बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकों में पूंजी डालना कर्ज माफी से अलग नहीं
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बैंकों में पूंजी डालना कर्ज माफी से अलग नहीं

तमाल बंद्योपाध्याय /  December 31, 2018

सार्वजनिक बैंकों में पूंजी डालने के सरकार के कदम से कुछ कमजोर बैंकों को आरबीआई के सख्त नियमों से थोड़ी राहत मिल सकती है। बता रहे हैं तमाल बंद्योपाध्याय
 
कर्ज फंसने से बेहाल सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) के लिए क्रिसमस शायद समय से थोड़ा पहले ही आ गया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इनके लिए सेंटा क्लॉज की भूमिका अदा करते हुए 410 अरब रुपये की पूंजी इन बैंकों में डालने की घोषणा की है। इस प्रस्ताव को संसद की मंजूरी मिलते ही फंसे कर्ज की वसूली न हो पाने से परेशान सरकारी बैंकों को राहत मिलने की उम्मीद बंधी है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों में 650 अरब रुपये की पूंजी डालने का बजट प्रावधान रखा था। इसमें से 420 अरब रुपये का आवंटन अब भी होना बाकी है। इसका मतलब है कि मार्च 2019 तक सार्वजनिक बैंकों के भीतर कुल 830 अरब रुपये डाले जाने हैं। इस तरह चालू वित्त वर्ष के दौरान इन बैंकों में डाली जाने वाली कुल पूंजी 1.06 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगी।
 
अक्टूबर 2017 में सरकार ने सार्वजनिक बैंकों में चरणबद्ध तरीके से 2.11 लाख करोड़ रुपये की भारी-भरकम पूंजी डालने की घोषणा की थी। भारतीय बैंकिंग उद्योग की कुल परिसंपत्ति में सार्वजनिक बैंकों की हिस्सेदारी 70 फीसदी से कम ही है। बहरहाल जेटली की तरफ से गत दिनों घोषित नए पैकेज को संसद की मंजूरी मिलने पर वह भी इसका हिस्सा हो जाएगा। वर्ष 1985-86 और 2016-17 के बीच सरकार ने इन बैंकों में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये डाले थे। इसमें से बड़ी पूंजी वर्ष 2008 में लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद उभरे वैश्विक आर्थिक संकट के बाद आई।
 
इस संकट के दुष्परिणामों को दूर करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंकिंग प्रणाली में पूंजी उड़ेल दी और नीतिगत ब्याज दरों को भी ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर ले आया। अपने पास काफी अधिक पूंजी होने और उपभोग बढ़ाने के लिए पड़ रहे चौतरफा दबावों के बीच बैंकों ने खुलकर कर्ज बांटे। इसका नतीजा यह निकला कि बैंकों के पास फंसे कर्ज का अंबार खड़ा होने लगा। इन बैंकों को इतनी अधिक पूंजी की जरूरत क्यों है? दरअसल फंसे कर्जों के लिए वित्तीय प्रावधान करने से उनके पास पूंजी घट गई है और वे नए कर्ज भी नहीं दे पा रहे हैं। इसके अलावा आरबीआई ने 11 सार्वजनिक बैंकों पर सख्त पाबंदियां लगाई हुई हैं। अपने तरीके नहीं सुधारने तक उन पर सामान्य बैंकिंग कामकाज पर भी पाबंदियां लगी हुई हैं। बैंकिंग क्षेत्र की ऋण वृद्धि दर 15 फीसदी को पार कर चुकी है लेकिन सरकार को लगता है कि यह काफी नहीं है और बैंकों को अधिक कर्ज देने चाहिए।
 
नई पूंजी डालने से कुछ कमजोर सार्वजनिक बैंकों को आरबीआई की इस सख्ती से निजात मिल सकेगी और वे दोबारा कर्ज दे सकेंगे। अगर आरबीआई ने अपने त्वरित उपचारात्मक उपाय (पीसीए) संबंधी मसौदे को नरम बना दिया होता तो शायद बजट अनुमान से अधिक पूंजी नहीं डाली जाती। यह समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रदर्शन पर नजर डालने के लिए माकूल है। वित्त वर्ष 2015-16 की दूसरी छमाही में आरबीआई ने पहली बार बैंकों के लिए परिसंपत्ति गुणवत्ता का आकलन किया था। दिसंबर 2015 से लेकर मार्च 2017 तक की पांच तिमाहियों में बैंकों ने अपने फंसे कर्जों की शिनाख्त की लेकिन उन पर कोई कदम नहीं उठाया गया। सच तो यह है कि बैंकिंग क्षेत्र में 70 फीसदी से भी कम हिस्सेदारी रखने वाले सार्वजनिक बैंकों की खराब कर्ज में हिस्सेदारी इससे अधिक है। इन बैंकों की गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) जून के 8.74 लाख करोड़ रुपये से मामूली गिरावट के साथ सितंबर में 8.69 लाख करोड़ रुपये पर आ गई लेकिन वह सितंबर 2017 के 7.34 लाख करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक है। सितंबर 2018 में पैसे को अलग रखने के बाद शुद्ध एनपीए 4.83 लाख करोड़ रुपये रहा है जबकि एक साल पहले यह 3.97 लाख करोड़ रुपये था।
 
