बिजनेस स्टैंडर्ड - नाकाफी नौकरियां और अर्थव्यवस्था के सिरदर्द
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नाकाफी नौकरियां और अर्थव्यवस्था के सिरदर्द

अजित बालकृष्णन /  January 01, 2019

हमें अपने आर्थिक सिद्धांतों पर नए सिरे से नजर डालने का वक्त आ गया है। आर्थिक गतिविधियों के विश्लेषण के लिए नए विकल्प अपनाने पर जोर दे रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
अगर गहन चिंतन करने वाले प्रेक्षक हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों को लेकर किसी एक बात पर सहमत हैं तो वह यह है कि इन चुनावों में आर्थिक मुद्दे हावी रहे हैं। युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार अवसरों की कमी और छोटे कारोबारियों को उनकी नकद-आधारित अर्थव्यवस्था की सुविधाजनक स्थिति से जबरन बेदखल किए जाने से पैदा हुआ गुस्सा अहम रहा है। ये कारोबारी इन कदमों को हमारी तरह आधुनिकता का पर्याय न मानते हुए बिक्री कर, जीएसटी, आयकर और अन्य सरकारी विभागों के रहमोकरम पर छोडऩे की कोशिश मानते हैं। 
 
मैं इन नतीजों के बाद मीडिया विश्लेषकों, आर्थिक सिद्धांतकारों और नेताओं को हैरानी में अपना सिर खुजाते देख रहा हूं। ऐसे हालात से सामना होने पर मैं अपना रुख आर्थिक सिद्धांतों की किताबों से भरी अपनी आलमारी की तरफ कर लेता हूं ताकि जानकार लोगों के विचारों से अवगत हो सकूं।  पिछले कुछ हफ्तों से मैं राघवन जगन्नाथन की किताब 'द जॉब्स क्राइसिस इन इंडिया' के पन्ने पलट रहा हूं। रोजगार समस्या पर कई तरह से विचार करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भारत की समस्या समुचित नौकरियां न होकर औपचारिक क्षेत्र में समुचित नौकरियां न पैदा होने की है। जगन्नाथन का औपचारिक रोजगार से आशय न्यूनतम तीन वर्षों की अनुबंध अवधि वाले उस रोजगार से है जिसमें नियोक्ता भविष्य निधि और स्वास्थ्य बीमा का अंशदान करता है। ये नौकरियां वस्त्र, पर्यटन, निर्माण, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा क्षेत्रों के छोटे एवं मझोले उद्यमों में होने की संभावना है। 
 
लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र पर मेरी पसंदीदा किताब सिद्धार्थ सरकार की लिखी 'थियोराइजिंग इनफॉर्मल इकॉनमी' में अलग नजरिया है। वह भारत में अनौपचारिक क्षेत्र के वजूद और उसके बने रहने से संबंधित सभी कारणों का जिक्र करते हैं। श्रम एवं मानवीय गतिविधि की अधिकता वाला अनौपचारिक रोजगार कर प्रणाली के बाहर रहते हुए भी कम गुणवत्ता के अधिक किफायती उत्पाद तैयार कर और ताजा सब्जियां एवं मछली बेचकर या घर की मरम्मत कर अपना वजूद न केवल बनाए रखता है बल्कि उसमें बढ़ोतरी भी करता है। प्रोफेसर सरकार कहते हैं कि खेती की बदहाली से तंग आकर शहरों का रुख करने वाले युवाओं को इन आर्थिक गतिविधियों में ही सबसे ज्यादा रोजगार मिलता है। 
 
भारत में लगभग हर कोई रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र को हमारी रोजगार चिंताओं के समाधान का रास्ता समझता है लेकिन एक किताब रियल एस्टेट को लेकर हमारी अपेक्षाओं पर थोड़ी सावधानी बरतने की हिदायत देती है। रोशेस्टर यूनिवर्सिटी की लीरेना गुई सीर्ले ने अपनी किताब 'लैंडस्केप्स ऑफ एक्युमुलेशन: रियल एस्टेट ऐंड द नियो-लिबरल इमेजिनेशन इन कंटेम्पररी इंडिया' में रियल एस्टेट उद्योग से किसी भी रूप में संबद्ध तमाम लोगों का विवरण दिया है। सीमेंट एवं स्टील उत्पादक, आर्किटेक्ट, इंजीनियर, वकील और अकाउंटेंट जैसे पेशेवर, अनुमति देने वाली सरकारी एजेंसियां, नगर निकाय एवं नेता, निवेशक, बैंक और घर खरीदने के इच्छुक लोगों के अलावा रियल एस्टेट विज्ञापन को राजस्व का अहम जरिया समझने वाली मीडिया कंपनियां भी इस समूचे उद्योग के हितधारक हैं। लीरेना के मुताबिक समाचारपत्रों में ऐसी रिपोर्ट आती रहती हैं जो रियल एस्टेट उद्योग को बढ़ावा देने में मददगार होती हैं। वह कहती हैं, 'समाचारपत्रों में रियल एस्टेट पर प्रकाशित होने वाले लेखों में नियमित तौर पर परिवारों के एकल होते जाने, घर-खरीदारों की उम्र में आती कमी, पश्चिमी शैली में जीवन जीने के अंदाज को बढ़ावा देने वाले फीचर नजर आते हैं।' उनका मानना है कि इन सभी का मिला-जुला असर यह हुआ है कि 'भारत के शहर अब पहले से भी ज्यादा गरीबों की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं'।
 
