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एक वर्ष में बदल गई राजनीतिक तस्वीर

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 06, 2019

राजनीति में एक सप्ताह का अरसा लंबा हो या न हो लेकिन एक वर्ष तो यकीनन लंबा वक्त  होता है। जरूरी नहीं कि राजनीतिक संदर्भ में भी वर्ष वैसा ही बीते जैसा अन्य संदर्भों में। यह इतने उन्माद से भरा भी हो सकता है कि उसके बीतने के बाद अचानक आपको लगे कि अरे! यह वर्ष तो बीत गया। यह हर वर्ष बदलाव भरा भी हो सकता है और नहीं भी।  साधारण शब्दों में कहें तो राजनीतिक मोर्चे पर कुछ वर्ष ठहराव भरे भी हो सकते हैं। मई 2014 के मध्य से लेकर 2017 के उत्तराद्र्ध तक कमोबेश ऐसा ही था। अगर प्रधानमंत्री ने नोटबंदी जैसे कदम नहीं उठाए होते तो ये वर्ष राजनीतिक टीकाकारों के लिए दु:स्वप्न साबित हो सकते थे। 

 
वर्ष 2017 के जाड़ों तक अधिकांश विश्लेषक तीन बातों पर सहमत थे: पहली, बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल सुनिश्चित है, राहुल गांधी और उनकी पार्टी यानी कांग्रेस, निरंतर पराभव की स्थिति में हैं और तीसरी इंदिरा गांधी के कार्यकाल के बाद पहली बार भारत लंबे समय तक एकदलीय और एकध्रुवीय शासन की दिशा में है। उत्तर प्रदेश में भारी जीत के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 21 राज्यों पर काबिज हो चुकी थी और मोदी सरकार के कार्यकाल में वह शेष राज्यों के चुनावों और 2019 की कड़ी परीक्षा के लिए तैयार दिख रही थी। परंतु 2017 के मध्य दिसंबर में कुछ बदलाव नजर आने लगा। भाजपा गुजरात में छठी बार सत्ता में आने में कामयाब रही लेकिन उसे यह जीत बहुत करीबी मुकाबले में मिली। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी और अमित शाह की बेचैनी साफ नजर आ रही थी।
 
इसके तुरंत बाद भाजपा संसदीय दल की बैठक में जीत और राहत के चलते जो आंसू निकले उन्होंने दिखा दिया कि मामला कितना करीबी था। उस वक्त हमने लिखा था कि अब उनका जोर वृद्धि और रोजगार के बजाय हिंदुत्व, लोक कल्याण के साथ धुर राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार विरोध रूपी तीन बिंदुओं पर होगा। हम इस बात पर संतोष कर सकते हैं कि हम सही थे। परंतु यह सबसे अहम बदलाव नहीं था और इस मायने में हम अनुमान लगाने में चूक भी गए। 17 दिसंबर, 2017 को ज्यादा लोगों को यह नहीं लगा होगा कि मात्र एक वर्ष की अवधि में भारतीय राजनीति अपनी एकध्रुवीय स्थिति खो देगी। परंतु हुआ एकदम यही। 
 
राजनीति कितनी एकध्रुवीय हो गई है इसका अंदाजा टेलीविजन चैनल टाइम्स नाऊ की प्रस्तोता नविका कुमार और भाजपा महासचिव राम माधव के बीच की विनोदपूर्ण चर्चा से लगाया जा सकता है। यह पूछे जाने पर कि अगर भाजपा कर्नाटक में बहुमत का आंकड़ा नहीं पाती तो क्या होगा, सत्ताधारी दल के सबसे प्रभावशाली विचारक ने कहा- तो क्या हुआ, हमारे पास अमित शाह हैं। वह कोई डींग नहीं हांक रहे थे। यह माना जाने लगा था कि अगर भाजपा कहीं भी आंकड़ों में पीछे रही तो शेष दलों के अधिकांश सदस्य स्वत: उसकी ओर आकर्षित होंगे क्योंकि वही एक ध्रुव है जहां वे आकर्षित हो सकते हैं। गोवा तथा पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों में हम देख चुके हैं कि भाजपा ने बिना सबसे बड़ा दल हुए भी सरकार बनाई। मेघालय में तो वह दो विधायकों के साथ भी सरकार बनाने में कामयाब रही। यह बात साफ हो गई कि आंकड़े अब बेमानी हो चुके थे क्योंकि सामने कोई था ही नहीं। पूर्वोत्तर की कई भाजपा सरकारें तो एक तरह से अपने प्रभाव के कारण संभव हुए लाभ के सौदे का परिणाम थीं। राम माधव ने जब अमित शाह का नाम लिया तो वही उसी फायदे की बात कर रहे थे। 
 
