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उच्चतम न्यायालय का राफेल सौदे की जांच से इनकार

अदालत से
एम जे एंटनी /  December 30, 2018

उच्चतम न्यायालय ने इस साल के अपने अंतिम कार्यदिवस पर एक विवादास्पद फैसला दिया है। न्यायालय ने याचिकाओं के एक समूह को खारिज करते हुए 36 राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे की जांच कराने से इनकार कर दिया। यह सौदा 58,000 करोड़ रुपये का है। उसने कहा कि निर्णय प्रक्रिया और लड़ाकू विमानों की जरूरत पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। अदालत के फैसले में कहा गया है कि कीमतों की तुलना करना न्यायालय का काम नहीं है। हालांकि यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ है। सरकार ने फिर से अदालत में जाकर कहा है कि फैसले में कुछ गलतियां हैं। वहीं विपक्ष ने इसमें कई विरोधाभास बताए हैं। 

 
आधार की वैधता बरकरार 
 
उच्चतम न्यायालय ने आधार कार्ड की वैधता बरकरार रखी है। लेकिन इसके साथ ही यह भी कहा है कि निजी कंपनियां अपने ग्राहकों को आधार मुहैया कराने के लिए बाध्य नहीं कर सकती हैं। यह बैंक खाता खोलने, मोबाइल फोन कनेक्शन लेने और अन्य सुविधाओं के लिए अनिवार्य नहीं होगा। न्यायालय ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि इस योजना से भारत नागरिकों पर नजर रखने वाला देश बन गया है। अदालत ने आधार कानून को धन विधेयक के रूप में पारित करने को भी मंजूरी दे दी। हालांकि फैसले में कहा गया है कि निजता का अधिकार हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है। 
 
खास है उपभोक्ता कानून 
 
उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले को बरकरार रखा है। न्यायालय ने कहा है कि वस्तु एवं सेवाओं की बिक्री के करार में मध्यस्थता का प्रावधान होने के बावजूद उपभोक्ता शिकायत को मध्यस्थता के लिए नहीं भेजा जा सकता। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम एक विशेष कानून है। यह समाज की भलाई के लिए है और इसे सामान्य कानून से अधिक अहमियत दी जानी चाहिए। 
 
खनन पट्टों का मामला
 
उच्चतम न्यायालय ने सेसा स्टरलाइट के खिलाफ गोवा फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए गोवा सरकार द्वारा मंजूर खनन पट्टों के नवीनीकरण को रद्द कर दिया है। इस फैसले में कहा गया, 'यह नवीनीकरण अनावश्यक हड़बड़ी' में किया गया, जिसमें सभी प्रासंगिक पहलुओं को ध्यान में नहीं रखा गया। इसमें उपलब्ध प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी की गई, इसलिए यह खनिज विकास के हित में नहीं है। यह फैसला केवल राज्य के राजस्व को बढ़ाने के लिए लिया गया।' 
 
संचार कंपनियों पर आरोप 
 
उच्चतम न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय के खिलाफ भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की याचिका खारिज कर दी है। बंबई उच्च न्यायालय ने भारती एयरटेल, वोडाफोन इंडिया और आइडिया सेल्यूलर के गुटबंदी करने के आरोप खारिज कर दिए थे। इन कंपनियों के खिलाफ जांच का आदेश सीसीआई ने 2017 में दिया था। सीसीआई को रिलायंस जियो इन्फोकॉम से यह शिकायत मिली थी कि उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने गुटबंदी कर ली है और वे उसे इंटरकनेक्शन के पर्याप्त पॉइंट मुहैया नहीं करा रही हैं। 
 
विदेशी ट्रेडमार्क बताए सबूत 
 
अगर कोई विदेशी कंपनी किसी भारतीय कंपनी पर यह मुकदमा दायर करती है कि उस भारतीय कंपनी ने घरेलू बाजार में सामान की बिक्री कर उसके ट्रेडमार्क का उल्लंघन किया है तो विदेशी कंपनी को यह साबित करना होगा कि उसकी यहां पर्याप्त पहचान, प्रतिष्ठा और बाजार है। यह 'संप्रभु राष्ट्र का नियम' दुनियाभर में स्वीकार किया जाता है और उच्चतम न्यायालय ने भी टोयोटा जिडोशा बनाम प्रियस ऑटो इंडस्ट्रीज लिमिटेड मामले में अपने फैसले में अपनाया है। 
 
