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न्यायपालिका में खाली पदों से कैसे प्रभावित हो रहा है कारोबार

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  January 06, 2019

न्यायपालिका की व्यवस्था में उच्चतम न्यायालय के अधीन सैकड़ों अदालतें और पंचाट हैं जहां आर्थिक और वित्तीय मामलों पर सुनवाई होती है। कारोबार से जुड़े मामलों की संख्या बढ़ते जाने के मद्देनजर उच्च न्यायालयों में व्यावसायिक अदालतें गठित की गई हैं। आयकर, बौद्घिक संपदा अधिकार, बिजली विनियमन, उपभोक्ता कानून और दूसरे अन्य क्षेत्रों से जुड़े विवादों के लिए पंचाट हैं। कंपनी जगत में खलबली मचाने वाला राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) हाल में इस क्लब में शामिल हुआ है। कारोबार बढऩे के साथ न्यायिक संस्थाओं की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं। फिर भी इन न्यायिक संस्थाओं का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। कारोबार की राह आसान बनाने की दिशा में इसे एक बहुत बड़ी बाधा के रूप में देखा जाता है। इसके लिए पूरी तरह इन संस्थाओं को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है। उदाहरण के लिए उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों में रिक्त पदों की संख्या चौंकाने वाली है। देश के  24 उच्च न्यायालयों में 384 पद रिक्त पड़े हैं। प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों में तो हालत और भी खराब है। बंबई उच्च न्यायालय में 94 में से 33, दिल्ली उच्च न्यायालय ने 60 में से 21 और कलकत्ता उच्च न्यायालय में 94 में से 22 पद खाली पड़े हैं। निचली अदालतों में करीब 5,000 पद खाली पड़े हैं जो उनमें कुल मंजूर पदों की संख्या का एक चौथाई है। देश में मुकदमों की शुरुआत भी निचली अदालतों से ही होती है। इनमें मध्यस्थ पंचाटों के फैसलों को चुनौती, चेक बाउंस होने के मामले, शेयरों का हस्तांतरण और कंपनियों से जुड़े धोखाधड़ी के मामले शामिल हैं। जब अदालतों में कर्मचारी ही नहीं होंगे तो जाहिर है कि मामले कई वर्षों तक चलते रहते हैं और लोगों का व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहता है।

 
कई पंचाटों में स्थिति इतनी बदतर है कि पदों को भरने के लिए उनके बार एसोसिएशनों को अक्सर मदद के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। अदालत सरकारों को निर्देश जारी करती है जिन्हें तकनीकी आधार पर और फंड की कमी का रोना रोकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। निचली अदालतों को धन की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है और उच्च न्यायालय न्यायाधीशों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति करते हैं। अलबत्ता राज्य के बजट का 0.2 फीसदी या इससे भी कम न्यायपालिका को दिया जाता है। केंद्र में भी यही स्थिति है। यही वजह है कि अदालतें जीर्णशीर्ण भवनों या पट्टे पर ली गई इमारतों में काम करती हैं। उनके पास न तो पर्याप्त संख्या में कर्मचारी होते हैं और न ही स्टेशनरी होती है। हाल में बंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र में अदालतों की दयनीय स्थिति पर एक लंबा चौड़ा फैसला दिया। अगर महाराष्ट्र में यह स्थिति है तो कम विकसित राज्यों में क्या हालत होगी, इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं है। इसका एक विरोधाभासी परिणाम यह है कि कुछ ही सफल वकील न्यायिक पदों को स्वीकार करते हैं और महानगरों के प्रबुद्घ वकीलों को कम जानकारी रखने वाले न्यायाधीशों के समक्ष दलीलें रखनी पड़ती है। 
 
न्यायपालिका की मौजूदा दुर्दशा और इसे कारोबारी जगत की चिंता में कानून बनाने वालों का भी योगदान है। खामियों को दूर करने के लिए कुछ कानूनों को कुछ ही वर्षों के दौरान कई बार संशोधित करना पड़ा है। आयकर कानून में ऐसे कई प्रावधान हैं जिन्हें सैकड़ों बार संशोधित किया जा चुका है। एनसीएलटी सहित सभी पंचाटों के गठन से पूर्व इनके प्रावधानों की वैधता को लेकर उच्चतम न्यायालय में लंबी बहस चली है। इन प्रावधानों में अधिकारियों को न्यायिक सदस्यों से ज्यादा तरजीह दी गई थी। ऋणशोधन अक्षमता और दिवालिया संहिता (आईबीसी) के कई प्रावधानों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है और इन पर 2019 में फैसला आने की उम्मीद है। मध्यस्थता एवं सुलह कानून के प्रावधानों की कई वर्षों तक न्यायिक व्याख्या होती रही। 
 
न्यायपालिका को रूढि़वादी संस्था माना जाता है और डिजिटल की दुनिया को अपनाने की इसकी प्रगति बहुत धीमी रही है। उच्चतम न्यायालय के गलियारे फाइलों से भरी अलमारियों से पटे पड़े हैं और जिन फाइलों को इन अलमारियों में जगह नहीं मिल पाई है, वे फर्श पर बिखरी हैं। दो साल पहले कागजरहित व्यवस्था का वादा किया गया था लेकिन न्यायपालिका को अभी उस दौर का इंतजार है। लॉ फर्मों में डिजिटल की रफ्तार न्यायपालिका से कहीं ज्यादा तेज है।  अपील अदालतों में जाने वाली अपीलों के अक्सर संस्थाओं खासकर सरकारी संस्थाओं के पास भारी मात्रा में फंड उपलब्ध रहता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने बीते साल कई बार भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को झिड़की दी और मध्यस्थता कानून के एक मामले में तो भारी जुर्माना भी लगाया। न्यायालय ने कहा, 'हमने इस कानून के तहत कई याचिकाओं और अपील पर कई बार अपनी असहजता जाहिर की है। हम फिर इसे दोहराना नहीं चाहते हैं।' विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई कंपनियों और उनके वकीलों को नसीहत के बावजूद दूसरे कानूनों के प्रावधानों का दुरुपयोग भी धड़ल्ले से जारी है। बेकार की मुकदमेबाजी को नियंत्रित करने के लिए कोई नियामक नहीं है और कोई स्वनियमन भी नहीं है। परस्पर विरोधी मुकदमेबाजी आम है और कानूनी पेशा इसका पोषण करता है। इस पेशे से जुड़े लोग इन खामियों से अच्छी तरह वाकिफ हैं लेकिन अल्पकालिक लाभ के लिए बड़े हितों की बलि दी जाती है। 
Keyword: supreme court, high court, NCLT,,
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