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पूंजी से परवाज नहीं

संपादकीय /  January 03, 2019

सरकार ने अपने नियंत्रण वाली एयरलाइन एयर इंडिया में नई जान फूंकने के लिए एक और योजना तैयार की है। पिछले साल की बड़ी नाकामी के बाद एयर इंडिया को खरीदारों के बीच आकर्षण बढ़ाने के लिए अपना प्रदर्शन सुधारने की जरूरत है। लेकिन सरकार के पास स्वामित्व रहने तक इसका मुनाफा कमाने एवं उत्पादकता के मामले में निजी क्षेत्र के मानकों तक पहुंच पाना मुश्किल है। हालांकि ऐसा प्रयास की कमी के कारण नहीं है। नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा है कि एयर इंडिया अपने प्रमुख पदों पर भर्ती के लिए पेशेवरों की वैश्विक स्तर पर तलाश कर रहा है। कुछ दिन पहले एयरलाइन के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक ने भी एक लेख में अपने 20,000 कर्मचारियों से कमर कसने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था, 'हम सभी को चुस्ती दिखानी है, सशक्त राजकोषीय अनुशासन अपनाना है और अपनी परिचालन सक्षमता से कोई समझौता किए बगैर अपना कामकाज दुरुस्त करना है। हमें खुद को बचाए रखने के लिए हरसंभव तरीके से राजस्व जुटाने की भी जरूरत है।' नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने भी एयर इंडिया की प्रमुख कारोबारी गतिविधियों के लिए 'अलग-अलग रणनीति' बनाने और 'जबरदस्त संगठनात्मक सुधारों' की बात कही है। 

 
करदाताओं के पैसे पर चल रही एयरलाइन के लिए ये सामान्य लक्ष्य हैं। एयर इंडिया पर बकाया 55,000 करोड़ रुपये के ऋण का बोझ एक विशेष कंपनी पर डालने की योजना भी इसी श्रेणी में आती है। प्रश्न यह है कि क्या इस तरह का महत्त्वाकांक्षी एजेंडा पूरा किया जा सकता है? नब्बे के दशक में भारतीय विमानन क्षेत्र के दरवाजे निजी निवेश के लिए खोले जाने के बाद वैश्विक अनुभव रखने वाले मुख्य कार्याधिकारी भी भारतीय विमानन उद्योग का हिस्सा रहे हैं। मसलन, वॉल्फगांग प्रॉक-शाएर जेट एयरवेज और गोएयर के बाद इंडिगो से जुड़े हुए हैं। लेकिन ये पेशेवर वाणिज्यिक स्तर और प्रतिस्पद्र्धी रणनीति पर चलने वाली एयरलाइंस से ही जुडऩा पसंद चाहते हैं। इनमें से कई अधिकारियों ने एयरलाइन के मालिकों के रवैये के चलते इस्तीफा दे दिया। लेकिन एयर इंडिया का मामला अनूठा है। अगर एयर इंडिया पर सरकारी स्वामित्व बना रहता है तो इसकी संभावना कम ही है कि निजी क्षेत्र का कोई सक्षम पेशेवर इससे जुडऩा चाहेगा। बिक्री के बाद बचे हुए शेयर सरकार के पास रहने की संभावना ने ही पिछले साल एयर इंडिया के निजीकरण की कोशिशें नाकाम कर दी थीं। कर्मचारी संगठनों की सशक्त मौजूदगी, विरासत की कीमत और संस्कृति के साथ ही मंत्रियों एवं नौकरशाहों की स्वाभाविक पसंद होना भी इसके लिए बड़ी समस्या है। इन सब कारकों के मिले-जुले असर ने एयर इंडिया को बेहतर दिनों में भी मुनाफा नहीं कमाने दिया था।
 
एयर इंडिया ने वित्त वर्ष 2016-17 में 6,288 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा उठाया था जबकि उस समय विमानन उद्योग का परिदृश्य बढिय़ा था। मारुति उद्योग की तर्ज पर सार्वजनिक एवं निजी कंपनी के मिश्रित स्वामित्व के पैटर्न से भी परिचालन स्वायत्तता को लेकर निजी खरीदार का भरोसा जीत पाने की संभावना कम है। एयर इंडिया के लिए समस्या यह है कि उसे लागत कम करने और छंटनी जैसे कुछ सख्त वाणिज्यिक निर्णय लेने की जरूरत है जो कारोबारी जगत में स्वाभाविक माने जाते हैं। कोई निर्भीक निवेशक ही इतने बड़े सार्वजनिक उपक्रम में निवेश की मंशा जताएगा। वह भी ऐसे समय में जब तेल कीमतों के पूर्वानुमान निजी एयरलाइंस के भी सामने चुनौतियां पेश कर रहे हैं और जेट एयरवेज इसका प्रमुख उदाहरण है। लोकसभा चुनाव करीब आ जाने से इसकी संभावना कम है कि सरकार एयर इंडिया के बारे में कोई कठोर कदम उठाएगी। लेकिन अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने की चुनौती से जूझने वाली नई सरकार के लिए एयर इंडिया में पूंजी डालना शायद ही विकल्प होगा। 
Keyword: aviation, flight, airport, AAI, air india,
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