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ग्रांड ट्रंक रोड के रास्ते राजमार्ग का विकास

विवेक देवरॉय /  January 02, 2019

मौर्य साम्राज्य के समय एक सड़क तक्षशिला से लेकर पाटलिपुत्र के बीच बनी थी। उसकी कभी भी बराबरी नहीं की जा सकी लेकिन जीटी रोड उसके आसपास जरूर है। बता रहे हैं विवेक देवरॉय

 
ब्रिटिश गजेटियर से पता चलता है कि अंग्रेजों के पहले सड़कों की हालत बहुत खराब थी। वैसे हम यह जानते हैं कि पहले भी सड़कें बनती रही हैं। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। आजादी के बाद 1965 में जारी वाराणसी जिला गजेटियर से पता चलता है कि सड़कों को लेकर हुआ क्या था? सड़क के रास्ते संचार आधा-अधूरा होते हुए भी अतीत में पूरी तरह गुम नहीं था। मौर्य काल में पाटलिपुत्र से वाराणसी के रास्ते पश्चिमोत्तर भारत और अरब सागर तक जाने वाला एक मार्ग बनाया गया था। (यह नहीं मालूम नहीं है कि इस सड़क का निर्माण कब हुआ था?) लगता है कि शेरशाह के समय तक यह सड़क महज एक रास्ता भर रह गई थी। कहा जाता है कि शेरशाह ने इस मार्ग के आसपास कई चरणों में सरायों का भी निर्माण कराया था।  
 
थोड़े-बहुत बदलाव को छोड़ दें तो ग्रांड ट्रंक रोड ने मौर्य काल वाले मार्ग का ही अनुसरण किया है। अक्टूबर 1788 में वाराणसी के ब्रिटिश रेजिडेंट जोनाथन डंकन ने लिखा था कि 'शहर के भीतर की सड़कों की भी हालत काफी खस्ता थी। उसके अगले साल राजस्व संग्राहकों को अपने-अपने क्षेत्र में मौजूद सड़कों एवं राजमार्गों की मरम्मत करने का आदेश दिया गया। इसके लिए कोई उपकर नहीं लगाया गया था लेकिन अपने इलाकों में सड़क की मरम्मत के लिए मजदूरों का इंतजाम स्थानीय जमींदारों को करना था। स्थायी बंदोबस्त,1795 के मुताबिक जमींदारों को मजदूरों का इंतजाम करने के अलावा अपने क्षेत्र से होकर गुजरने वाली सड़कों की मरम्मत पर होने वाला खर्च भी वहन करना था।' लेकिन सड़कों की मरम्मत एवं देखभाल का काम धराशायी हो गया।
 
उत्तर भारत से गुजरने वाली एक सड़क का नाम संभवत: 'उत्तरापथ' था। कभी-कभार इस शब्दावली का इस्तेमाल एक भौगोलिक क्षेत्र के लिए तो कभी एक खास सड़क के लिए होता था। ऐसे वक्तव्य हैं कि पाणिनी ने व्याकरण पर लिखी अपनी किताब अष्टाध्यायी में उत्तरापथ के इर्दगिर्द के साम्राज्यों का जिक्र किया था। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। श्रीश चंद्र वसु ने 1897 में इस पुस्तक के अनुवाद में कहा है: उत्तरापथ शब्द के साथ आने वाले शब्दों का मतलब यह है कि 'उस रास्ते से जाने वाले व्यक्ति' और 'जिस तरह कहा जा रहा है'? असल में, उत्तरापथ के दो बड़े संपर्क मार्ग थे: उत्तरी मार्ग लाहौर से जालंधर, सहारनपुर, बिजनौर और गोरखपुर होते हुए बिहार और बंगाल तक जाता था जबकि दक्षिणी मार्ग लाहौर से बठिंडा, दिल्ली, हस्तिनापुर, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी और इलाहाबाद होते हुए पाटलिपुत्र तक जाता था। 
 
कौटिल्य ने अपने ग्रंथ अर्थशास्त्र में विभिन्न तरह की सड़कों का जिक्र किया है और वह कम जोखिम होने से जलमार्गों के बजाय सड़कों को प्राथमिकता देते हैं। कौटिल्य का कहना है कि 'सड़कों की देखभाल राजा की जिम्मेदारी होती है। राजा खनन कार्य और विनिर्माण कराएगा, जंगली लकड़ी और वनों का दोहन करेगा, मवेशियों की देखभाल एवं बिक्री की सुविधाएं मुहैया कराएगा, जल एवं जमीन के रास्ते आवागमन मार्गों का निर्माण करेगा और व्यावसायिक कस्बे बसाएगा।' (शामशास्त्री का अनुवाद)। सड़क को नुकसान पहुंचाने का सवाल है तो 'गलियों में गंदगी फैलाने वाले व्यक्ति पर एक पण के आठवें भाग का दंड लगेगा, सड़कों पर कीचड़ और जल जमाव के जिम्मेदार लोगों पर चौथाई पण का दंड लगेगा और राजमार्ग पर ऐसे अपराध करने वालों को दोगुने दंड का भागी बनना पड़ेगा।'
 
राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या का निर्धारण इन दिनों अलग ढंग से होता है। उत्तर और दक्षिण भारत को जोडऩे वाले सभी राजमार्गों की संख्या सम होती है। इन राजमार्गों की गिनती पूर्वी भारत से शुरू होती है और पश्चिमी भारत की तरफ बढ़ते जाने पर संख्या बढ़ती जाती है। मौर्य साम्राज्य के समय भी सड़कों का निर्माण हुआ था जिनमें से एक सड़क तो तक्षशिला से पाटलिपुत्र और उससे भी आगे तक जाती थी। इसकी बराबरी करने वाली सड़क तो नहीं हो सकती है लेकिन जीटी रोड काफी हद तक ऐसी ही है। हालांकि जीटी रोड भी पूरी तरह शेरशाह सूरी की बनाई सड़क जैसी नहीं है। साफ कहें तो जीटी रोड में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक जाने वाली सड़कें भी शामिल रही हैं। मुझे संदेह है कि आज शायद ही लोगों ने रुडयार्ड किपलिंग की कविता 'रूट मार्चिन' पढ़ी होगी। किपलिंग की इस कविता का आशय है, 'हम बारिश का मौसम बीतने के बाद और क्रिसमस आने के पहले भारत के मैदानों से होकर गुजर रहे हैं। ग्रांड ट्रंक रोड के रास्ते में दिखने वाले मंदिर तारीफ के लायक हैं और जगह-जगह मोर एवं बंदर नजर आते हैं। ग्रांड ट्रंक की पुरानी सड़क राइफल लटकाने वाली पट्टïी की तरह दिखती है।' मुझे लगा था कि पुराने गजेटियरों को खंगालने से यह पता चल जाएगा कि इस सड़क का नाम ग्रांड ट्रंक रोड कब और कैसे रखा गया था? लेकिन इसमें मेरी किस्मत ने साथ नहीं दिया।
 
'राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या का निर्धारण अब अलग तरह से होता है। पूर्व से पश्चिम की तरफ जाने वाले सभी राजमार्ग की विषम संख्या दी गई है। यह संख्या उत्तर भारत से शुरू होकर दक्षिण भारत में बढ़ती जाती है। दूसरे शब्दों में, अक्षांश जितना अधिक होगा, राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या उतनी कम होगी और छोटा अक्षांश होने पर राजमार्ग संख्या बड़ी होगी। मसलन, जम्मू कश्मीर में एनएच-1 है जबकि तमिलनाडु में एनएच-87 है। इसी तरह उत्तर-दक्षिण के सभी राजमार्गों की संख्या अब सम होती है। पूर्व से शुरू होकर पश्चिम की तरफ बढऩे पर संख्या बढ़ती जाती है। दूसरे शब्दों में, देशांतर बड़ा होने पर एनएच संख्या छोटी होगी और छोटे देशांतर वाली जगहों से गुजरने वाले एनएच की संख्या बड़ी होती है। मसलन, पूर्वोत्तर भारत में एनएच-2 है तो राजस्थान और गुजरात में एनएच-68 है।' 
 
राजमार्ग संख्या की नई व्यवस्था अपनाए जाने के बाद जीटी रोड का समूचा मार्ग एनएच-12 (डालखोला से बोकखाली), एनएच-27 के कुछ हिस्से (पूर्णिया-पटना खंड), एनएच-19 (पटना से आगरा), एनएच-44 के कुछ हिस्से (आगरा से नई दिल्ली, सोनीपत, अंबाला और लुधियाना के रास्ते जालंधर) और एनएच-3 (जालंधर से अटारी तक का हिस्सा) से होकर गुजरता है। इनमें से सबसे अहम संपर्क मार्ग एनएच-19 है। राजमार्ग संख्या तय करने की पुरानी व्यवस्था के तहत इसे एनएच-2 कहा जाता। एनएच-19 को ऐसे राजमार्ग के तौर पर परिभाषित किया गया है जो दिल्ली से शुरू होकर मथुरा, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, मोहनिया, औरंगाबाद, बरही, बगोदर, गोविंदपुर, आसनसोल और पलसित से होकर कोलकाता में खत्म हो जाती है। यह दिल्ली-कोलकाता मार्ग है और एनएच-19 के समूचे मार्ग को जीटी रोड के बराबर रखा जा सकता है।
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: GT road, varanasi, patliputra,,
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