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मेघालय में अवैध खनन से मिलती राजनीति को शक्ति

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  December 28, 2018

मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने कहा है कि अपने राज्य में अवैध खनन गतिविधियां जारी रहने की जानकारी उन्हें हमेशा रही है। उनका कहना है कि मेघालय में बनी 'चूहे के बिल' जैसी कई खदानों में से एक में फंसे खनिकों को बाहर निकालने के लिए सबकुछ किया जा रहा है लेकिन यह किसी की गलती नहीं है, हालात ही काफी मुश्किल हैं। यह बयान किसी को भी हतप्रभ करने के लिए काफी है। आखिर एक मुख्यमंत्री अपनी जिम्मेदारी से पल्ला कैसे झाड़ सकता है? यह अपनी नाक के नीचे जानकारी में होते हुए भी अवैध काम जारी रहने का ही सवाल नहीं है बल्कि एक खदान में फंसे मजदूरों की जिंदगी दांव पर लगे होने की बात भी है। 

 
लेकिन एक साधारण राज्य होते हुए भी मेघालय में राजनीति के ऊंचे दांव लगे हुए हैं। दिल्ली स्थित संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स के एक शोध से पता चला है कि 2018 की शुरुआत में हुए विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने वाले कुल 370 उम्मीदवारों में से केवल चार फीसदी लोगों ने ही आयकर रिटर्न भरा था जबकि 41 फीसदी उम्मीदवारों ने एक करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति होने का दावा किया था। वर्ष 2013 के पिछले चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार रहे एन्गैतलेंग धर ने 25 करोड़ रुपये की संपत्ति होने का जिक्र किया था। इस साल के चुनाव में वह नैशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के टिकट पर चुनाव लड़े और उनकी संपत्ति बढ़कर 72 करोड़ रुपये हो चुकी है। 
 
संभवत: मेघालय में जारी अवैध खनन नेताओं की इस आय का एक बड़ा स्रोत है। गैरकानूनी गतिविधि होने से इस पर किसी तरह का कर नहीं देना होता है और न ही किसी तरह की अनुमति की जरूरत होती है। हालत यह है कि राज्य में खुलेआम जारी अवैध खनन में बड़ी संख्या में लोग शामिल हैं। शायद इसी वजह से रसूख का बड़ा जरिया माने जाने वाली राजनीति को इस राज्य में बेहद आकर्षक पेशे के तौर पर देखा जाता है। लेकिन मेघालय की राजनीति में कमाई के अलावा और क्या है? खासी एवं गारो जनजातियों के बीच मुख्य प्रतिद्वंद्विता है और लुशाई पहाडिय़ों से आने वाले उनकी राह में आ जाते हैं। खासी जनजाति का प्रतिनिधित्व अब संन्यास ले चुके डी डी लपांग करते हैं जबकि गारो जनजाति का प्रतिनिधित्व संगमा खानदान करता रहा है। जहां तक लुशाई समुदाय का सवाल है तो इसका चेहरा रहे पी आर किन्दिया का 2015 में निधन हो चुका है।
 
मेघालय की राजनीति इन तीनों इलाकों के बीच के तनाव से ही तय होती है। मेघालय के सबसे मशहूर नेता पूर्णो संगमा थे जो लोकसभा के अध्यक्ष भी रहे। कांग्रेस में लंबे समय तक रहे संगमा ने बाद में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का दामन थाम लिया था। हालांकि वर्ष 2012 में कुछ दोस्तों और सियासी दुश्मनों ने पूर्णो संगमा को देश के राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे के लिए उकसा दिया। उस समय राकांपा केंद्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का हिस्सा थी और उसने राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन करने की घोषणा कर दी। ऐसे में न सिर्फ संगमा को राकांपा से अलग होना पड़ा बल्कि संप्रग सरकार में मंत्री रहीं उनकी बेटी अगाथा संगमा को भी इस्तीफा देना पड़ा। अगाथा ने वर्ष 2004 में पिता की खाली की हुई सीट से पहली बार चुनाव लड़कर जीत दर्ज की थी। उन्हें मनमोहन सिंह की सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री भी बनाया गया था। बहरहाल राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी के हाथों परास्त होने के बाद संगमा ने नैशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) नाम से एक अलग पार्टी बनाई।
 
वर्ष 2016 में अपने निधन के पहले पूर्णो संगमा ने अपने दोनों बेटों- कोनराड और जेम्स को भी राजनीति में उतार दिया था। संगमा परिवार के सदस्यों ने 2008 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद गठित 60 सदस्यीय विधानसभा की पांच फीसदी सीटें जीती थीं। इनमें से कोनराड संगमा को अपने इलाके में एक मशहूर पिता के मधुर-भाषी एवं महत्त्वाकांक्षी बेटे के तौर पर देखा जाता था। मेघालय विधानसभा के लिए 2018 के चुनाव में एनपीपी ने 60 में से 19 सीटें जीतीं। कोनराड संगमा ने भाजपा के दो विधायकों के अलावा कुछ अन्य छोटे दलों के समर्थन से एक गठबंधन बनाया और राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। एनपीपी अब सत्ता में है लेकिन मेघालय में दलीय निष्ठा क्षणभंगुर है और पाला बदलने में अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ती है।
 
तो, अब क्या होगा? क्या गठबंधन में छोटे भागीदार के तौर पर शामिल भाजपा निर्दोष लोगों को मौत की तरफ भेजने में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करती है? क्या केंद्र सरकार कोनराड संगमा को अवैध खनन पर सख्ती बरतने के लिए दबाव डालेगी? अगर मुख्यमंत्री इस सलाह को नजरअंदाज कर देते हैं और अपने गठबंधन सहयोगियों को बदल देते हैं तो क्या होगा? फिर पूर्वोत्तर में पांव जमाने की भाजपा की वृहत्तर परियोजना का क्या होगा? फिलहाल सत्ता का बारीक खेल जारी है। कोनराड संगमा ने यह जताने की कोशिश की है कि खनन हादसे के बारे में केंद्र से संपर्क साधे रखा है। उन्होंने केंद्र में गृह राज्य मंत्री और पूर्वोत्तर से ताल्लुक रखने वाले किरन रिजिजू से मदद मांगने की बात भी कही है। यानी, एक तरह से दोषारोपण का दौर शुरू हो चुका है। 
 
उम्मीद यही है कि फिलहाल भाजपा धैर्य दिखाएगी क्योंकि पिछले दिनों में उसके कई गठबंधन भागीदार असहज हुए हैं। वैसे मौजूदा संकट को खत्म होते हुए देखना सभी के राजनीतिक हित में है। जहां तक अवैध खनन की संरचनात्मक समस्या का मुद्दा है तो निस्संदेह इस पर बाद में गौर होगा।
Keyword: meghalaya, mining, CM,,
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