बिजनेस स्टैंडर्ड - नए साल में पुरानी गलतियों से निजात की उम्मीद
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नए साल में पुरानी गलतियों से निजात की उम्मीद

जैमिनी भगवती /  December 30, 2018

आरबीआई, सरकार और सार्वजनिक इकाइयों के पास रखे पैसे करदाताओं, बैंक जमाकर्ताओं और बीमाधारकों के हैं। इनके कारगर प्रबंधन की जरूरत बता रहे हैं जैमिनी भगवती

 
ब्रेकिंग न्यूज वाले मीडिया में खबरों का जीवनकाल करीब 48 घंटों का ही होता है। इस दौरान घटना के पीछे के कारण और उसके साथ जुड़ी गतिविधियों की प्राय: न तो पड़ताल की जाती है और न ही उन पर गौर किया जाता है। साल 2018 जब अंतिम दिन तक पहुंच चुका है तो हमें इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) के निदेशक मंडल को बर्खास्त करने के केंद्र सरकार के 30 सितंबर के कदम पर गौर करना चाहिए। इसी तरह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का 10 दिसंबर को दिया हुआ इस्तीफा भी अहम है। यह लेख पाठकों से अपेक्षा करता है कि वे इन मामलों में सरकार और नियामकों की तरफ से उठाए गए कदमों और चिंताजनक बिंदुओं के समाधान की कोशिशों पर अपना ध्यान बनाए रखें।
 
आईएलऐंडएफएस की तरलता एवं दिवालिया समस्याओं के बारे में आरबीआई या क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का सही अंदाजा नहीं लगा पाने के खास कारण अभी तक सार्वजनिक नहीं हैं। भारतीय बीमा निगम (एलआईसी), भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की आईएलऐंडएफएस में क्रमश: 25.3, 6.4 और 7.7 फीसदी हिस्सेदारी थी। इस तरह इस कंपनी में तीनों सार्वजनिक इकाइयों की सम्मिलित हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी थी। इस सार्वजनिक हिस्सेदारी ने ही इस 'विशाल एवं व्यवस्थागत रूप से अहम' गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) को लेकर लोगों के मन में एक तरह का सुरक्षा बोध पैदा किया। कंपनी के नए बोर्ड को आंतरिक एवं बाह्यï ऑडिटरों की भूमिका की भी जांच कराने की जरूरत है क्योंकि ऐसा लगता है कि इस समूह की सैकड़ों अनुषंगी इकाइयों ने अपने खातोंं में गड़बड़ी की। आईएलऐंडएफएस के कुल 91,000 करोड़ रुपये के कर्ज में से कितनी रकम को जानबूझकर या गलती से ट्रिपल-ए रेटिंग दी गई थी? भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को यह सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि वह रेटिंग एजेंसियों को उनकी रेटिंग के लिए भविष्य में किस तरह जवाबदेह बनाएगा?
 
एलआईसी और एसबीआई क्रमश: देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी और सबसे बड़े बैंक हैं। इन दोनों के चेयरमैन आईएलऐंडएफएस के उस बोर्ड में भी शामिल थे जिसे सरकार ने 30 सितंबर को भंग कर दिया। आईएलऐंडएफएस की हरेक इकाई का प्रबंधन अलग था और उनके बोर्ड भी अमूमन अलग थे। एलआईसी और एसबीआई के चेयरमैन के अलावा बीमा नियामक आईआरडीएआई और बैंकिंग नियामक आरबीआई को भी यह बताना चाहिए कि वे इस समूह के जोखिम भरे तरीके को लेकर बेखबर क्यों बने रहे? इस समूह के पिछले बोर्ड में शामिल सदस्यों ने शायद ही कभी इसके वरिष्ठ प्रबंधकों की बेहद आलीशान कार्यशैली और महंगी कारों को लेकर कोई सवाल उठाए थे। नए बोर्ड को यह भी बताना चाहिए कि पिछले दशकों में आईएलऐंडएफएस में अधिक जोखिम होते हुए भी एलआईसी और एसबीआई को अपने निवेश पर मिलने वाला रिटर्न जोखिम-मुक्त सरकारी प्रतिभूतियों की बराबरी कर पाता था? 
 