मध्यस्थ की स्वतंत्रता 
 
हाल में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम में संशोधन किए जाने के बावजूद मध्यस्थों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को अदालतों में चुनौती दी जा रही है। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने एसपी सिंगला कंस्ट्रक्शंस लिमिटेड बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले में फैसला दिया है, 'मध्यस्थ के किसी एक पक्ष का कर्मचारी होना उसके पक्षपाती और स्वतंत्र न होने का अनुमान जाहिर करने का आधार नहीं हो सकता।' सरकारी अनुबंधों में मध्यस्थता समझौतों में कहा गया है कि काम या अनुबंध से नहीं जुड़ा विभाग का कर्मचारी या उच्च अधिकारी मध्यस्थ बन सकते हैं। वे न अनधिकृत हैं और न ही बाध्यकारी हैं। एक अन्य फैसले में न्यायालय ने कहा कि किसी मध्यस्थता समझौते का लिखित या हस्ताक्षरित होना आवश्यक नहीं है। 
 
रियल्टरों पर अदालती चाबुक 
 
यह साल रियल एस्टेट कंपनियों के लिए मुश्किलों भरा रहा है क्योंकि उनके बहुत से शीर्ष कार्याधिकारियों को आवासीय फ्लैटों के ग्राहकों के साथ करारों के उल्लंघन के लिए जेल भेजा गया। एक अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र आवास प्राधिकरण की तरफ से सहकारी आवास समितियों को किए गए सभी आवंटनों को रद्द कर दिया क्योंकि ये 'अतार्किक और स्वैच्छिक' थे। अदालत ने रियल एस्टेट नियमन अधिनियम से जुड़े एक अन्य मामले में कहा कि अगर कोई व्यक्ति विकास योजना का ब्योरा मंजूरी देने वाले प्राधिकरण से मांगता है तो यह मुहैया कराया जाना चाहिए। प्राधिकरण व्यावसायिक भरोसे, कारोबारी गोपनीयता या बौद्धिक संपदा अधिकारों की वजह से ये ब्योरे देने से इनकार नहीं कर सकता। यहां तक कि एक प्रतिस्पर्धी कारोबारी कंपनी आरटीआई के तहत विकास योजना के ब्योरे हासिल कर सकती है। 
 
बैंक गारंटरों पर कार्रवाई
 
उच्चतम न्यायालय ने ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता पर अपने एक अहम फैसले में कहा है कि बैंक गारंटरों के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, भले ही इस कानून की प्रक्रिया जारी हो। एनसीएलएटी के फैसले को अलग रखते हुए इस फैसले में कहा गया कि जहां तक व्यक्तिगत गारंटर का सवाल है, उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। 
 
दशकों से दिहाड़ी मजदूर 
 
कामगारों को श्रम कानून के लाभ न देने के लिए उन्हें दशकों तक दैनिक पारिश्रमिक पर रखना निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों में आम हो गया है। उच्चतम न्यायालय ने कई याचिकाओं में इस तरीके पर नाराजगी जताई है। ऐसे ही एक मामले में न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई। इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार ने एक कर्मचारी को 2,776 रुपये प्रति माह के वेतन पर 22 साल तक दिहाड़ी कामगार बनाए रखा और अंतिम तीन वर्षों में नियमित करने के बाद ग्रैच्युटी देने से इनकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने सरकार के रुख को सही ठहराया था। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले- नेतराम साहू बनाम राज्य में कहा, 'यह राज्य का कर्तव्य है कि वह स्वैच्छिक रूप से ग्रैच्युटी का भुगतान करे, न कि कर्मचारी को अपना वाजिब हक हासिल करने के लिए उच्चतम न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य करे।' यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसे इस अदालत तक की प्रक्रिया के हर चरण में वाजिब हक को देने से इनकार किया गया और उसे तीन वर्षों तक बेकार की मुकदमेबाजी में घसीटा गया। 
Keyword: supreme court, high court,,
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