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बाजार को इस साल देसी संस्थागत निवेशकों से मिलेगा कम सहारा

हंसिनी कार्तिक / मुंबई January 02, 2019

भारतीय इक्विटी के लिए अच्छी खबर यह है कि पिछले 6-8 महीने में वैश्विक रकम में सख्ती के बावजूद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत को लेकर आशावान बने हुए हैं। नोमूरा के विश्लेषकों ने कहा है कि भारत व इंडोनेशिया एशिया के नए उभरते हुए सितारे होंगे। मिरे ऐसेट की रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्पावधि में उतारचढ़ाव के बावजूद भारत को लेकर उनका नजरिया वैश्विक कारोबारी तनाव के बीच सकारात्मक बना हुआ है। वैश्विक ब्रोकरेज का मानना है कि ज्यादा लागत वाली रकम लंबी अवधि तक बने रहने से विदेशी निवेशक भारत समेत उभरते बाजारों से निवेश निकालने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में एफपीआई की तरफ से साल 2018 में हुई बिकवाली इस साल भी जारी रह सकती है।
 
साल 2018 पिछले चार वर्षों में पहला साल रहा जब एफपीआई भारतीय इक्विटी में शुद्ध बिकवाल बन गए। इसके बावजूद भारत का सीएनएक्स निफ्टी 3 फीसदी की बढ़त बनाए हुए है तो देसी संस्थागत निवेशकों (म्युचुअल फंड, बीमा कंपनियां, बैंक व अन्य बड़े देसी निवेशक) की भूमिका अहम रही है। इन्होंने न सिर्फ एफपीआई की बिकवाली की भरपाई की है और उनका शुद्ध निवेश साल 2018 में साल 2015 के बाद सबसे ज्यादा रहा है। फरवरी, अप्रैल, मई और अक्टूबर मेंं जब एफपीआई की बिकवाली सबसे ज्यादा रही तो देसी संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने खरीदारी की। लेकिन क्या इस साल डीआईआई की तरफ से इतना ही सहारा मिलेगा?
 
देश के अग्रणी फंड मैनेजरों का कहना है कि इसका जवाब देना कठिन है। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी के मुख्य निवेश अधिकारी एस नरेन ने भी कहा, यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कितना निवेश होगा। उन्होंने कहा, साल 2019 में एक थीम के तौर पर हम एसआईपी को लेकर काफी सकारात्मक हैं। हमें लगता है कि खास तौर से चुनाव वाले वर्ष में एसआईपी निवेश का अच्छा तरीका है। यूटीआई एएमसी के ग्रुप प्रेजिडेंट व इक्विटी प्रमुख वी सुब्रमण्यम इससे सहमत हैं। उन्होंने कहा कि एसआईपी के जरिए निवेश ही अभी आश्वस्त करने वाला एकमात्र कारक है। निवेश का एक हिस्सा निश्चित है और वह है एसआईपी के जरिए हर महीने 7-8 अरब रुपये का निवेश। लेकिन कितना एकमुश्त निवेश आएगा और कितनी निवेश निकासी होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन है।
 
हालांकि क्या यह निवेश एफपीआई की बिकवाली के दबाव की भरपाई के लिए पर्याप्त होगा, इस पर संदेह है। फ्रैंकलिन टेम्पलटन इन्वेस्टमेंट इंडिया के प्रबंध निदेशक व सीआईओ (इमर्जिंग मार्केट्स इक्विटी) आनंद राधाकृष्णन ने कहा, ढांचागत तौर पर निवेश मजबूत बना रह सकता है, लेकिन अल्पावधि में यह संभव है कि देसी संस्थागत निवेशकों की तरफ से निवेश अच्छा खासा नरम हो जाए। राधाकृष्णन के मुताबिक, एसआईपी के आकार में कुछ बदलाव संभव है। यह पहला मौका है जब हम देखेंगे कि बाजार की गिरावट पर एसआईपी निवेशक कैसी प्रतिक्रिया जताते हैं।
 
इसके अतिरिक्त फंड मैनेजर आगामी महीनों में निवेश निकासी के दबाव के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। सुब्रमण्यम ने कहा, एमएफ हालांकि शुद्ध खरीदार हैं, लेकिन सकल आंकड़े बताते हैं कि पुरानी रकम से निवेश निकासी हो रही है। विगत के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन का मतलब निवेश निकासी नहीं होता। नरेन ने कहा, हम साल 2019 को एसआईपी व एसटीपी (सिस्टमैटिक ट्रांसफर प्लान) के जरिए इक्विटी में निवेश के लिहाज से संग्रहण के चरण के तौर पर देख रहे हैं और इसमें निवेश का न्यूनतम नजरिया तीन साल का होगा।
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