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नौकरी पर रिपोर्ट ठंडे बस्ते में

सोमेश झा / मुंबई 01 02, 2019

आंकड़ों पर चुप्पी

पानगडिय़ा ने 30 अगस्त, 2017 को पीएमओ को सौंप दी थी रिपोर्ट

सरकार ने अंतिम रिपोर्ट नहीं की सार्वजनिक

रोजगार सृजन की खराब तस्वीर के बाद पीएमओ ने मई 2017 में किया था इस कार्यबल का गठन

बिजनेस स्टैंडर्ड नौकरी पर रिपोर्ट ठंडे बस्ते मेंवर्ष 2017 में नीति आयोग के उपाध्यक्ष का पद छोडऩे से एक दिन पहले अरविंद पानगडिय़ा ने नौकरियों के आंकड़ों में सुधार की सिफारिश करने वाले कार्यबल की रिपोर्ट सौंप दी थी। वे इस कार्यबल की अध्यक्षता कर रहे थे। इस रिपोर्ट का प्रारूपसंस्करण सार्वजनिक डोमेन पर डालने के बावजूद सरकार ने अंतिम रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया। पानगडिय़ा द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को 30 अगस्त, 2017 को सौंपी गई कार्यबल की इस रिपोर्ट में इसके प्रारूप संस्करण में महत्त्वपूर्ण बदलाव किए गए थे। पानगडिय़ा ने 31 अगस्त को कार्यालय छोड़ दिया था और उनके उत्तराधिकारी राजीव कुमार ने पदभार संभाला था। बिजनेस स्टैंडर्ड ने पीएमओ, श्रम और रोजगार मंत्रालय, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय तथा नीति आयोग के पास उपलब्ध कार्यबल की अंतिम रिपोर्ट की एक प्रति देखी है।

मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान विभिन्न आधिकारिक और निजी अनुमानों में नौकरी सृजन की खराब तस्वीर प्रस्तुत किए जाने के बाद पीएमओ द्वारा मई 2017 में इस कार्यबल का गठन किया गया था। रिपोर्ट के निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण थे क्योंकि इसने सरकार को रोजगार सांख्यिकीय ढांचे में किए जाने वाले खास बदलावों के संबंध में दिशा-निर्देश दिए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रस्तावित प्रणाली से निरंतर आधार पर विस्तृत रूप में रोजगार, बेरोजगारी और वेतन का अनुमान तैयार होगा। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अपनी जरूरतों और आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने के लिए अनुकल प्रणाली तैयार करने के उद्देश्य से इसने सर्वेक्षणों और गणनाओं का निर्धारण किया है। अलबत्ता इसने सर्वेक्षण और गणनाओं की रूपरेखा को लेकर विस्तृत निर्देश नहीं दिया है। कार्यबल को लगता है कि यह अधिकार सांख्यिकीय एजेंसियों को दिया जा सकता है।

पिछले साल मीडिया को दिए गए अपने साक्षात्कारों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं ही नौकरियों को मापने के लिए विश्वसनीय आंकड़ों की अनुपस्थिति पर यह कहते हुए जोर दिया था कि नौकरियों के संबंध में आंकड़ों की कमी रोजगार सृजन की तुलना में अपने आप में एक बड़ी समस्या है।

इस अंतिम रिपोर्ट की एक मुख्य बात उद्यम-आधारित सर्वेक्षणों पर भरोसा करने के बजाय दीर्घ अवधि के दौरान ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार के मासिक अनुमानों के प्रबंध की सिफारिश करना थी। इसमें सरकार को 'वक्त के इस्तेमाल का सर्वेक्षण' करने केलिए भी कहा है ताकि ऐसे आंकड़े एकत्रित किए जा सकें कि लोग किसी विशिष्ट अवधि में अपना समय किस प्रकार बिताते हैं। प्रवासी श्रमिकों के आंकड़े एकत्र करने के लिए भीएक लक्षित सर्वेक्षण के लिए कहा गया।

