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नए साल में मीडिया जगत के लिए नए संकल्प

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  January 04, 2019

यह वक्त संकल्प करने का है। यहां पर 1.47 लाख करोड़ रुपये के आकार वाले भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के बारे में भी दो संकल्प पेश कर रहे हैं। क्या भारतीय मीडिया की बड़ी कंपनियों चला रहे पुरुष और महिलाएं तदर्थ तरीके से काम करने के बजाय अधिक मजबूत, बेहतर और सूचना-आधारित लॉबी करने का संकल्प ले सकते हैं? और, क्या वे केवल सरकार और नियामकों के बजाय सभी हितधारकों से संचार करने का संकल्प ले सकते हैं? ताजा मामला भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के 2016 के उस आदेश से संबंधित है जिसे फिलहाल लागू करने की कोशिशें की जा रही हैं। यह अब भी रहस्य बना हुआ है कि यह आदेश क्यों आया? भारत एक बेहद प्रतिस्पद्र्धी टेलीविजन बाजार है। यहां पर टीवी वितरण तीन तकनीकों- केबल, डीटीएच एवं ऑनलाइन पर आधारित है और इनमें से हरेक का दायरा व्यापक है। देश में 867 चैनल प्रसारित हो रहे हैं। इसके बावजूद भारत में प्रति उपभोक्ता औसत राजस्व पूरी दुनिया में सबसे कम है। ऐसे में इस तरह का शुल्क आदेश जारी करने की वजह एक पहेली ही है। विकसित बाजारों के नियामक आम तौर पर किसी नए नियम या नीति को लागू करने के पहले उसके असर, लागत और होने वाले लाभों का विश्लेषण करते हैं। उपभोक्ता समूहों, कारोबार जगत और सभी हितधारकों को पता होता है कि इससे कौन जुड़ा हुआ है? सभी हितधारकों के बीच स्वामित्व का एक अहसास होता है।

 
भारत में निजी चैनलों के 25 वर्ष और केबल वितरण शुरू होने के 30 वर्ष बाद भी उपभोक्ताओं, मीडिया और नियामकों के बीच इस उद्योग के कामकाज संबंधी बुनियादी जानकारियों की कमी है। क्या आप एक उपभोक्ता होने के नाते यह जानते हैं कि भारत में टीवी की कीमतें दुनिया भर में शायद सबसे कम हैं? क्या भारत का कारोबारी मीडिया यह जानता है कि टीवी उद्योग में 16.5 लाख लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर रोजगार मिला हुआ है और यह उद्योग हर साल अरबों रुपये का कर चुकाता है? क्या टेलीविजन उद्योग की गतिविधियां कवर करने वाले पत्रकार यह समझते हैं कि टीवी कार्यक्रमों की रेटिंग किस तरह तय होती है और किस तरह कीमतें निर्धारित की जाती हैं? अगर एक साल में लाखों उपभोक्ता डीटीएच या केबल प्लेटफॉर्म का हिस्सा बनते हैं तो रोजगार, कर और नौकरी की संभावनाओं के लिए इसके क्या मायने हैं? आखिर 66,000 करोड़ रुपये के इस उद्योग का व्यापक प्रभाव क्यों नहीं दिखता है? इसकी वजह यह है कि इसने कभी भी उन लोगों से संवाद नहीं किया है जो सर्वाधिक अहमियत रखते हैं। ब्रिटेन में रचनात्मक उद्योगों के फलने-फूलने में प्रोड्यूसर्स अलायंस फॉर सिनेमा ऐंड टेलीविजन जैसे संगठनों का भी बड़ा हाथ रहा है। ब्रिटेन में उपभोक्ताओं को पता होता है कि उन्हें बीबीसी देखने के लिए रोजाना कितना भुगतान करना है। भारतीय प्रसारण उद्योग में शायद एक ही बार ऐसा हुआ है कि समूचा उद्योग वर्ष 2011 में केबल डिजिटलीकरण अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर उपभोक्ताओं से मुखातिब हुआ था। 
 
