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चुनाव और दबाव

अर्चिस मोहन /  December 28, 2018

चुनावी मोर्चे पर वर्ष 2018 भारतीय जनता पार्टी (2018) के लिए नाकामी लेकर आया। पूर्वोत्तर की दुर्लभ सफलता को छोड़ दिया जाए तो अमित शाह की अगुआई वाली इस पार्टी के लिए इस साल कुछ भी अच्छा नहीं रहा। इसकी तुलना केवल 2015 से ही की जा सकती है। वर्ष 2014 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सफलता के बाद 2015 में पार्टी को दिल्ली और बिहार में करारी हार का सामना करना पड़ा। इन दो राज्यों में शिकस्त के कारण पार्टी ने सुधारों को ठंडे बस्ते में डालकर गरीब कल्याण का रास्ता पकड़ लिया था। 2018 जाते-जाते पार्टी को यह याद दिला गया कि मोदी सरकार की गरीब कल्याण की रणनीति खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के प्रभावों से पार पाने में नाकाम रही। 

 
हाल में हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर भारत में कांग्रेस फिर से मजबूत बनकर उभरी है और शाह का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना चकनाचूर हो गया है। कांग्रेस की अब राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सरकारें हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पार्टी 2003 के बाद पहली बार सत्ता में आई है। 2014 में भाजपा ने इन राज्यों में लोकसभा की 65 में से 62 सीटों पर कब्जा किया था। 2018 की तुलना में 2017 भाजपा के लिए अच्छा रहा था। तब पार्टी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में प्रचंड बहुमत हासिल किया था और मणिपुर तथा गोवा में सबसे बड़ी पार्टी बनने में नाकाम रहने के बावजूद सरकारें बनाई थीं। 
 
बिहार में पार्टी को 2015 में हार का सामना करना पड़ा लेकिन 2017 में उसने वहां नीतीश कुमार के साथ मिलकर सरकार बना ली। भाजपा का विजय रथ लगातार आगे बढ़ रहा था लेकिन एक फरवरी को चुनाव आयोग ने राजस्थान में अजमेर और अलवर में हुए लोकसभा उपचुनावों के परिणामों की घोषणा की। इसमें करारी पराजय ने भाजपा को सकते में डाल दिया। लेकिन पार्टी की यह निराशा जल्दी ही दूर हो गई। तीन मार्च को भाजपा ने त्रिपुरा में वाम मोर्चे के 25 साल के शासन को खत्म कर दिया। मेघालय और नगालैंड में भी पार्टी गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी। लेकिन त्रिपुरा की जीत पार्टी के लिए खास रही क्योंकि यह वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ मिली थी। लेकिन इस जीत की खुशी एक पखवाड़े भी नहीं टिक पाई। पार्टी को गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में शिकस्त झेलनी पड़ी। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में जबरदस्त प्रदर्शन के ठीक एक साल बाद पार्टी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य द्वारा खाली की गई सीटें गंवा दी। इसके कुछ महीने बाद पार्टी को उत्तर प्रदेश के कैराना में भी शिकस्त का सामना करना पड़ा।
 
कर्नाटक विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री ने जमकर प्रचार किया। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन गोवा और मणिपुर से सबक सीखते हुए कांग्रेस ने जनता दल (सेकुलर) को मुख्यमंत्री पद की पेशकश कर सरकार बना ली।  लोकसभा चुनावों में अब चार महीने से भी कम समय रह गया है और 2018 में खासकर उत्तर भारतीय राज्यों में मिली शिकस्त से भाजपा में चिंता व्याप्त है। इन राज्यों में मिली सफलता के दम पर ही पार्टी को पहली बार आम चुनावों में पूर्ण बहुमत मिला था। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि पार्टी आगामी आम चुनावों में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पूर्वोत्तर राज्यों और तेलंगाना से इस नुकसान की भरपाई कर लेगी। उनका मानना है कि विपक्ष के पास कोई विश्वसनीय नेता नहीं है और मोदी लहर के दम पर पार्टी एक बार फिर सत्ता में वापसी कर सकती है। 
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