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संशोधित अनुमानों ने कैसे पाटा सरकार का घाटा

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  January 03, 2019

केंद्रीय बजटों का आकलन इस बात से किया जाता है कि आगामी वर्ष के लिए उनमें क्या अनुमान लगाए गए हैं और मौजूदा वर्ष के अनुमानों में कितनी फिसलन रही या कितना सुधार हुआ। इसलिए अगले महीने पेश होने वाले केंद्रीय बजट का इस आधार पर आकलन किया जाएगा कि 2019-20 के लिए उसमें क्या अनुमान लगाए गए हैं और 2018-19 के लिए संशोधित अनुमान क्या हैं। संशोधित आंकड़े या संशोधित अनुमानों से ही पता चलेगा कि पिछले साल फरवरी में घोषित 2018-19 के बजट अनुमानों की क्या स्थिति है। 

 
अलबत्ता हर साल केंद्र सरकार के बजट में वास्तविक आंकड़े भी पेश किए जाते हैं जो उस साल से पिछले वित्त वर्ष के आंकड़े होते हैं जब बजट पेश किया जाता है। उदाहरण के लिए 2017-18 के वास्तविक आंकड़े फरवरी 2019 में 2018-19 के बजट और संशोधित अनुमानों तथा 2019-20 के बजट अनुमानों के साथ उपलब्ध होंगे। इसलिए मौजूदा वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान के आंकड़ों और अगले वित्त वर्ष के बजट अनुमान के आंकड़ों पर चर्चा होगी और पिछले साल के वास्तविक आंकड़ों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। यह एक गलती है। पिछले साल के वास्तविक आंकड़ों को नजरअंदाज करना और उनका मूल बजट अनुमानों और संशोधित अनुमानों के आंकड़ों के साथ अंतर का विश्लेषण नहीं करने से बजट विश्लेषण की गुणवत्ता कमजोर हो सकती है। 
 
वास्तविक आंकड़ों का इसलिए विश्लेषण नहीं हो पाता है क्योंकि उन्हें एक साल बीतने के बाद ही तुलनात्मक प्रारूप में पेश किया जाता है। मौजूदा वर्ष और आने वाले साल पर ध्यान केंद्रित करने की तत्परता और प्राथमिकता इतनी अधिक होती है कि भारत में सार्वजनिक वित्त विश्लेषण प्रभावित होता है। महालेखा नियंत्रक (सीजीए) द्वारा उपलब्ध कराए गए 2017-18 के संभावित वास्तविक आंकड़ों के विश्लेषण से कुछ दिलचस्प रुझानों का खुलासा होता है और पता चलता है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल राजस्व और खर्च को कैसे संभाला।
 
यह खुलासा राजकोषीय घाटा या राजस्व घाटे के आंकड़े नहीं हैं। वित्त वर्ष 2017-18 में सरकार का राजकोषीय घाटा संशोधित अनुमान और वास्तविक आंकड़ों में सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 फीसदी रहा। राजस्व घाटा भी दोनों अनुमानों के तहत जीडीपी का 2.6 फीसदी रहा। अलबत्ता राजस्व और खर्च में भारी अंतर देखने को मिलता है। राजस्व लक्ष्य से कम दिख रहा है जिसकी भरपाई खर्च में कटौती से की गई है। 2017-18 के संशोधित अनुमानों में केंद्र के कर राजस्व के 12.69 लाख करोड़ रुपये रहने का लक्ष्य रखा गया था जो 2016-17 के वास्तविक आंकड़ों से 15 फीसदी अधिक है। लेकिन सीजीए के आंकड़ों के 2017-18 के वास्तविक आंकड़ों में यह 12.43 लाख करोड़ रुपये रहा जो संशोधित अनुमानों से करीब 26,800 करोड़ रुपये कम है। दूसरे शब्दों में कहें तो 2017-18 में वास्तविक आंकड़ों के मुताबिक केंद्र का कर राजस्व 2016-17 के वास्तविक आंकड़ों से 13 फीसदी ही अधिक रहेगा।
 
गैर कर राजस्व में अंतर ज्यादा बड़ा है। सीजीए के वास्तविक आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 में गैर कर राजस्व 1.92 लाख करोड़ रुपये है जो पिछले साल के संशोधित अनुमानों से 43,450 करोड़ रुपये या 18 फीसदी कम है। जब जेटली ने पिछले साल फरवरी में बजट पेश किया तो 2017-18 के संशोधित अनुमानों के मुताबिक गैर कर राजस्व 2016-17 के वास्तविक आंकड़ों की तुलना में 13 फीसदी घटकर 2.35 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। दो वर्षों के वास्तविक आंकड़ों के आधार पर यह कमी करीब 29 फीसदी है। सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों से लाभांश और लाभ के तौर पर मिले राजस्व, ब्याज प्राप्ति और दूरसंचार स्पेक्ट्रम सहित कई सरकारी सेवाओं से मिली फीस में यह बात परिलक्षित होती है। 
 
वास्तविक आंकड़ों के मुताबिक पूंजी प्राप्तियों के तहत ऋण वसूली में भी मामूली गिरावट आई है और 2017-18 के दौरान कुल राजस्व (उधारी के बिना) 16.23 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमानों से 71,900 करोड़ रुपये कम रहेगा।  अगर फिर भी सरकार संशोधित अनुमानों में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक अपने राजकोषीय और राजस्व घाटे को संभालने में सफल रही, तो इसकी वजह यह है कि 2017-18 के वास्तविक आंकड़ों के अनुसार खर्च में 22.18 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमानों की तुलना में 75,000 करोड़ रुपये की कटौती की गई। इनमें से राजस्व खर्च में 65,000 करोड़ रुपये और पूंजीगत खर्च में 10,000 करोड़ रुपये की कटौती की गई। 
 
इससे तीन सवाल खड़े होते हैं। पहला यह कि राजस्व संग्रह के अंतिम आंकड़ों में इतना अंतर कैसे आया? वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने 1 फरवरी, 2018 को गैर ऋण राजस्व प्राप्तियों के बारे में कुछ निश्चित आंकड़े दिए। लेकिन साल का लेखाजोखा बंद करने के समय राजस्व प्राप्तियों में करीब आठ फीसदी की गिरावट दिख रही है। क्या यह संसद में पेश संशोधित अनुमान के आंकड़ों का मजाक नहीं है? दूसरा सवाल खर्च अनुमान में संशोधन कर इसे कम करने से जुड़ा हुआ है। केवल दो महीने में ही वित्त मंत्रालय संशोधित अनुमान के आंकड़ों में तीन फीसदी की कटौती करने में सफल रहा। संभव है कि केंद्रीय मंत्रालयों की खराब अवशोषण क्षमता से मदद मिली हो, लेकिन पूंजीगत खर्च में कमी परेशान करने वाली है। 
 
अंतिम सवाल यह है कि अगर 2017-18 के वास्तविक आंकड़ों के जारी होने पर संशोधित अनुमान के आंकड़ों में भारी फेरबदल किया जा सकता है तो फिर 1 फरवरी को पेश होने वाले अंतरिम बजट के संशोधित अनुमानों को कितनी गंभीरता से लेना चाहिए? ऐसा लगता है कि संशोधित अनुमान के आंकड़े वित्त मंत्रालय को घाटे को अपने ढंग से पाटने के लिए मरहम देते हैं। 
Keyword: budget, arun jaitley, election,,
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