बिजनेस स्टैंडर्ड - कपड़ा उद्योग को खुशहाली का इंतजार
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कपड़ा उद्योग को खुशहाली का इंतजार

सुशील मिश्र / मुंबई December 31, 2018

कपड़ा उद्योग के लिए 2018 भी तंगहाली वाला ही साबित हुआ। कपड़ा कारोबार नकदी की समस्या, कमजोर ग्राहकी और उधारी के मकडज़ाल से आजाद नहीं हो सके। यार्न में उतार-चढ़ाव कारोबारियों के लिए बरबादी का सबब बना हुआ है। लुभावनी सरकारी नीतियां फाइलों में कैद होने से कारोबारियों को नीतियों का कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है। हालांकि साल की शुरुआत में महाराष्ट्र की कपड़ा नीति और साल के आखिरी में बिजली दरों में कटौती करके महाराष्ट्र सरकार ने पड़ोसी राज्यों से अपने को बेहतर साबित किया। 
 
बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाला कपड़ा कारोबार कुछ सालों से बेरोजगारी का कारखाना साबित हो रहा है। लाखों लोगों के हाथों से काम छिन चुका है और जिनके पास काम है उनको यह भरोसा नहीं है कि यह कब तक रहेगा। कपड़ा कारोबारियों की सबसे मजबूत संस्था भारत मर्चेंट्स चैंबर के मंत्री विनोद गुप्ता कहते हैं कि कपड़ा व्यवसाय को पैसे की तंगहाली ने पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया है। जिस कपड़े की बिक्री का भुगतान आज के दो साल पहले 30 से 60 दिन में हो जाता था वह आज 150 दिन बाद भी प्रश्न बना हुआ है जिससे बाजार रसातल में चला गया है। यार्न बाजार कपड़ा कारोबार को बुरी तरह पिछले कई सालों से छकता रहा है। सरकारें वादे करती हैं, साल निकल जाता है लेकिन यार्न की कीमतों में स्थिरता लाने वाला कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया गया। सरकार वादा करती है लेकिन वे वादे ही रह जाते हैं। उदाहरण के लिए नई मशीन लेने के लिए ब्याज सब्सिडी अनुमति मिलने के बाद भी तीन साल से यह सरकारी फाइलों में ही कैद है।
 
कपड़ा कारोबारी जीएसटी की पेचीदगियों को लगभग समझ चुके हैं लेकिन समय पर रिटर्न न मिलने और बदलाव की आहट के कारण अभी भी कपड़ा उद्योग जीएसटी को लेकर भ्रमित है। लूम कारखानों की रौनक नदारद है। कपड़ा कारोबारी राजीव सिंघल कहते हैं कि कारोबारियों को भी अपने तरीकों में बदलते जमाने के अनुसार कुछ बदलाव करने होंगे। बिक्री के नए रास्ते तलाशने होंगे क्योंकि कारोबार माल कल्चर से आगे निकलकर ऑनलाइन शॉपिंग की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। कपड़ा उद्योग को उबारने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाए। जिसके कारण पड़ोसी राज्यों के कारोबारी महाराष्ट्र का नियम अपने यहां भी लागू करने की मांग कर रहे हैं। फरवरी 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने नई कपड़ा नीति को मंजूरी दी। जिसमें कहा गया कि इस नीति से राज्य में 36 हजार करोड़ रुपये का निवेश होगा, 10 लाख नए रोजगार पैदा होगे और 4,649 करोड़ रुपये की विभिन्न योजनाएं लागू की जाएगी। अपारंपारिक सूत उत्पादन, तैयार कपड़ा बनाने व टेक्निकल टेक्सटाइल क्षेत्र में पांच फीसदी अनुदान दिया जाएगा। राज्य में आईपीडीसी परियोजना के तहत कुल कीमत का 25 फीसदी या 37.50 करोड़ रुपये, इसमें जो कम होगा वह अनुदान योजना शुरू करने के लिए दिया जाएगा। अपनी नीति को मजबूत करने के लिए नवंबर में सरकार ने बिजली दरों में कटौती की जिसके तहत सहकारी सूत मिलों की तीन रुपये प्रति यूनिट बिजली की छूट दी जाएगी। उसने निजी सूत मिलों, पहली बार निटिंग, होजरी और गारमेंट उद्योग को भी बिजली दर में रियायत देने की घोषणा की है। 
 
महाराष्ट्र की नीति को गुजरात में भी लागू करने के लिए सूरत के कपड़ा कारोबारी आंदोलन कर रहे हैं। सूरत के कपड़ा कारोबारियों का कहना है कि महाराष्ट्र में बिजली सस्ती होने के कारण उद्योग यहां से पलायन कर रहे हैं। तंगी के कारण लाखों लूम बंद हो चुके हैं। दूसरी तरफ भिवंडी के लूम मालिकों का कहना है कि सरकार ने घोषणा तो कर दी है लेकिन अभी तक सरकारी योजनाओं का उन्हे कोई फायदा नहीं मिला है। यही वजह है कि आधे से ज्यादा लूम बंद पड़े हैं। कपड़ा कारोबारियों का कहना है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश और पाकिस्तान में मजदूरी कम है। इसके अलावा सरकार उन्हें सब्सिडी दे रही है जिसके कारण उनका माल सस्ता पड़ रहा है। जो भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए मुसीबत का सबब बना है। ऐसे में सरकार इन पर अंकुश लगाने वाला कदम उठाए। 
Keyword: textiles, export, कपड़ा परिधान,
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