बिजनेस स्टैंडर्ड - रूस के लिए कारोबारी गलियारे का अटका है काम
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रूस के लिए कारोबारी गलियारे का अटका है काम

शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली 01 01, 2019

महत्त्वाकांक्षी इंटरनैशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर

करीब 8 महीने पहले भारत ने इस गलियारे की योजना पेश की थी 

इससे मध्य एशिया, रूस व उससे जुड़े  यूरोप के देशों, अफगानिस्तान में कारोबार आसान होने की उम्मीद थी

ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, बैंकिंग संबंधी दिक्कतों और तुर्की के सस्ते कारोबारी मार्ग की वजह से काम अटका

हालांकि योजनाकारों के मुताबिक अब भी इस मार्ग का महत्त्व बना हुआ है

बिजनेस स्टैंडर्ड रूस के लिए कारोबारी गलियारे का अटका है कामभारत की ओर से विकसित किए जा रहे कई देशों को जोडऩे वाले कारोबारी मार्ग पर अब तक कोई प्रगति नहीं हो पाई है। यह गलियारा रूस और यूरोप के साथ मध्य एशिया के बेहतर क्षमता वाले बाजारों और अफगानिस्तान को जोडऩे के लिए बनाया जाना है। इसकी शुरुआत 8 महीने से ज्यादा समय पहले की गई थी। सरकार के अधिकारियों को डर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने, कुछ बैंकिंग दिक्कतों और तुर्की के माध्यम से सस्ते कारोबारी मार्ग के विकल्प की वजह से इंटरनैशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) पटरी से उतर सकता है, जिसे दक्षिण ईरान के चाबहार बंदरगाह को ध्यान में रखकर बनाया जाना है।

विदेश मंत्रालय के भौगोलिक जानकारों द्वारा तैयार किए गए आईएनएसटीसी मध्य एशिया के लिए भारत की योजना के केंद्र में बना हुआ है। उम्मीद की जा रही है कि इससे अफगानिस्तान तक पहुंच बढ़ेगी। वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों को उम्मीद है इससे रूस, ईरान व अन्य देशों को निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। इस योजना के तहत सभी मौसम में चलने वाले 1,000 किलोमीटर लंबे राजमार्ग का विकास किया जाना है, जिसके माध्यम से एशिया के रेगिस्तानों होते हुए अजरबैजान को माल पहुंचाया जाएगा। यहां पर लॉजिस्टिक केंद्र स्थापित कर रूस के बंदरगाह अस्ट्राखन तक माल पहुंचाया जाएगा और उसके बाद रूस के यूरोपीय बाजारों को माल भेजा जा सकेगा। इसके अलावा तुर्कमेनिस्तान और उसके पड़ोसी देशों में माल भेजा जा सकेगा। 

बहरहाल निर्यातकों का कहना है कि बैंकिंग सेवाएं न होने के कारण इस मार्ग से कॉर्गो भेजने में मुश्किल बनी रहेगी और भारत के माल ढुलाई करने वालों को ईरान का सहारा लेना होगा। फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन के महानिदेशक अजय सहाय ने कहा, 'बहुत सी समस्याएं हैं। बैंक बंदर अब्बास होकर गुजरने वाले ट्रांजिट गुड्य के दस्तावेज पर बातचीत कर रहे हैं। निर्यातक अंतिम स्थल तक पहुंचने का संयुक्त बिल दिखाने को तैयार हैं, क्योंकि यहां सामान सिर्फ परिवर्तनीय होते है। लेकिन बैंक इसे लेकर परेशान हैं। इसके अलावा अब अमेरिकी प्रतिबंध का दौर भी शुरू हो गया है।'  

रूस की कंपनियां माल ढुलाई और ट्रैकिंग सेवा मुहैया करा रही हैं, ऐसे में भारत के फ्रेट फॉरवर्डर्स की कम उपस्थिति एक और चुनौती है। उन्होंने कहा कि केवल कुछ ही भारतीय कारोबारी ईरान के कारोबारियों से जुड़े हुए हैं, जो कारोबार करने के लिए कभी कभी जरूरी हो जाता है। 

भारत का ईरान के साथ मौजूदा कारोबार ज्यादातर बंदर अब्बास बंदरगाह के माध्यम से होता है, जहां से करीब 85 प्रतिशत समुद्री कारोबार है। दिल्ली कवायद में है कि दक्षिण ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर दिया जाए। अधिकारियों ने कहा कि गहरे बंदरगाह से ज्यादा माल ढुलाई वाले जहाजों का परिचालन हो सकता है, यह कार्यक्रम से पीछे चल रहा है और आईएनएसटीसी को भी पीछे खींच रहा है।  बरहाल बंदर अब्बास में भीड़ ज्यादा है। रेलवे, सड़क और जहाज से यह जुड़ा हुआ है, वहीं यहां से रूस 3,200 किलोमीटर दूर है और जहाजों से अनलोडिंग में बहुत वक्त लगता है। 

मुंबई के नहवा शेवा बंदरगार से बंदर अब्बास के लिए दो मार्ग हैं। पहला मार्ग कैस्पियन सागर से अस्ट्राखन होकर गुजरता है। वहीं अन्य मार्ग अजरबैजान के बाकू जाता है, जहां से जमीन या समुद्र मार्ग से रूस को माल जाता है।  लेकिन तमाम कारोबारी इससे बचना चाहते हैं क्योंकि रूस बड़े शिविंग को बोस्फोरस स्टे्रट के माध्यम से अनुमति देता है, जिससे जहाज सेवटोपोल के ब्लैक सी पोर्ट पहुंचती है। एक राजनयिक सूत्र ने कहा, 'क्रीमेनियन प्रायदीप की राजधानी में बंदरगाह है, जिस पर हाल ही में रूस ने कब्जा कर लिया, जहां अब परिचालन क्षमता बढ़ाने पर निवेश किया जा रहा है।' 

वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि भारत के रूस के साथ कंटेनर का कारोबार अब तक स्वेज नहर होकर होता था, जो यूरोप और सेंंट पीटरबर्ग होकर गुजरती है। ट्रेड प्रमोशन काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन मोहित सिंगला ने कहा, 'रूस के साथ कारोबार की ढुलाई की लागत ज्यादा है। परंपरागत मार्ग से एक यूनिट की ढुलाई में करीब 7,000 डॉलर लगता है। आईएनएसटीसी से लागत 2,700-2,800 डॉलर आती है। लेकिन तुर्की के  स्वेज  नहर और फिर बोस्फोरस होकर जाने वाले मार्ग से खर्च 1,200 डॉलर प्रति यूनिट आता है।'  

यह गलियारा भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यह पड़ोसी देश पाकिस्तान से होकर नहीं गुजरता और युद्ध प्रभावित अफगानिस्तान जाता है। पिछले नवंबर मेंं 15,000 टन गेहूं इस मार्ग से भेजा गया। ईरान के उत्तर पूर्व स्थित काफ और अफगानिस्तान के हेरात के बीच बननेन वाली रेल लाइन भी अटकी हुई है, जो दो साल पहले शुरू की गई थी।

Keyword: Russia, transport, INSTC, Middle Asia, Iran, US sanction, Banking, Turkey, Planner, Business Road, Corridor, Europe, Afganistan,
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