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अनुचित करारोपण

संपादकीय /  January 06, 2019

उत्तर प्रदेश सरकार ने आबकारी उत्पादों पर 2 फीसदी गोरक्षा उपकर लगाने का निर्णय लिया है। इसके अलावा राज्य द्वारा संचालित टोल नाकों पर भी 0.5 फीसदी का उपकर लगाया जाएगा। सरकार ने उत्तर प्रदेश कृषि विपणन बोर्ड या मंडी परिषद के कर राजस्व पर लगने वाले शुल्क को भी एक फीसदी से बढ़ाकर दो फीसदी कर दिया है। इस पैसे का इस्तेमाल 'गोवंश आश्रय स्थल' की स्थापना और संचालन में किया जाएगा। ये आश्रय स्थल सभी गांवों, पंचायतों, नगर निकायों और नगर निगमों में बनाए जाएंगे और इनका संचालन शहरी और ग्रामीण नगर निकायों द्वारा किया जाएगा। इनकी स्थापना का उद्देश्य है राज्य में आवारा पशुओं की बढ़ती समस्या से निजात पाना। इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का पैसा भी इन आश्रय स्थलों में किया जाएगा। इसके अलावा सरकारी क्षेत्र की मुनाफे में चल रही आठ कंपनियों मसलन सेतु निगम और उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम को भी अपने कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व फंड का 0.5 फीसदी हिस्सा गो आश्रय योजना के लिए देना होगा। यह सारी कवायद इसलिए की जा रही है ताकि राज्य के हर जिले में कम से कम 1,000 पशु क्षमता वाले आश्रय स्थल बनाए जा सकें। 

 
सवाल यह है कि सत्ताधारी दल की नीतिगत गलती का खमियाजा उत्तर प्रदेश के लोगों को क्यों चुकाना चाहिए? निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश ऐसा उपकर थोपने वाला पहला प्रांत नहीं है। वर्ष 2016 में पंजाब में भाजपा और अकाली दल की तत्कालीन सरकार ने भी ऐसा ही उपकर लगाया था जबकि उसका कोई वास्तविक लाभ सामने नहीं आया। उत्तर प्रदेश में संकट की शुरुआत मार्च 2017 में भाजपा के सत्ता संभालते ही हो गई थी।  सरकार के शुरुआती निर्णयों में अवैध बूचडख़ाने बंद करने और गो तस्करी के विरुद्घ अत्यधिक सख्ती बरतने जैसे कदम शामिल थे। यह सही है कि अवैध बूचडख़ाने नहीं चलने चाहिए लेकिन राज्य सरकार ने इस काम में संलग्न छोटे और हाशिये वाले कारोबारियों और उनके कर्मचारियों की आजीविका के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था तैयार नहीं की। सरकार के अतार्किक निर्णय ने प्रदेश में मांस के व्यापार को पूरी तरह बदल दिया। इससे एक बड़ी समस्या यह हुई कि जो पशु मालिक पहले अपने अनुत्पादक पशुओं को बूचडख़ानों को बेच देते थे, उनको अब अपने जानवर आवारा छोड़ देना ज्यादा सही लगने लगा। तथाकथित गोरक्षकों द्वारा हिंसा की घटनाओं में इजाफा होने से हालात और बिगडऩे लगे। ये कथित गोरक्षक अक्सर भैंस का कारोबार करने वालों को प्रताडि़त करने लगे। 
 
इसका नतीजा सभी देख रहे हैं। मांस का कारोबार और उससे जुड़े छोटे कारोबार पूरी तरह खत्म हो गए हैं और किसानों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। खबरों से पता चलता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो परेशान किसान परित्यक्त पशुओं को स्कूलों और सरकारी इमारतों में बांध दे रहे हैं ताकि वे उनकी फसल को नुकसान न पहुंचाएं। कहना नहीं होगा पशु भी परेशानी का सामना कर रहे हैं। कई पशु तो भूख से मर रहे हैं। उपकर लगाने के बजाय सरकार को अपनी उस नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए जो वास्तव में किसी के काम नहीं आई। सदियों से पशुओं के व्यापार और गाय के प्रति सांस्कृतिक लगाव का सह अस्तित्व रहा आया है और इससे किसी को परेशानी नहीं हुई। पशुओं के व्यापार पर रोक का निर्णय बेतुका है। ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि भला एक खास किस्म की प्रतीकात्मक राजनीति का वित्तीय बोझ भला आम जनता क्यों उठाए?
Keyword: uttar pradesh, excise, cow,,
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