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गडकरी काम के धनी, विरोधियों से भी बनी

आदिति फडणीस /  January 02, 2019

लगातार इस तरह की अटकलें क्यों चल रही हैं कि अगर भाजपा को अगले आम चुनावों में पर्याप्त सीटें नहीं मिलती हैं तो केंद्रीय सड़क परिवहन, गंगा संरक्षण, जहाजरानी और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी को नरेंद्र मोदी की जगह प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है? गडकरी ने बार-बार इन अटकलों का खंडन किया है लेकिन जब तब कोई ट्वीट या बयान आ जाता है जिसे उनके साथ जोड़कर देखा जाता है और जिसमें पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए जाते हैं। इसमें उनकी हाल की एक कथित टिप्पणी भी शामिल है जिसमें उन्होंने कहा था कि पार्टी और सरकार के शीर्ष नेतृत्व को राज्य विधान सभा चुनावों में हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। 

 
शायद गडकरी ने ऐसा नहीं कहा था लेकिन उनके बारे में यह बात सही है कि वह भाजपा के भीतर और बाहर लोकप्रिय हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि वह खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो काम निकालने के लिए समन्वयक की तरह काम करता है। गडकरी के लिए गिलास कभी भी आधा खाली नहीं होता है बल्कि हमेशा आधा भरा होता है।  गडकरी का ताल्लुक नागपुर से है जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय भी है। वह महाराष्ट्र विधान परिषद में विपक्ष के नेता रह चुके हैं। उन्हें राज्य में वोट खींचने की क्षमताओं के लिए नहीं जाना जाता है। हालांकि उन्होंने 2014 के आम चुनावों में नागपुर सीट से कांग्रेस के विलास मुत्तेमवार को भारी अंतर से हराया था। भाजपा इससे पहले केवल 1996 में यह सीट जीत पाई थी जब बनवारी लाल पुरोहित ने कांग्रेस के बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एस के वानखेड़े की पुत्री कुंडा विजयकर को हराया था। पुरोहित मूलत: कांग्रेसी थे और पार्टी के टिकट पर यह सीट जीत चुके थे। साल 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने नागपुर में सभी छह सीटों पर जीत दर्ज की। इनमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी शामिल हैं। 
 
गडकरी ने लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में ठेकेदार के रूप में अपनी शुरुआत की और समृद्घि के सोपान चढ़ते हुए कई कंपनियों की स्थापना की। महाराष्ट्र के जनजातीय इलाकों में सड़क बनाते समय उन्होंने आदिवासी जीवन को करीब से देखा और इस बात को महसूस किया कि कैसे आदिवासी नक्सलियों से हमदर्दी रखते हैं।  सरकार के साथ उनका अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा और इसने उनके नजरिये को आकार दिया। यदि आप एक अफसरशाह हैं और वह मंत्री हैं तो आप अपने जोखिम पर उन्हें न कहने का खतरा मोल लेते हैं। ऐसा इसलिए हैं क्योंकि अपने व्यक्तिगत अनुभव से वह अच्छी तरह जानते हैं कि अफसरशाही कितनी व्यवधानकारी और अडिय़ल हो सकती है। वह सहयोग नहीं करने वाले अफसरशाहों को आड़े हाथ लेने से भी गुरेज नहीं करते हैं। 
 
ठेकेदार और कारोबारी के तौर पर गडकरी ने महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में सहकारिता की जटिल दुनिया में भी कदम रखा। इस इलाके में हमेशा से ही पूंजी की कमी रही है और यही कारण है कि वहां सहकारिता का प्रयोग फलफूल नहीं पाया। लेकिन गडकरी ने उस इलाके में सहकारिता की शुरुआत की। वह कंपनी समूह पूर्ति के प्रमुख हैं जो निर्माण से लेकर फर्नीचर और रिटेल सुपरमार्केट के क्षेत्र में सक्रिय है।  कई वर्षों तक विधान परिषद तक सीमित रहने के बाद 1995 में वह लोक निर्माण मंत्री बने। इस दौरान उन्होंने कई अच्छे काम किए। इनमें यातायात सर्वेक्षण की शुरुआत कर बीओटी  (बनाओ-चलाओ-सौंपो) के लिए वैज्ञानिक पद्घति बनाना, आईआरआर (रिटर्न की आंतरिक दर) और टोल की छूट अवधि पर फैसला शामिल है। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को मौजूदा नियमों में बदलाव करने के लिए मनाया और विरोध तथा संदेह के बीच नई टोल नीति बनाई। 
 
वर्ष 2002 में राज्यसभा के लिए उनका निर्विरोध चुनाव नाराजगी का कारण बना। वह इस बात पर इतराते थे कि विपक्ष में उनके कई दोस्त हैं। इनमें ठाकरे परिवार के गुट और कांग्रेस के नेता स्वर्गीय विलासराव देशमुख शामिल थे। लेकिन महाराष्ट्र भाजपा के एक वर्ग को लगा कि उन्होंने राजनीतिक रूप से समझौता किया है। इस वर्ग का कहना था कि गडकरी ने मौका पडऩे पर विपक्षी सरकार के लिए परेशानी खड़ी नहीं की। यही वजह थी कि 2002 में किसी भी दल ने राज्यसभा चुनाव में उनका विरोध नहीं किया। जो भी हो, गडकरी को एक ऐसा राजनेता माना जाता है जो विकास और राजनीति के समक्ष आने वाले मुद्दों को समझता है।  भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते भाजपा अध्यक्ष के तौर पर वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। ये आरोप कभी भी साबित नहीं हुए। जब उन्हें मोदी सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बनाया गया तो उन्होंने पूरी लगन और उत्साह के साथ अपना काम किया। कामकाज के मामले में कुछ ही मंत्री उनके सामने ठहर सकते हैं। उन्हें ऐसा मंत्री माना जाता है जिसने ठोस प्रदर्शन किया है। लेकिन भविष्य के बारे में कौन जानता है?
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