांप पाना मुश्किल होता जा रहा है। इस साल दिखा कि देसी कारकों के अलावा बाहरी कारक जैसे कच्चे तेल की कीमतों में एकाएक तेज कमी आने से भी बॉन्ड पर असर पड़ सकता है।' कई निवेशक क्रेडिट जोखिम वाले फंडों में केवल इसीलिए रकम लगाते रहे कि अतीत में उन्हें वहां से ऊंचा प्रतिफल मिला था। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि ऐसे फंडों में जोखिम ज्यादा है। बेलापुरकर कहते हैं, 'आईएलऐंडएफएस संकट ने यह बात अच्छी तरह से समझा दी कि मुफ्त में कुछ नहीं मिलता और क्रेडिट जोखिम भी होता है। जिन निवेशकों के पास ऐसा जोखिम झेलने का हौसला नहीं है, उन्हें एएए रेटिंग वाले बॉन्डों में निवेश करने वाले फंडों में ही रकम लगानी चाहिए।' पुनर्वर्गीकरण की कवायद के बाद निवेशकों के लिए डेट फंडों को उनकी अवधि के आधार पर चुनना आसान हो गया है। लेकिन नियामक ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इनमें से हरेक श्रेणी में फंड कितना अधिक क्रेडिट जोखिम ले सकते हैं। इसीलिए निवेशकों को खुद ही सतर्कता बरतनी पड़ेगी।
 
ब्याज दरें पिछले कुछ महीनों में नरम पड़ी हैं, लेकिन वे किसी भी समय उलटी चाल चल सकती हैं। इसीलिए निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में अवधि संबंधी बहुत अधिक जोखिम लेने से बचना चाहिए। जोखिम लेने की कम मंशा वाले निवेशक 2019 में अपने डेट पोर्टफोलियो में संपत्ति आवंटन का एकदम अलग नुस्खा अपना सकते हैं। इसमें करीब 10 फीसदी आवंटन लिक्विड फंड और अल्ट्रा-शॉर्ट टर्म फंड में जा सकता है, करीब 70 फीसदी आवंटन अल्प अवधि वाले फंडों (और अल्प अवधि वाले कॉर्पोरेट बॉन्ड फंडों) में हो सकता है और बाकी 20 फीसदी निवेश डायनमिक बॉन्ड फंडों में जा सकता है। जो निवेशक बिल्कुल भी जोखिम नहीं लेना चाहते हैं, उन्हें अंतिम श्रेणी यानी डायनमिक बॉन्ड फंडों से बिल्कुल दूर रहना चाहिए।
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