उच्चतम न्यायालय ने 15 दिसंबर, 2015 को यह निर्देश दिया था कि आरबीआई कुछ खास मामलों में कर्ज भुगतान नहीं करने वाले चूककर्ताओं के नाम मुख्य सूचना आयुक्त को बताए। आरबीआई के एक पूर्व गवर्नर ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से कहा है कि कर्ज का भुगतान नहीं करने वाले हाई-प्रोफाइल मामलों की सूची रिजर्व बैंक ने प्रधानमंत्री कार्यालय को दे दी थी। सवाल है कि आरबीआई ने वित्त मंत्रालय के बजाय प्रधानमंत्री कार्यालय को यह जानकारी देना क्या इसलिए जरूरी समझा कि ऊंची पहुंच रखने वाले प्रवर्तकों की कर्ज चूक के मामलों में सरकार के प्रमुख की अनुमति लेनी जरूरी है? बाजार भागीदारों और करदाताओं को यह जानने की जरूरत है कि आरबीआई गवर्नर के इस पत्र के बारे में क्या वित्त मंत्री के साथ या आरबीआई बोर्ड की बैठक में कोई चर्चा की गई और अगर हां तो उस पर क्या कदम उठाए गए? सरकार को इस पत्र का ब्योरा सार्वजनिक करना चाहिए और आरबीआई से भी यह पूछा जाना चाहिए कि उसने सूचना आयोग को चूककर्ताओं के नाम सौंपने के तीन साल पुराने आदेश पर अब तक अमल क्यों नहीं किया है?
 
आरबीआई के त्वरित उपचारात्मक उपाय (पीसीए) संबंधी मानक होने से समुचित जोखिम पूंजी नहीं होने तक 11 सार्वजनिक बैंकों को कर्ज देने से रोक दिया गया है। आरबीआई ने फरवरी 2018 के अपने परिपत्र में बैंकों को यह निर्देश दिया था कि वे अंतरराष्ट्रीय परंपरा के अनुरूप एक दिन के भीतर कर्ज चूक की पहचान करें। भ्रमित करने वाली मीडिया रिपोर्ट के उलट आरबीआई बैंकों से यह नहीं अपेक्षा करता है कि वे भुगतान में चूक को एक दिन के भीतर एनपीए के साथ जोड़ दें। इस बेहद जरूरी परिपत्र के मुताबिक एनपीए मामलों को राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) के सुपुर्द करने की 180 दिनों की मियाद भुगतान में चूक के दिन से ही शुरू होती है। हालांकि आरबीआई ने कर्ज चूक और इरादतन चूक के बीच फर्क नहीं किया है। क्या यह सार्वजनिक बैंकों में जोखिम के आकलन की क्षमता न होने के कारण हुआ या यह दोस्ताना पूंजीवाद का नतीजा था? साफ है कि अनुमानित नकदी प्रवाह में गिरावट आई क्योंकि पर्यावरणीय एवं भूमि अधिग्रहण संबंधी मंजूरी न होने से कई परियोजनाएं लटक गईं और इस दौरान कच्चे माल की कीमतें भी काफी बढ़ गईं। कुछ मामलों में अनुबंध संबंधी बाध्यताओं के चलते तैयार उत्पाद की कीमत लागत मूल्य से कम हो गई। खासकर बिजली उत्पादन के क्षेत्र में ऐसा देखा गया।
 
ऐसी उम्मीद थी कि ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) लागू होने और एनसीएलटी पंचाटों के गठन के बाद औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर) के चलते होने वाली देरी अतीत की बात हो जाएगी। लेकिन एनसीएलटी पंचाटों में छोटे-बड़े मामलों की भरमार है। एनसीएलटी के कुछ पंचाटों को केवल 20,000 करोड़ रुपये से ऊपर के मामलों के निपटारे के लिए अधिकृत करने से कुछ समाधान हो सकता है। आरबीआई के पीसीए मानकों और फरवरी के परिपत्र को अगर किसी तरह नरम किया जाता है तो वह एक उपहास ही होगा।
 
आरबीआई, सरकार और सार्वजनिक इकाइयों के पास रखा पैसा आम करदाताओं, बैंक में पैसे जमा करने वालों और बीमा धारकों के हैं। ऐसे में आरबीआई के पास आरक्षित रखे हुए धन की मात्रा को लेकर जारी पूरा विवाद निरर्थक है क्योंकि अंतिम विश्लेषण में तो इन सभी का एक साझा बैलेंस शीट ही है। महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि सार्वजनिक बैंकों को समर्थन देकर सरकार उन्हीं लोगों को प्रोत्साहित कर रही है जो अपने पास आए फंड को अपने और अपने राजनीतिक आकाओं के सुपुर्द करने में लगे रहते हैं। अमेरिकी फेडरल रिडर्व के पूर्व चेयरमैन पॉल वॉकर की लिखी किताब 'कीपिंग ऐट इट: द क्वेस्ट फॉर साउंड मनी ऐंड गुड गवमेंट' में केंद्रीय बैंक के कामकाज के ठोस तरीकों और जवाबदेह शासन का ब्योरा दिया गया है। वॉकर अपनी इस किताब में कहते हैं कि केंद्रीय बैंकिंग असल में चरित्र की मजबूती से जुड़ी है। क्या भारत सरकार और आरबीआई के लिए यह दूर की कौड़ी है? उम्मीद है कि वर्ष 2019 में ये दोनों ही नई ऊंचाई छुएंगे।
 
(लेखक भारत सरकार एवं विश्व बैंक के पूर्व अधिकारी हैं)
Keyword: bank, loan, debt, RBI, NPA,,
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