बिजनेस स्टैंडर्ड - बेहतर प्रदर्शन के इनाम में टिफिन कैरियर से मारुति तक का सफर
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बेहतर प्रदर्शन के इनाम में टिफिन कैरियर से मारुति तक का सफर

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  January 01, 2019

वर्ष 1970 के दशक के उत्तरार्ध में एक कंपनी प्रदर्शन पुरस्कार समारोह की श्वेत-श्याम तस्वीर एक पल को कैद करती है। इस तस्वीर में मध्यम स्तर के एक कर्मचारी को एक तरह के अच्छे प्रदर्शन के इनाम के रूप में स्टेनलेस स्टील का एक टिफिन प्राप्त करते हुए दिखाया गया है। इस तस्वीर में आकर्षण का केंद्र वह टिफिन नहीं बल्कि पुरस्कार प्राप्त करने वाले कर्मचारी के चेहरे की मुस्कान है। बेहतरीन प्रदर्शन के लिए इनाम के तौर पर स्टेनलेस स्टील टिफिन? मुझे बताया गया कि इसके लिए विशेष आग्रह किया जाता था। उस समय प्रदर्शन पुस्कार के रूप में दी जाने वाली अन्य चीजें दीवार घडिय़ां और एचएमटी घडिय़ां थीं। 

 
उस दौर को बीते ढाई दशक हो चुके हैं। हाल में एकरात गुरुग्राम के एक आईटी कार्यालय में प्रदर्शन पुरस्कार समारोह से पहले दौरा करने पर तस्वीर पहले के मुकाबले बिल्कुल जुदा नजर आई। जिस विशाल कक्ष में यह समारोह होना था, उसमें मारुति ऑल्टो और यामाहा मोटरसाइकिल प्रदर्शित की गई थीं। दोनों चमचमाते लाल रंग में थीं और उन्हें फीतों से सजाया गया था। ये कंपनी में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को पुरस्कार के रूप में दी जानी थीं। भारत में 1970 के दशक में कर्मचारी के प्रदर्शन का आकलन करना मुश्किल से ही एक विकसित विज्ञान या कला थी। यहां मानव संसाधन (एचआर) विभाग का कोई अस्तित्व नहीं था। पहले कर्मचारियों के आकलन का कोई निर्धारित मापदंड नहीं था। ऐसे में उस कंपनी में कर्मचारियों के आकलन में निष्पक्षता जरूरी होती थी। आज मझोली कंपनियां भी प्रदर्शन आकलन में निर्धारित मापदंडों का इस्तेमाल करती हैं। 
 
दूसरी ओर कार और मोटरसाइकिल प्राप्त करने वाले इन दो कर्मचारियों का आकलन कई निर्धारित मापदंडों पर होगा। इनमें वे कर्मचारी कंपनी के लिए कितना कारोबार लेकर आए, ग्राहकों ने उनका आकलन किस तरह किया है और उनकी टीम की रेटिंग आदि शामिल हैं।  अब केवल कर्मचारियों को ये चीजें ही पुरस्कार के रूप में नहीं दी जाती हैं। अब फ्लैट-स्क्रीन टीवी, दो व्यक्तियों को पांच सितारा होटल में रात्रि भोज, महंगी घडिय़ां एवं पेन, आई-पॉड पुस्कार के रूप में दिए जाते हैं ताकि कंपनी को प्रतिस्पर्धा में आगे रखा जा सके। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अब आईफोन और फिटबिट भी दिए जाने लगे हैं। 
 
भले ही ये सभी गैजेट ऑफिस टिफिन और दीवार घडिय़ों से बिल्कुल अलग हों, लेकिन ये भी मध्यम वर्ग की पसंदीदा चीजों में शुमार हैं। दूसरा अंतर केवल कीमतों में अंतर नहीं है। दीवार घडिय़ां और टिफिन ऐसी चीजें थीं, जो लोगों को उपहार या पुरस्कार के रूप में मिलती थीं। हालांकि अब कार, टीवी जैसी चीजें औसत कार्याधिकारी की भी पहुंच में हैं, भले ही उसने अपने जीवन में कभी प्रदर्शन पुस्कार नहीं जीता हो।  सीईओ को मिलने वाले वेतन के सालाना सर्वेक्षणों से हम अचंभित होते हैं और हम इस बात को स्वीकार करते हैं कि शीर्ष कार्याधिकारियों और कंपनियों के औसत वेतन में भारी अंतर है। हमारे यहां ऐसे सीईओ और शीर्ष पदों पर आसन कार्याधिकारी हैं, जिनकी जीवनशैली विकसित देशों के कार्याधिकारियों के समान है। औसत निम्न एïवं मध्यम रैंक के कार्याधिकारियों की समृद्धि पर कम ध्यान दिया गया है। ये ही भारत के उच्च मध्यम वर्ग के लिए मजबूत आधार हैं। निम्न एवं मध्यम रैंक के कार्याधिकारी वेतन और जीवन शैली के मामले में अब भी विकसित देशों के अपने समकक्षों से पीछे हैं, मगर वे अपने परिजनों और निश्चित रूप से अपने दादा-दादी की पीढ़ी की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। 
 
तब और अब में अंतर खुदरा ऋण बाजार का उदारीकरण है। घर, कार, शिक्षा, घूमना-फिरना तुलनात्मक रूप से किफायती दरों पर उपलब्ध हैं। वर्ष 1990 के दशक में कार ऋण की ब्याज दर 18 फीसदी से अधिक थी और इसके लिए बहुत अधिक कागजी कार्रवाई करनी पड़ती थी। आज करियर शुरू करने वाले युवाओं के 30 साल से पहले घर और कार खरीदने की संभावना होती है। अगर आपके दादा-दादी ने किसी सरकारी या निजी क्षेत्र की कंपनी के लिए काम किया है तो आपने उनसे सुना होगा कि उन्होंने घर खरीदने के लिए कंपनी से ऋण लिया। यह ऋण तब मिलता था, जब वे कंपनी के लिए बहुत से वर्ष काम करते थे और इसका भुगतान सार्वजनिक भविष्य की बचत से किए जाने की संभावना होती थी। 
 
इन दिनों प्रदर्शन पुस्कार की एक विडंबना लंबी अवधि का अभाव है। प्रतिस्पर्धा इतनी है कि कंपनियों को सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वालों को कीमती इनाम और बोनस देकर उनकी वफादारी हासिल करने को बाध्य होना पड़ता है। इसके बावजूद प्रतिस्पर्धा बढऩे और कंपनियों के एक-दूसरे के कर्मचारियों को हासिल करने की होड़ के कारण नौकरी छोडऩे वालों की दर लगातार बढ़ रही है।  1960 और 1970 के दशक में लोग अपने पूरे जीवन में एक या दो कंपनियों में काम करते थे और अपने जीवनभर की मेहनत के लिए सामान्य लाभ मिलने पर भी कंपनी की खूब प्रशंसा करते थे। इस जीवन शैली को मध्यम वर्ग के मूल्यों का मॉडल माना जाता है। यह इन दिनों की फिजूलखर्ची और प्रचुरता से बिल्कुल विपरीत है। असल में बाध्यता वाली वफादारी और मोलभाव वाली वफादारी में बहुत बारीक अंतर है। 
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