बिजनेस स्टैंडर्ड - समाधान लागू करने में नहीं रुचि
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समाधान लागू करने में नहीं रुचि

ईशिता आयान दत्त, आशिष आर्यन और वीणा मणि / कोलकाता/नई दिल्ली January 02, 2019

दिवालिया संहिता के तहत कम से कम सात कंपनियां ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं जहां वरीयता प्राप्त बोलीदाताओं ने कुछ मसले उठाए हैं या समाधान योजना को लागू करने के अनिच्छुक हैं। इस तरह से इन कंपनियों का समाधान अटक गया है। चार कंपनियों में से तीन कास्टेक्स टेक्नोलॉजिज, एआरजीएल और मेटलिस्ट फोर्जिंग्स एमटेक ऑटो की सहायक कंपनियां हैं। एमटेक ऑटो, कास्टेक्स और एआरजीएल की बोली लिबर्टी समूह ने जीती है जबकि मेटलिक्स की बोली डेक्कन वैल्यू इन्वेस्टर्स के हाथ लगी है। लिबर्टी हाउस और डेक्कन वैल्यू ने लेनदारों को भुगतान नहीं किया है और नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में मूल्यांकन से संबंधित मसले उठाए हैं। आधुनिक मेटल्स के मामले में भी लिबर्टी ने इसी वजह का हवाला दिया है।

 
इनजेन कैपिटल की तरफ से ऑर्किड फार्मा को भुगतान होना बाकी है और रुचि सोया के मामले में अदाणी विल्मर ने रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल व लेनदारों की समिति को पत्र लिखकर कहा है कि वह अपनी पेशकश वापस ले रही है क्योंकि देरी से संपत्ति के मूल्यांकन में कमी आई है। अदाणी की योजना को अभी एनसीएलटी से मंजूरी नहीं मिली है। एक ओर जहां गैर-गंभीर बोलीदाता चिंता का कारण हैं, वहीं मामलों के समाधान में देरी भी आईबीसी के तहत दबाव वाली परिसंपत्तियों के समयबद्ध ढांचे के लिए चिंता का विषय है। यह इतना बड़ा मसला है कि मंत्रालय और भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) अगले हफ्ते इस पर विचार करेगा।
 
सूत्रों ने कहा, मंत्रालय और आईबीबीआई इसे लेकर चिंतित है। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की इस मसले पर अगले हफ्ते बैठक होने वाली है। इंडसलॉ के पार्टनर सौरभ कुमार ने कहा, कानून के तहत समय तय है और अनुरोध प्रस्ताव भी इसी के भीतर लाना होता है। बोलीदाता के नजरिये से वैसे लेनदेन के लिए कीमत की पेशकश की जाती है, जो 270 दिन में पूरा होना है। अगर यह अवधि निकल जाती है तो बोलीदाता के पास इससे निकलने का मौका होना चाहिए, लेकिन इस देरी की वजह बोलीदाता न हो। कुमार ने कई समाधान आवेदकों को सलाह दी है।
 
विशेषज्ञों ने हालांकि कहा कि लेनदारों के पास कानूनी कदम को लेकर काफी कम स्पष्टता है, अगर उसे लगता हो कि बोलीदाता समाधान योजना के मुताबिक नहीं चल रहा है या तरजीही बोलीदाता 270 दिन की तय समयावधि के भीतर समाधान प्रक्रिया से बाहर निकल रहा हो। दिवालिया संहिता में संभवत: ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई है। खेतान ऐंड कंपनी के विवाद समाधान पार्टनर दिवाकर माहेश्वरी ने कहा, ऐसा लगता है कि इस पहलू की जांच अदालत ने नहीं की है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ऐसी स्थिति की न्यायिक व्याख्या कैसे की जाती है क्योंंकि दिवालिया संहिता में ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई है।
 
एमटेक ऑटो के मामले में लेनदारों की समिति ने लिबर्टी को किसी भी दिवालिया कंपनी से बोली लगानेसे रोकने की मांग की थी। अपने आवेदन में लिबर्टी के खिलाफ आईबीसी की धारा 74 के इस्तेमाल की मांग करते हुए सीओसी ने कहा है कि मंजूर समाधान योजना की शर्तों के अनुपालन को लेकर कंपनी की तरफ से सही इरादे का अभाव नजर आता है। लिबर्टी हाउस ने अपना पक्ष रखते हुए मूल्यांकन पर सवाल उठाए हैं। धारा 74 (3) के अंतर्गत कामयाब समाधान आवेदकों के अधिकारियों को एक से पांच साल तक की कैद और एक लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, अगर वह मंजूर समाधान योजना की शर्र्तों का उल्लंघन करता है।
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