जब आर्थिक मुद्दे मौजूदा भारत की ही तरह हैरतअंगेज होने लगते हैं तो यह संकेत होता है कि हमें इनके बारे में सोचने का अपना मौजूदा रवैया बदलने की जरूरत है। कौशिक बसु की नई किताब 'द रिपब्लिक ऑफ बीलिफ्स, ए न्यू अप्रोच टू लॉ ऐंड इकनॉमिक्स' ऐसा ही नजरिया पेश करती है।  उनकी सलाह है कि दुनिया में जारी घटनाक्रम को एक खेल के तौर पर देखें। किसी भी खेल की तरह आपके पास गिने-चुने खिलाड़ी होते हैं जिन्हें खास तरह के कार्यों में से ही चुनना होता है और उनके द्वारा उठाए गए कदमों के आधार पर ही उन्हें नतीजा मिलता है। किसी देश में बने कानून को दूसरे खिलाडिय़ों के व्यवहार के बारे में लगाए जाने वाले अनुमान को प्रभावित कर पाने की क्षमता के तौर पर देखा जाता है। मसलन, फुटबाल के खेल में हरेक खिलाड़ी इस विश्वास से खेलता है कि दोनों गोलकीपरों के अलावा बाकी सभी खिलाड़ी गेंद को हाथ से नहीं छुएंगे। इसी तरह, हमारे विश्वास पर समान असर के जरिये आर्थिक क्षेत्र में वैधानिक कानूनों का प्रभाव पड़ता है। यह हमें यह अनुमान लगाने में मदद करता है कि जिंदगी के खेल में दूसरे लोग किस तरह बरताव करेंगे?
 
कौशिक बसु किसानों और उन्हें कर्ज देने वाले साहूकारों के बीच के रिश्ते को निर्धारित करने वाले कानून बनने पर मचने वाले हंगामे का जिक्र करते हुए कहते हैं कि इन कर्जदाताओं ने अब किसानों को कर्ज देना ही बंद कर दिया है। हम गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में फैली मौजूदा हलचल की बात नहीं कर रहे हैं। बसु जिस वाकये की बात कर रहे हैं वह 1818 का है। ब्रिटिश हुक्मरानों ने मराठों पर जीत के बाद बॉम्बे दक्कन इलाके में फैले दंगों को रोकने के लिए दीवानी अदालतों का गठन किया था। इसके पीछे कर्ज देने वाले साहूकारों और किसानों के बीच लेनदेन को दोनों के लिए समान बनाने की मंशा थी लेकिन ब्रिटिश शासन को जल्द ही यह अहसास हुआ कि कोई भी पक्ष अपने मामले लेकर अदालत नहीं आ रहा है। दक्कन दंगों की जांच के लिए गठित आयोग ने कहा था, 'मराठा समुदाय के कुन्बी किसान मारवाड़ी साहूकारों के लिए गाय जैसे हैं और वे इतने कीमती हैं कि साहूकार उन्हें मरने नहीं दे सकते हैं।'
 
प्रोफेसर बसु यह कहना चाह रहे हैं कि जिंदगी भी एक खेल है और उपलब्ध विकल्पों को देखते हुए कोई भी व्यक्ति ऐसा काम नहीं करेगा कि साम्यता बाधित हो। उदाहरण के तौर पर, अगर हर कोई सड़क की बायीं तरफ ही गाड़ी चलाने का फैसला करता है तो सड़क के दाहिने हिस्से में गाड़ी चलाने का विकल्प होते हुए भी यह आपके ही हित में है कि आप बाएं हिस्से में गाड़ी चलाएं। इस तरह, सड़क के बाएं हिस्से में गाड़ी चलाना अनिवार्य करने वाले कानून को स्वीकार्यता मिल जाएगी क्योंकि इससे हम यह अंदाजा लगा सकेंगे कि दूसरे लोग सड़क पर किस तरह गाड़ी चलाएंगे। क्या हमें अपने सभी आर्थिक कानूनों एवं गतिविधियों को इसी नजरिये से देखने की जरूरत है?
 
(लेखक 'द वेव राइडर, अ क्रॉनिकल ऑफ द इन्फॉर्मेशन एज' के लेखक हैं)
Keyword: india, economy, election,,
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