बिजनेस स्टैंडर्ड - सत्यम घोटाले से मिले सबक नाकाफी
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सत्यम घोटाले से मिले सबक नाकाफी

सचिन मामबटा /  January 06, 2019

एक दशक पहले सत्यम घोटाले के उजागर होने के बाद से ऐसे मुद्दों से निपटने के लिए व्यवस्था में कई नियामकीय बदलाव किए गए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि व्यवस्थागत मुद्दे खासकर क्रियान्यवन के मोर्चे पर अभी समस्याएं बरकरार हैं जिससे इन कानूनों की प्रभाव क्षमता प्रभावित हो सकती है। नियमों में बदलाव करके अब स्वतंत्र निदेशकों को पहले से ज्यादा जवाबदेह बनाया गया है, छोटे शेयरधारक क्लास एक्शन सूट के जरिये किसी भी गलती को दुरुस्त कर सकते हैं, गिरवी शेयरों के खुलासे की प्रक्रिया में सुधार किया गया है, व्हिसल ब्लोअर की व्यवस्था बेहतर हुई है और शेयरधारकों की सक्रियता से प्रवर्तकों को ज्यादा जवाबदेह बनाने में मदद मिली है। खासकर कंपनियों में निदेशक मंडलों को ज्यादा भूमिका दी गई है। 

 
लॉ फर्म आईसी यूनिवर्सल लीगल में सीनियर पार्टनर तेजेश चिटलांगी ने कहा, 'चाहे वह 2013 का कंपनी कानून हो, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की सूचीबद्घता का नियम हो, स्वतंत्र निदेशकों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए समुचित कानून बनाए गए हैं। उनकी नियुक्ति और उन्हें हटाने के संबंध में मजबूत प्रक्रिया बनाई गई है।' रेगस्ट्रीट लॉ एडवाइजर्स के संस्थापक और सेबी के पूर्व अधिकारी सुमित अग्रवाल ने कहा कि कंपनी कानून के मुताबिक अल्पांश शेयरधारक अपने प्रतिनिधि के तौर पर बोर्ड में एक निदेशक नियुक्त कर सकते हैं। 
 
अलबत्ता, इसका क्रियान्वयन मुश्किल है क्यों कई स्वतंत्र निदेशक प्रवर्तकों या शक्तिशाली प्रबंधन के प्रभाव से सही मायनों में मुक्त नहीं हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के मामले में यह बात साबित हुई है। इसके निदेशक मंडल में कई जानेमाने नाम शामिल थे लेकिन उसके बावजूद कंपनी को हाल के दिनों में गड़बड़ी के आरोपों के कारण परेशानी का सामना करना पड़ा है। शेयरधारक क्लास एक्शन सूट के प्रावधान के जरिये इस तरह की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।
 
अग्रवाल ने कहा, 'अभी राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) के रूप में एक समर्पित फोरम मौजूद है जो क्लास एक्शन सूट दायर करने की सुविधा देता है। सत्यम घोटाले के जमाने में ऐसा नहीं था। इस धारा को जून 2016 में अधिसूचित किया गया है और अभी यह देखना बाकी है कि शेयरधारकों की सक्रियता पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।' प्रवर्तकों की नकदी समस्या का संकेत देने वाले गिरवी शेयरों के लिए अब व्यापक खुलासे की जरूरत है। लेकिन कंपनियों ने इसका तोड़ ढूंढ निकाला है जिससे वे शेयरों को कंपनियों में ला सकते हैं और इसका खुलासा किए बिना वे पूंजी जुटा सकते हैं। प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्मों के आने से शेयरधारकों की सक्रियता बढ़ाने में मदद मिली है। इस तरह की विदेशी और घरेलू कंपनियां प्रस्तावों पर मतदान की सलाह देती हैं ताकि शेयरधारकों को इसका अधिक से अधिक फायदा मिले। जब किसी प्रस्ताव पर मतदान की बात आती है तो कई म्युचुअल फंड और अन्य संस्थान इन कंपनियों का सहारा लेते हैं। 
 
कॉरपोरेट ट्रेकर प्राइम डेटाबेस से मिले आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि म्युचुअल फंड के मतदान के रुझान से पता चलता है कि वे अब भी करीब दस फीसदी प्रस्तावों पर वे नदारद रहते हैं और केवल दो फीसदी प्रस्तावों का विरोध करते हैं। इसकी कुछ वजह यह है कि आजकल जिस तरह प्रस्तावों को पेश किया जाता है। कंपनियां अक्सर मतदान के दिन किसी तरह की शर्मिंदगी से बचने के लिए प्रॉक्सी एडवाइजरी फर्मों और संस्थाओं के साथ प्रस्तावों पर पहले ही चर्चा कर लेती हैं। इस तरह प्रवर्तकों की मनमानी पर कुछ अंकुश लगा है। 
 
व्हिसल ब्लोअर के डर से भी मदद मिली है। कंपनियों को अब व्हिसल ब्लोअर व्यवस्था बनानी पड़ती है। लेकिन इसमें बचाव के कम रास्ते हैं और पुरस्कार सीमित है। सेबी व्हिसल ब्लोअर की प्रक्रिया को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है लेकिन यह साफ नहीं है कि निकट भविष्य में इस तरह के लोगों को कोई पुरस्कार या छूट मिल सकती है या नहीं। कुछ कंपनियों ने व्हिसल ब्लोअर की व्यवस्था किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष को दी है। इससे शिकायतों के बेहतर मूल्यांकन में मदद मिलेगी तो क्या इन बदलावों से देश में कंपनियों का कामकाज साफसुथरा हो रहा है? विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि नियम तो बेहतर हैं लेकिन इनके क्रियान्वयन में कुछ समय लग सकता है। ग्रांट थॉर्नटन इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी विशेष सी चंडियोक ने कहा कि हालिया प्रगति के बावजूद नियामकीय क्षमता को मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही इन मुद्दों पर सक्रियता के साथ नजर रखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, 'हमें अब भी किसी घटना के बाद व्यवस्था को साफ करने की जरूरत होती है।'
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