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बॉन्ड के लिए अच्छा और रुपये के लिए मिलाजुला

अनूप राय /  December 30, 2018

इस साल की तरह वर्ष 2019 भी रुपये के लिए उतार-चढ़ाव भरा रह सकता है। लेकिन बॉन्ड बाजार को राहत की सांस मिल सकती है क्योंकि ऐसा लगता है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस बाजार की तरलता और दरों में कटौती के मोर्चे पर मदद करना चाहता है। बाजार पहले ही फरवरी में दर में कटौती की उम्मीद कर रहा है और आगामी समय में और कटौती की जा सकती है। केंद्रीय बैंक पहले ही बाजार के लिए तरलता बढ़ाने की प्रतिबद्धता जता चुका है। आरबीआई ने दिसंबर में खुले बाजार की क्रियाओं (ओएमओ) में 100 अरब रुपये की बढ़ोतरी की बात कही है। आरबीआई ओएमओ के तहत बाजार से बॉन्डों की खरीद करता है। इसने जनवरी में 500 अरब रुपये के बॉन्ड खरीदने की योजना बनाई है। आरबीआई ने कहा है कि उसकी मदद कम से कम मार्च तक जारी रहेगी। 

 
इस तरह वित्त वर्ष 2018-19 के लिए तरलता सहायता करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये होगी। यह बड़ा प्रोत्साहन होगा, जिससे आर्थिक तंत्र सरप्लस की स्थिति में आ जाएगा। पहले 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी थी। इस कदम से निश्चित रूप से बॉन्डों को मदद मिलेगी और प्रतिफल घटकर 7.10 फीसदी पर आ सकता है, जो इस समय 7.3 फीसदी है। फस्र्ट रैंड बैंक के कोष प्रमुख हरिहर कृष्णमूर्ति ने कहा, 'महंगाई का स्तर आरबीआई की तय सीमा से काफी नीचे है। तेल और खाद्य कीमतें काफी नीचे हैं, इसलिए प्रतिफल निचले स्तरों पर बना रहेगा।' कृष्णमूर्ति ने कहा, '10 साल के बॉन्डों का प्रतिफल एक साल के बॉन्डों की तुलना में कम गिरने के आसार हैं। बाजार को फरवरी या अप्रैल में दर में कटौती की उम्मीद है, जिससे रुझान सकारात्मक बना रहेगा। अगर अमेरिका में कमजोर प्रतिफल के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की खरीद मांग फिर से आती है तो यह एक अन्य सकारात्मक कारक साबित होगा।' उन्होंने कहा कि बाजार की आम चुनावों के बाद बजट के गणित पर नजर रहेगी, जो आगे प्रतिफल को तय करेगा। 
 
हालांकि अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और जापान जैसे प्रमुख केंद्रीय बैंक अपनी बैलेंस शीट को सामान्य स्तर पर ला रहे हैं। इससे तरलता बाहर निकलेगी और वैश्विक प्रतिफल में इजाफा होगा। इससे भारतीय प्रतिफल निश्चित रूप से प्रभावित होंगे।  रुपया वर्ष 2018 में 8.7 फीसदी कमजोर हुआ है। रुपये के लिए 2019 मुश्किल वर्ष साबित हो सकता है क्योंकि भूराजनीतिक अनिश्चितताएं अब भी बरकरार हैं। डॉलर में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राएं प्रभावित होंगी। स्थानीय स्तर पर शेयरों में निवेश का विनिमय दरों पर सीधा असर पड़ेगा। 
 
आईएफए ग्लोबल के प्रबंध निदेशक और सीईओ अभिषेक गोयनका ने कहा, 'हमारा अनुमान है कि रुपया 69 से 76 डॉलर के बीच रहेगा, जिसमें गिरावट का रुझान रहेगा। हमें भारतीय बाजारों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है क्योंकि अमूमन भारतीय बाजार अमेरिका में गिरावट के कुछ समय बाद प्रतिक्रिया दिखाते हैं। इसके अलावा वैश्विक तनाव, कमजोर शेयरों और वृद्धि में गिरावट के कारण जोखिम से बचने की धारणा प्रबल हो सकती है।'  वैश्विक स्तर पर व्यापार युद्ध खत्म नहीं हुए हैं और आगे मुद्रा युद्ध भी शुरू होने की आशंंका है। अगर विनिमय दर पर लगातार दबाव बना रहा तो आरबीआई को अपनी नीतिगत दरें बढ़ाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। क्वांटआर्ट मार्केट्स सॉल्यूशन के प्रबंध निदेशक समीर लोढा ने कहा, 'रुपये में गिरावट कई वजहों से आएगी, जिसमें वैश्विक मंदी एवं वित्तीय बाजारों में दबाव, व्यापार युद्ध एवं चीनी मुद्रा में गिरावट, उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत से एफपीआई की निकासी और यूरोपीय संघ और अमेरिका के नीतियों को सामान्य स्तर पर लाना आदि शामिल हैं।'
 
लोढा ने कहा, 'भारतीय बाजार की किसी बाहरी झटके को झेलने की क्षमता कमजोर बनी हुई है। इसकी वजह कमजोर बैंकिंग क्षेत्र, कंपनियों की बैलेंस शीट बिगडऩा, राजनीतिक अनिश्चितता और कंपनियों की लागत में बढ़ोतरी आदि हैं।' उन्होंने कहा कि इन कारकों की वजह से 2019 में रुपया 78 प्रति डॉलर के नए निचले स्तर पर पहुंच सकता है। 
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