कार्यबल ने यह महसूस किया कि देश में नौकरी सृजन करने का आदर्श तरीका एक मासिक घरेलू सर्वेक्षण है लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसा तुरंत संभव नहीं हो सकता है और त्रैमासिक तथा वार्षिक नौकरी सर्वेक्षणों की आगामी शृंखला जिसे सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण के तौर पर जाना जाता है, उसे रााष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा संचालित करके देश के श्रम बाजार से संबंधित जानकारी की उपलब्धता में मौजूदा खालीपन को भरा जा सकता है।  नौकरी पर अंतिम रिपोर्ट कार्यबल को जनता से मिली प्रतिक्रिया को समाहित कर तैयार की गई थी।

पानगडिय़ा के बाद नीति आयोग के उपाध्यक्ष बने राजीव कुमार ने 13 सिंतबर, 2017 को इस रिपोर्ट की एक प्रति कार्यबल के सभी सदस्यों के साथ साझा की थी। उसमें उन्होंने बताया था कि मसौदा के स्वरूप से इस रिपोर्ट में किस प्रकार से अहम बदलाव किए गए हैं। पानगडि़य़ा ने ई-मेल से भेजे गए प्रश्नों पर बार-बार अनुरोध करने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

कुमार ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया कि अंतिम रिपोर्ट को किस कारण से सार्वजनिक नहीं किया गया। कार्यबल में इस बात पर अलग-अलग मत था कि क्या आर्थिक जनगणना को त्रुटिपूर्ण पाए जाने के चलते इसे पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए। दूसरा मत था कि अंतिम रिपोर्ट में जनगणना की खामियों का जिक्र किया जाना चाहिए लेकिन इससे जनता में शर्मिंदा होने की संभावना थी। अंतत: कार्यबल ने सरकार से कहा कि इसे बंद करने के बजाय वह आर्थिक जनगणना की संख्या को दूसरे उद्यम रजिस्टरों से पुष्टि करे। 

कार्यबल ने सरकारी आंकड़ों तक शोधकर्ताओं की पहुंच होने की जरूरत पर भी विचार किया। 20 जून, 2017 को हुई बैठक में प्रधानमंत्री कार्यालय ने नीति आयोग से कहा कि सभी सरकारी आंकड़ों तक बाहरी शोधकर्ताओं की पहुंच को मंजूरी देने के प्रस्ताव पर और अधिक विचार करने की जरूरत है और मौजूदा स्थिति में ऐसे कदम उठाने की कोई जरूरत नहीं है। उसने नीति आयोग को कहा था कि वह इस पर और अधिक चर्चा करे।

कार्यबल ने लंबे समय के लिए अमेरिका के करेंट पॉपुलेशन सर्वे की तर्ज पर मासिक परिवार सर्वेक्षण करने की सिफारिश की थी और मोबाइल तकनीक की सहायता से आंकड़े संग्रह पर प्रयोग करने की सलाह दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि पहली बार लोगों से आमने-सामने मिलने के बाद उन्हें फोन पर कुछ अहम सवाल भेजे जा सकते हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया था कि इस विचार को अपनाने में अभी वक्त लगेगा। इसकी वजह है कि भारत में फिलहाल 100 फीसदी मोबाइल प्रसार नहीं हुआ है और बहुत से ऐसे परिवार हैंजहां फोन उपलब्ध होने के बावजूद वे प्रश्नों का जवाब दे पाने में सक्षम नहीं होंगे। 

कार्यबल ने कहा कि उद्यमों का सर्वेक्षण श्रम बाजारों पर सूचना का पूरक स्रोत हो सकता है और इसका इस्तेमाल विभिन्न क्षेत्र में श्रमिकों की संरचना, मजदूरी और उत्पादकता के अध्ययन के लिए किया जाना चाहिए। मसौदा रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के दौरान, कार्यबल ने अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा उपयोग में लाए जा रहे सांख्यिकीय मॉडल का परीक्षण करने के अलावा दक्षिण अफ्रीका द्वारा अपनाए जा रहे तरीके का भी अध्ययन किया जिसे उन्होंने भारत के संदर्भ में प्रासंगिक पाया। 
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