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हसीना की हैट्रिक

संपादकीय /  January 01, 2019

बांग्लादेश में हुए आम चुनाव के नतीजे साफ होने में अधिक वक्त नहीं लगा। चुनाव में शानदार सफलता हासिल कर सत्तारूढ़ अवामी लीग ने जीत की हैट्रिक लगाई है। अवामी लीग ने अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर संसद की कुल 298 में से 288 सीटों पर जीत दर्ज की है। बांग्लादेश नैशनल पार्टी (बीएनपी) की अगुआई वाले विपक्षी गठबंधन का लगभग सफाया हो गया है। जब चुनाव के नतीजे इस कदर एकतरफा हों तो सीटों की वास्तविक संख्या का कोई मायने नहीं रह जाता है।  लेकिन प्रधानमंत्री शेख हसीना की इस जबरदस्त जीत ने उन आरोपों को मजबूती दी है जिनके मुताबिक जबरन वॉकओवर वाले इस चुनाव में सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल ने चुनावी प्रक्रिया की सत्यनिष्ठा को चोट पहुंचाई है। इस लिहाज से अगले कुछ दिन और सप्ताह अहम होंगे। अगर हसीना चुनावी नतीजों से जाहिर होने वाली जबरदस्त लोकप्रियता नहीं रखती हैं तो उनका शासन जारी रहने पर बांग्लादेश की सड़कों पर व्यापक विरोध का न दिखना मुश्किल होगा। निश्चित रूप से अब वह एक ऐसी स्वेच्छाचारी नेता बन चुकी हैं जिसके शासन पर 20वीं सदी के लोकप्रिय तरीके जनमत संग्रह के जरिये मुहर लगाई जा चुकी है। 

 
भारत की शासन-व्यवस्था में बैठे तमाम लोगों ने बांग्लादेश के चुनाव में बीएनपी को जीत नहीं मिलने पर राहत की सांस ली होगी और ऐसा होना काफी हद तक सही भी है। बीएनपी जब पिछली बार सत्ता में थी तो उसकी नेता बेगम खालिदा जिया के कार्यकाल में क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर भारत की चिंताएं बढ़ गई थीं। कुछ अवसरवादी एवं कुछ वैचारिक समूहों के मेल से बने उस गठजोड़ में बांग्लादेशी समाज और राजनीति के कुछ बेहद रूढि़वादी तत्त्व भी शामिल थे। बीएनपी की अगुआई वाली वह सरकार भारत के लिए एक बड़ी समस्या साबित हुई थी। लेकिन इस्लामी आतंकवाद पर हसीना सरकार का कड़ा रुख पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारत की सुरक्षा हितों के लिहाज से काफी अहम है। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि भारत को हालिया घटनाक्रम को लेकर बहुत खुश होना चाहिए। एक स्थिर बांग्लादेश भारत के हित में है लेकिन इसी के साथ उसका उदार और लोकतांत्रिक होना भी जरूरी है। 
 
हसीना के पास अपनी पीठ थपथपाने के लिए बहुत कुछ है। उनकी सरकार के रहते हुए बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति तेज हुई है और पिछले वित्त वर्ष में तो यह दर 8 फीसदी के भी करीब पहुंच गई थी। इस देश के मानव विकास सूचकांक इसके आय स्तर को मात देते हैं और इसका वस्त्र निर्यात क्षेत्र भी काफी फल-फूल रहा है। हसीना के मार्गदर्शन में बांग्लादेश एक अल्प-विकसित देश से मध्य-आय वाले देश में तब्दील हो रहा है। गरीबी को 20 फीसदी के करीब लाया जा चुका है और देश के 16.5 करोड़ लोगों में से करीब 90 फीसदी तक बिजली पहुंच चुकी है।
 
इसके बावजूद हसीना को अपने अगले कार्यकाल में गंभीर चुनौतियों का सामना करना होगा। उन्हें बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और इसके निर्यात उत्पादों में विविधता लानी होगी। उन्हें अधिक नमनीय एवं पारदर्शी सार्वजनिक संस्थानों के निर्माण के लिए भी प्रयास करने होंगे। उन्हें इस जबरदस्त जनादेश से मिले अवसर का फायदा उठाते हुए बांग्लादेश में बहु-दलीय लोकतंत्र की गूंज को भी नया स्वर देने की पहल करनी चाहिए। अगर देश को अस्थिरता के भंवर में नहीं धकेलना है तो एक मजबूत सरकार को एक सक्षम विपक्ष की भी जरूरत होती है जो उसे जिम्मेदारी का अहसास कराता रहे। बांग्लादेश की कामयाबी का मतलब है कि वह 1970 और 80 के दशकों के काले दौर को पीछे छोड़ चुका है। अब समय आ गया है कि इसकी राजनीति भी पुरानी त्रासदियों को पीछे छोड़ दे।
Keyword: bangladesh, Sheikh Hasina, election,,
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