कुछ बैंकों पर अलग से नजर डालते हैं। देश के 21 में से 12 सार्वजनिक बैंक सितंबर तिमाही में घाटे में रहे थे। आईडीबीआई बैंक ने 12 में से 10 तिमाही में घाटा उठाया है और इसका कुल आकार 23,600 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि अब भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने इसका अधिग्रहण कर लिया है और सरकार को इसकी फिक्र करने की जरूरत नहीं है। इंडियन ओवरसीज बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और यूको बैंक ने इन सभी 12 तिमाहियों में कुल मिलाकर 37,500 करोड़ रुपये का घाटा उठाया है। देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र को भी 11 तिमाही में कुल 94,00 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा। कुल मिलाकर इस दौरान सार्वजनिक बैंकों को 1.84 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 1.2 फीसदी है। यह घाटा 1986 से लेकर 2017 के बीच बैंकों में डाली गई कुल पूंजी को भी पार कर जाता है। अनुमान है कि दिसंबर तिमाही तक सार्वजनिक बैंकों का घाटा 2.1 लाख करोड़ रुपये की नई पूंजी को भी पीछे छोड़ देगा।
 
चार सार्वजनिक बैंकों का अग्रिम पोर्टफोलियो जून तिमाही की तुलना में सितंबर तिमाही में कम हो गया। इनमें से 11 बैंकों का कर्ज आवंटन कम हुआ है। इनमें से दो बैंकों में तो 10 फीसदी से अधिक गिरावट हुई है। इसी तरह सार्वजनिक बैंकों में जमा राशि भी कम हुई है। सात बैंकों का जमा पोर्टफोलियो कम हो गया है। आरबीआई की पाबंदियों का जमा संवद्र्धन पर असर नहीं पड़ रहा है।  अंत में, छह बैंकों का सकल एनपीए जून की तुलना में सितंबर तिमाही में बढ़ा है। सितंबर तिमाही में आईडीबीआई बैंक का सकल एनपीए 30 फीसदी से अधिक रहा जबकि यूको, इंडियन ओवरसीज, देना, यूनाइटेड एवं सेंट्रल बैंक का सकल एनपीए 20 फीसदी से अधिक रहा। छह बैंकों का सकल एनपीए 15 फीसदी से अधिक रहा।
 
शुद्ध एनपीए के मामले में, नौ सार्वजनिक बैंकों का स्तर 10 फीसदी से ऊपर 17.3 फीसदी तक पहुंच गया। इनमें से कुछ बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता सितंबर में और खराब हो गई। क्या इन सारे बैंकों को कर्ज देने के सही तरीके के बारे में मालूम है। शायद नहीं, अगर जानते तो वे इस स्थिति में नहीं पहुंचते। फंसे कर्ज में हुई बढ़ोतरी के लिए अर्थव्यवस्था की हालत को दोष देना उतना भरोसेमंद नहीं है क्योंकि इसी परिवेश में रहते हुए निजी क्षेत्र के बैंकों की परिसंपत्ति गुïणवत्ता बेहतर है। प्रोजेक्ट आकलन, जोखिम प्रबंधन, पर्यवेक्षण और शासन की गुणवत्ता जैसे बुनियादी कष्टप्रद बिंदुओं पर ध्यान देने के बजाय सार्वजनिक बैंकों में समय-समय पर पूंजी डालने की परिपाटी किसानों का कर्ज माफ करने से अलग नहीं है। किसानों को अधिक उपज पैदा करने और उनकी उपज का वाजिब दाम एवं बाजार सुनिश्चित करना उनके कष्ट को दूर करने का बेहतर तरीका है।
 
कृषि ऋण माफी से कर्ज संस्कृति नष्ट होती है। इसी तरह बैंकों में डाली गई पूंजी उनकी कार्यशैली में बदलाव को रोकती है। लेकिन इसकी फिक्र किसे है? आम चुनाव नजदीक होने से सार्वजनिक धन के कृषि कर्ज माफी और सार्वजनिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में निरर्थक प्रवाह पर कोई अंत नहीं होगा। 
 
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता एवं लेखक हैं) 
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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