इस धारणा को पहला झटका कर्नाटक में लगा। कांग्रेस ने सत्ता की लालसा त्यागते हुए छोटे सहयोगी दल को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपकर अपने दोस्तों और दुश्मनों को चौंका दिया। इसके साथ ही एक नई राजनीति का बीज भी बोया गया और वह था भाजपा को किसी भी कीमत पर सत्ता से बाहर रखने की चाह रखने वाले दलों का बढ़ता गठजोड़। इससे अमित शाह की शैली की राजनीति को चुनौती मिली। उनकी ताकत संसाधनों और (आजकल खूब प्रयोग किए जा रहे एक शब्द) एजेंसियों से आती थी। कर्नाटक की जंग में एक वक्त ऐसा भी आया जब भाजपा के प्रतिद्वंद्वी तात्कालिक लाभ और एजेंसियों के भय के आगे कमजोर पड़ते दिखे। चुनाव के कुछ महीने पहले ही बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं को सीबीआई से बचाने जैसे नैतिक रूप से कमजोर कृत्य के बावजूद भाजपा चुनाव जीतने में नाकाम रही। इस राजनीतिक झटके का असर गहरा रहा। कर्नाटक में सत्ता विरोधी लहर, भारी चुनाव खर्च, बेल्लारी की माफिया शक्ति के बावजूद और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सत्ताहरण के कड़े प्रतिरोध के बीच मोदी वहां निर्णायक जीत नहीं पा सके। इससे उनकी अपराजेय होने की छवि टूट गई।
 
कर्नाटक ने साबित किया कि मोदी और शाह अपराजेय नहीं हैं और कांग्रेस में उन्हें कूटनीतिक मात देने का माद्दा अभी शेष है। मोदी को कर्नाटक में सबसे लोकप्रिय माना जा रहा था लेकिन वे जीत नहीं सके। तमाम संसाधन और एजेंसियां भी उन्हें अपेक्षित विधायक दिलाने में नाकाम रहीं। सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्थान ने उनकी स्पष्ट अवज्ञा कर दी। ध्यान रहे कि यह सब संस्थागत स्तर पर मोदी-शाह को लगे पहले झटके के तकरीबन एक साल बाद हुआ। पहला झटका गुजरात राज्य सभा चुनाव के अहमद पटेल वाले मामले में निर्वाचन आयोग के हाथों लगा था। अब यह स्पष्ट होता जा रहा था कि भाजपा से सत्ता छीनी जा सकती है।
 
देश के हिंदीभाषी क्षेत्र में होने वाले चुनावों के लिए धारणा यहीं से तैयार हुई। कांग्रेस और उसके सहयोगियों को यकीन हो चला था कि भाजपा को हराया जा सकता है। दिसंबर 2017 के मध्य तक वे ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकते थे लेकिन ठीक एक साल बाद उन्हें यकीन हो गया था कि सत्ता उनकी पहुंच में है। यही वजह है कि हम दिसंबर 2017 से दिसंबर 2018 की अवधि को सबसे अहम राजनीतिक वर्ष मान रहे हैं। जिस दिन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव के नतीजे आए, हमने कह दिया था कि मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना समाप्त हो चुका है। उन्होंने भी एएनआई की स्मिता प्रकाश को दिए अपने बहुचर्चित साक्षात्कार में परोक्ष रूप से इस बात को स्वीकार किया और कहा कि कांग्रेस मुक्त भारत से उनका तात्पर्य पार्टी से नहीं बल्कि उसकी विचारधारा से था। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कांग्रेस की वैचारिकी को जातिवाद, वंशवाद, अलोकतांत्रिक और भाई-भतीजावाद वाली बताया।
 
अब राहुल गांधी का उभार देखने को मिल रहा है, सपा-बसपा जैसे जाति आधारित दलों के बीच गठबंधन से उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए कड़ी चुनौती उत्पन्न हो चुकी है और कांग्रेस भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ उस पर लगातार हमले कर रही है। ऐसे में अगर मान भी लिया जाए कि एक विचार के रूप में कांग्रेस की उनकी परिभाषा सही थी, तो भी वह बहुत ताकतवर होकर सामने आई है। यह वह दूसरा ध्रुव है जो भारतीय राजनीति में तीन वर्ष से नदारद था। यह कहना भी सही नहीं होगा कि 2019 के चुनाव के लिहाज से मोदी अब मुकाबले से बाहर  हैं। उनकी निजी लोकप्रियता, श्रोताओं से संवाद और चुंबकीय करिश्मा अब भी बरकरार है। जैसा कि हमने पहले भी कहा है, भारत में बहुमत वाला शक्तिशाली नेता कभी अपने प्रतिद्वंद्वी से नहीं हारा, वह खुद से ही हारता है। सन 1977 में इंदिरा गांधी के साथ ऐसा हो चुका है।
 
ऐसे में तीन बातें हो सकती हैं: पहली, मोदी इतने अलोकप्रिय हो जाएं कि लोग उनके खिलाफ मतदान करें चाहे सत्ता में कोई भी आए। दूसरा, विविध राजनीतिक शक्तियां उन्हें इस हद तक नापसंद करें कि वे अपने मतभेद और महत्त्वाकांक्षाएं भुलाकर उनके खिलाफ एकजुट हों और तीसरा, कोई ऐसी शक्ति हो (भले ही वह भावी प्रधानमंत्री न हो) जिसके इर्दगिर्द वे एकजुट हो सकें। सन 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने यह भूमिका निभाई थी। सन 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह इस भूमिका में थे।  जो राहुल गांधी एक वर्ष पहले लडख़ड़ाते हुए अनाड़ी उत्तराधिकारी दिख रहे थे वह कांग्रेस को दूसरे ध्रुव की स्थिति में ले आए हैं। अब वर्ष 2019 का मुकाबला खुला है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री संसद के बजाय अपने चुनाव प्रचार को तरजीह दे रहे हैं।
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