विरोध और निरर्थक विचारों का खमियाजा भुगतने वाले फिल्म जगत पर भी यही बात लागू होती है। फिल्म उद्योग में 7 लाख लोगों को सीधे या परोक्ष रोजगार मिला हुआ है और यह अपनी कमाई का एक-तिहाई हिस्सा कर के रूप में चुका देता है। लेकिन कुछ वजह  से ये दोनों उद्योग अपने विषयवस्तु के चलते करोड़ों लोगों के दिमाग पर असर डालने की क्षमता रखने के बावजूद समाज, अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं को दिए गए योगदान की चर्चा नहीं कर पाते हैं। क्या ये उद्योग इस साल इस काम को बेहतर ढंग से अंजाम देने का संकल्प लेते हैं? 
 
कुछ समय से नफरत, अपशब्द और क्रूरता से भरा आचरण सोशल मीडिया का प्रचलित परिदृश्य है। अब यह पता चला है कि सरकार सोशल मीडिया फर्मों पर इन प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने के लिए तकनीक का सहारा लेने का दबाव बना रही है। निश्चित रूप से उन्हें ऐसी बातों को हटाना चाहिए लेकिन ऐसी बातें समाज में पहले से ही मौजूद हैं। ट्विटर या फेसबुक तो महज प्लेटफॉर्म हैं। इन्हें कॉफी शॉप की तरह देखना चाहिए जहां हम जाते हैं। वह जगह हमें चीखने, चिल्लाने और गलत भाषा के इस्तेमाल के लिए नहीं उकसाती है। हम लोग ही वहां जाकर गलत बरताव करने लगते हैं। पहले हमारा शिष्ट आचरण हमें अपने पूर्वग्रह या कट्टïरता दिखाने से रोक लेता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इनका प्रदर्शन फैशन जैसा हो गया है। गलत सूचना के आधार पर नफरत फैलाने वाला आचरण आज ईमानदार या खरी बात करने वाला माना जाता है। 
 
अगर हम शिष्टता, सभ्यता एवं अच्छे आचरण को प्रतिष्ठा का प्रतीक बनाने में सफल रहते हैं तो हम अपने आसपास क्या बदलाव ला पाएंगे? फिर नफरत फैलाने के लिए इस्तेमाल हो रहे प्लेटफॉर्म का ही इस्तेमाल समाज में शालीनता लाने के लिए भी किया जा सकेगा। याद रखें कि भारत ने मतदान को प्रतिष्ठा का प्रतीक और गर्व एवं उत्तरदायित्व की निशानी बनाकर पिछले दशक में मतदान प्रतिशत में काफी इजाफा किया है। ऐसा इसलिए हो पाया कि विज्ञापन फिल्मों, रंगमंच, टेलीविजन और फिल्मों ने मतदान के बाद स्याही लगी उंगली दिखाने को एक फैशन बना दिया था। ये तस्वीरें शायद यही संदेश देती रही हैं कि जब अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान मतदान करने जा सकते हैं तो आप क्यों नहीं कर सकते हैं? ऐसे में हमारा दूसरा संकल्प यह होना चाहिए कि समाज में घृणा एवं नफरत का मुकाबला करने के लिए हम अपने सबसे अच्छे एवं बेहद सभ्य आचरण का प्रदर्शन करें। मिशेल ओबामा ने अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कहा था, 'जब वे नीचे गिरते हैं तो हम ऊपर हो जाते हैं।' हमारे समाज में निश्चित रूप से नफरत और तीखेपन से भरे लोगों की तुलना में संयत और शांति चाहने वाले लोगों की संख्या अधिक है। लेकिन अभी तक सोशल मीडिया पर ऐसे लोग नजर नहीं आए हैं। 
Keyword: new year, media, entertainment,,
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