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कर्ज माफी की राजनीति

संपादकीय /  December 30, 2018

अगले कुछ महीनों में होने वाले लोकसभा चुनावों के पहले किसानों का कर्ज माफ करने के लिए राज्य सरकारों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सभी राज्यों में कृषि ऋण माफ नहीं होने तक प्रधानमंत्री को चैन से सोने नहीं देने वाला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। वैसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी अधिक पीछे नहीं है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस समाचारपत्र को गत सप्ताह दिए एक साक्षात्कार में यह कहा है कि कृषि ऋण माफी का बोझ उठा सकने वाले राज्यों को इस दिशा में आगे बढऩा चाहिए। इसे लोगों को खुश करने वाला बयान ही माना जा सकता है। 

 
कर्ज माफी के ऐसे कदम कृषि ऋण शृंखला में ऊपर से नीचे तक हलचल पैदा करेंगे। इससे किसानों को भी दीर्घावधि का कोई लाभ नहीं होता है।  इसके कुछ परिणाम तो दिखने शुरू भी हो गए हैं। मसलन, कृषि एïवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने राज्यों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि कर्ज माफी के बाद उसका बोझ अकेले बैंक पर ही न पड़े। नाबार्ड ने यह चेतावनी दी है कि कर्ज माफी के बाद बैंकों को उनकी बकाया राशि फौरन नहीं मिलने पर ऋण आवंटन की समूची प्रक्रिया प्रभावित होगी। समस्या यह है कि कुछ राज्यों में बैंकों ने कर्ज माफी की अधिसूचना के आधार पर अपने बकाया कर्ज को बट्टïे खाते में डाल दिया लेकिन राज्यों ने अब तक उनके बकाये का भुगतान नहीं किया है। इससे बैंक दबाव में आएंगे और कृषि क्षेत्र को कर्ज देना कम कर देंगे। 
 
यह सही है कि बैंकों को राजनीतिक मकसद से की गई कर्ज माफी का बोझ नहीं उठाना चाहिए। ऐसा करना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि यह कृषि ऋण आवंटन में कमी का भी कारण बनेगा जिससे ग्रामीण क्षेत्र का तनाव और बढ़ेगा। लेकिन राज्यों को कर्ज माफी के पहले अपनी राजकोषीय स्थिति का सावधानी से विश्लेषण करना होगा क्योंकि बैंकों की बकाया राशि का भुगतान उन्हें ही करना होगा। इससे राज्य के वित्त पर गहरा दबाव पड़ेगा। तीन हिंदीभाषी राज्यों में जीत के बाद बनी कांग्रेस सरकारों ने किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया हुआ है। मध्य प्रदेश सरकार ने करीब 350 अरब रुपये का कर्ज माफ करने का वादा किया है जबकि राजस्थान सरकार 200 अरब रुपये का कर्ज माफ करेगी। राजस्थान का कर्ज माफी का आकार तो उसके पूंजीगत व्यय से थोड़ा ही कम है। ऐसा होने पर कर्ज माफ करने वाले राज्यों में पूंजीगत व्यय में बड़ी कटौती होगी। समग्र वृहद-आर्थिक स्थिरता एवं वृद्धि की रफ्तार पर इसका गहरा असर दिखेगा। हमें ध्यान रखना होगा कि 14वें वित्त आयोग के बाद केंद्र का पूंजीगत व्यय सभी राज्यों के कुल पूंजीगत व्यय से आकार में कम हो चुका है। 
 
वित्त आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद राज्य सरकारों का पूंजीगत व्यय तेजी से बढ़ा है। गत वित्त वर्ष के संशोधित अनुमानों की तुलना में चालू वित्त वर्ष का पूंजी व्यय 37.5 फीसदी अधिक रहने का अनुमान है। इस तरह किसानों का कर्ज माफी का वादा करने वाली राज्य सरकारों के सामने एक मुश्किल विकल्प है। उन्हें या तो बैंकों को फंड के लिए तड़पता छोडऩा पड़ेगा या पूंजीगत व्यय में कटौती करनी पड़ेगी या राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बदलना होगा। इनमें से कोई भी विकल्प स्वीकार्य नहीं है और राज्य सरकारों के घाटे की सीमा भी तय है। कर्ज माफी कर सकने वाले राज्यों के लिए भी ऐसी योजना अरुचिकर राजकोषीय गुणा-भाग का सबब बनेगी और उसका नतीजा किसानों समेत सभी हितधारकों के लिए बुरा होगा। 
Keyword: agri, farmer, crop, loan, BJP, congress,,
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