बिजनेस स्टैंडर्ड - अलोकप्रिय पर अहम नीतिगत पहलुओं पर एक नजर
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अलोकप्रिय पर अहम नीतिगत पहलुओं पर एक नजर

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  December 30, 2018

साल खत्म होने जा रहा है। लिहाजा यह समय नए साल में आने वाली चुनौतियों पर गौर करने के लिए माकूल है। 'लाल' करार दिए जाने के जोखिम के बावजूद इस लेख में नए साल में दो जरूरी पहलुओं पर तवज्जो दिए जाने का उल्लेख किया जाएगा। विशुद्ध रूप से राजनीतिक अर्थव्यवस्था का मामला होने से किसानों की समस्याओं पर अधिकांश नीतिगत कदमों का जोर दिखेगा। कृषि क्षेत्र की खराब हालत और अगले कुछ महीनों में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों में किसानों की बड़ी तादाद को देखते हुए ऐसा होने की पूरी संभावना है। 

 
हालांकि ऐसे आलोचकों की कमी नहीं है जो कृषि ऋण माफी और अन्य रियायतों को गलत बताते हैं लेकिन यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि 'दूसरे' के प्रति असुविधा होने का इस आलोचना में कितना अंशदान है? हरेक दूसरा नीतिगत टिप्पणीकार मानता है कि कृषि ऋण पर दी जाने वाली रियायतें एवं कर्ज माफी बुरी है और इससे बैंकिंग प्रणाली को नुकसान होगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संकट से गुजर रहे अन्य उद्योगों पर नजर डालना कैसा रहेगा? जब विमानन उद्योग की स्थिति खराब थी तब नीति-निर्माताओं ने विमानन नीति को बदल दिया और बैंकों को भी विमानन कंपनियों को अधिक फंड जारी करने के लिए कहा गया। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की चपेट में आने और अनुबंधों के पुनर्निर्धारण पर उच्चतम न्यायालय की रोक से घबराया बिजली उत्पादन क्षेत्र सरकारी रियायतें पाने और ऋण पाने के लिए नीतियों को प्रभावित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। पहले यह देखा जा चुका है कि बैंकों का कर्ज नहीं चुका पाने पर स्टील क्षेत्र को ऋण पुनर्गठन एवं बेलआउट पैकेज दिए गए।
 
असल में, शहरों में रहने वाले टिप्पणीकारों को लगता है कि ये देश का ढांचागत निर्माण करने वाले प्रमुख उद्योग हैं। इसी वजह से कर्ज माफी एवं बेलआउट पर कुछ शिकायतें होते हुए भी व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह सोचकर चुप्पी साध ली जाती है कि राष्ट्र-निर्माण की कोशिश में शामिल इन संगठित उद्योग मदद के हकदार हैं। हालांकि खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र का वजूद बचाए रखना भी समाज एवं देश के लिए उसी तरह जरूरी है जितना देश के भौतिक ढांचे के निर्माण में लगे उद्योग हैं। अगर कृषि क्षेत्र अनुत्पादक एवं अनाकर्षक है तो देश के 1.2 अरब लोगों का पेट भर पाना असंभव हो जाएगा। यह कहना कोई जवाब नहीं होगा कि कच्चे तेल की तरह खाद्यान्न का भी आयात कर लिया जाएगा। वैसी सोच आबादी के खेतिहर तबके को किसी लाभकारी काम के बगैर ही रख देगी जो उनके भीतर गुस्सा और 'माओवादी' स्वभाव पैदा होने के एकदम माकूल होगा।
 
ग्रामीण पेशों को छोड़कर शहरी बस्तियों में लोगों की आवाजाही की अक्सर नीति-निर्माता खिल्ली उड़ाते रहते हैं, मानो यह उनके लिए चिंता की कोई बात ही नहीं है। कई अर्थशास्त्रियों की नजर में यह विशुद्ध रूप से दो अलग बाजारों के बीच खरीद-फरोख्त वाला मामला है। लेकिन यह भी तो हो सकता है कि कोई बिजली न पैदा करना चाहे या स्टील न बनाना चाहे या एयरलाइन का संचालन न करना चाहे। अगर बड़ी अर्थव्यवस्था में किसी क्षेत्र को उसकी अहम भूमिका को देखते हुए आर्थिक मदद एवं पैकेज देकर बचाने की नौबत आती है तो उसके लिए कृषि क्षेत्र से अधिक जरूरतमंद कोई नहीं है।
 
दूसरा पहलू, नीति-निर्माता यह सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं कि संपत्ति का स्वामित्व हमेशा के लिए बंद न हो जाए। संपत्ति पर स्वामित्व को गतिशील रखने का एक तरीका उत्तराधिकार कर है लेकिन भारत में इस कर का प्रावधान ही नहीं है। बड़ी-से-बड़ी पूंजीवादी व्यवस्थाओं में उत्तराधिकार कर की व्यवस्था होती है ताकि संपत्ति पर शिकंजे-जैसी पकड़ ढीली की जा सके। भारत में विरासत में मिलने वाली संपत्ति एक से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती रहती है और पूरी जिंदगी में कभी एक-दूसरे से न मिलने वाले लोग भी उसका उपभोग करते हैं।
 
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दूसरे कार्यकाल में उत्तराधिकार कर को लेकर थोड़ी सुगबुगाहट हुई थी लेकिन उसने भी हथियार डाल दिए और अपने अंतिम बजट में इस कर का प्रस्ताव रखने से अपने हाथ पीछे खींच लिए। उसके बाद संपत्ति स्वामित्व के पुनर्गठन की दिशा में तमाम प्रयास किए गए लेकिन ऐसा लगता है कि बाजार को मौजूदा सरकार के राजनीतिक संकल्प से अधिक भरोसा संप्रग सरकार में था। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को संप्रग से बेहतर होने की उम्मीद के चलते सत्ता मिली थी लेकिन इस सरकार ने अपने शुरुआती वर्षों में उद्योग जगत एवं धनवान लोगों को नाराज करने का कोई काम नहीं किया। नोटबंदी के बाद इस सरकार से समृद्ध लोगों को चोट पहुंचाने वाले कुछ सख्त कदम उठाने की अपेक्षा थी। लेकिन यह सरकार भी उत्तराधिकार कर के स्वरूप में कोई भी सुधार करने या उसी तरह की कोई नीति लाने से बचती रही है। इस मोर्चे पर कोई भी सुधार किए बगैर इस सरकार के पांच बजट निकल चुके हैं। इसके बजाय कॉर्पोरेट टैक्स को कम करना तमाम तरह की आर्थिक गतिविधियों को कॉर्पोरेट ढांचे की तरफ धकेलने की कवायद ही है। 
 
अगले कुछ महीनों में होने वाले चुनावों के चलते गहमागहमी जारी रहने से नीति के इन दो अलोकप्रिय पहलुओं को दफन कर दिए जाने के बारे में पुरजोर आवाज उठाई जाएगी। इस हंगामे के दौरान आगे की राह पर नजर दौड़ाना हमारे लिए उपयोगी होगा, न कि रेत में सिर घुसा लेना और अपनी समझ पर पर्दा डाल लेना।  
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
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