बिजनेस स्टैंडर्ड - रिसती बाल्टी में पानी डालने की क्या तुक?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, January 18, 2019 10:15 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

रिसती बाल्टी में पानी डालने की क्या तुक?

देवाशिष बसु /  December 28, 2018

सरकार का सार्वजनिक बैंकों में नई पूंजी डालने का फैसला वित्तीय अनुशासन के पैमाने पर सटीक नहीं बैठता है। इस कदम के गुण-दोष पर विचार कर रहे हैं देवाशिष बसु

 
कांग्रेस की अगुआई वाली पिछली सरकार से विरासत में मिली अधिकांश समस्याओं की तरह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की समस्या से निपटने के लिए भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने एक त्वरित उपाय करने की कोशिश की है। बीमार सार्वजनिक बैंकों में इस वित्त वर्ष में 410 अरब रुपये की नई पूंजी डालने का वित्त मंत्रालय का फैसला पुराने चलताऊ रवैये का ही हिस्सा है। वित्त मंत्री का कहना है कि इस कदम से पांच सार्वजनिक बैंकों को रिजर्व बैंक के त्वरित उपचारात्मक उपाय (पीसीए) मानकों के दायरे से बाहर लाया जा सकेगा। पीसीए प्रावधानों से इन बैंकों की कर्ज देने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है और कई क्षेत्रों को दिए जाने वाले ऋण में उन्हें कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। 
 
वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक, 'गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की शिनाख्त की 2015 में शुरू हुई प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है।' वहीं वित्तीय सेवा सचिव राजीव कुमार दावा करते हैं कि 'एनपीए के चिह्नïीकरण, वित्तीय प्रावधान, वसूली और सुधारों में सार्वजनिक बैंकों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। ऐसे में  उन्हें सशक्त करने और पूंजी से लैस करने का समय आ गया है ताकि वे सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की वृद्धि में सहयोग दे सकें।' सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक बैंकों में नई पूंजी डालने से हालात बदल जाएंगे? बीते दशकों में सार्वजनिक बैंकों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो वे चार समस्याओं से घिरे हुए दिखाई देते हैं:
 
कारोबारी बैंकों से कर्ज लेने के लिए राजनीतिक संपर्क का इस्तेमाल करते हैं और वह कर्ज फंस जाता है।
 
सरकार अपनी पसंदीदा योजनाओं के संचालन के लिए इन बैंकों का इस्तेमाल करती है जिससे उनके संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। कर्ज मेलों के दौरान प्रवर्तनीय प्रावधानों के बगैर ही कर्ज दे दिए जाते हैं।
 
कई सार्वजनिक बैंकों के प्रमुखों का पद रिक्त रहता है। किसी भी वक्त 8-10 बैंक ऐसे होते हैं जिनके चेयरमैन एवं कार्यकारी निदेशकों की नियुक्ति नहीं होती है। सरकार भी समान रूप से दोषी है। प्रधानमंत्री के दो ज्ञान संगम सम्मेलनों की अध्यक्षता करने के बावजूद ऐसा है। बैंक प्रमुखों के नाम सुझाने के लिए गठित बैंक बोर्ड ब्यूरो भी निष्प्रभावी ही साबित हुआ है। 
 
पुरस्कार एवं दंड की कोई अंतर्निहित व्यवस्था नहीं है। असल में, बड़े पैमाने पर कर्ज फंसाने वाले चेयरमैन को भी सरकार एवं निजी क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया जाता रहा है।
 
ध्यान रखें कि यह सरकार सार्वजनिक बैंकों को तबाह करने वाली इन बीमारियों को दूर करने की कोई चर्चा नहीं कर रही है। सारी चर्चा पीसीसीए के दायरे से बाहर रखे जाने पर केंद्रित है ताकि वे फिर से कर्ज देना शुरू कर सकें। इकलौती तवज्जो इस पर रहती है कि बढ़ी हुई पूंजी बैंकों की बैलेंस शीट को किस तरह दुरुस्त करेगी और पूंजी के बरक्स एनपीए का अनुपात कम हो जिसे एक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा सके। अतीत की तमाम सरकारों ने यही काम किया है और 70 वर्षों के कुशासन का जिक्र करने वाली यह राष्ट्रवादी बयान वाली सरकार भी इससे अलग नहीं है। 
 
वर्ष 2008-09 से लेकर 2016-17 के बीच विभिन्न सरकारों ने करदाताओं से इकट्ठा करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों में लगाए। यह विशुद्ध खैरात थी। इस राशि को किसी भी प्रदर्शन सुधार से नहीं जोड़ा गया था जबकि ऐसा करना निहायत ही लाजिमी था। ऐसा क्यों नहीं किया गया? इसकी वजह यही है कि सभी नेता अपने मतलब के लिए सार्वजनिक बैंकों का दुरुपयोग करते हैं। नेताओं की नीतियों में लोकलुभावन विचारों और दोस्ताना पूंजीवाद के जहरीला मेल होता है। कर्ज माफी और कर्ज वितरण मेलों का आयोजन लोकलुभावन कदम है जबकि बड़े कारोबारी उद्यमों को संदिग्ध होते हुए भी भारी कर्ज देने के लिए बैंकों को निर्देश देना दोस्ताना पूंजीवाद की श्रेणी में आता है। फंसे कर्जों का झमेला कितना बड़ा है? इसका आकार 10 लाख करोड़ रुपये से कम नहीं है लेकिन इसके लिए किसी भी नेता या बैंक चेयरमैन को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। इनाम एवं दंड का कोई मसौदा नहीं होने से बैंक में नई पूंजी डालने से सार्वजनिक पैसे की यह चोरी ही बढ़ेगी।
 
हाल में संपन्न विधानसभा चुनावों में जीत के बाद तीन राज्यों में सरकार बनाने वाली कांग्रेस ने किसानों का कर्ज माफ कर दिया है। इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की कड़ी आलोचना की गई। राहुल को एक ऐसा लुभावनवादी बताया गया है जिन्होंने भारत को दशकों से गरीबी के गर्त में धकेले रखा। आप चाहें तो ऐसे नेता को 'आर्थिक विध्वंसक' भी कह सकते हैं। यह सच है कि कर्ज माफी योजनाएं सार्वजनिक बैंकों को बुरी तरह प्रभावित करती हैं और एक गलत उदाहरण पेश करती हैं। लेकिन कहीं अधिक बड़ी तस्वीर यह है कि सभी नेता सार्वजनिक बैंकों का कामकाज उसी तरह से चलने के पक्ष में हैं जैसा दशकों से चलता आया है। 
 
वे इन बैंकों को बिना जांच-पड़ताल के कर्ज देने के लिए मजबूर करते हैं जिससे उन पर फंसे हुए कर्ज का बोझ बढ़ जाता है। इसके लिए बैंकों के चेयरमैन, निदेशक मंडल में नेताओं द्वारा नामित सदस्यों, सचिवों एवं नियामकों की कोई जवाबदेही नहीं है। कोई भी उन्हें नेताओं और अफसरों की पहुंच से दूर रहने वाला सक्षम उद्यम नहीं बनाना चाहता है। यहां पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी सरकार के शुरुआती कदम चार राज्यों में 23 गैर-लाइसेंसी जिला सहकारी बैंकों को नई जिंदगी देने का था। इनमें से 16 सहकारी बैंक तो अकेले उत्तर प्रदेश में थे। ये सभी लाइसेंस के बगैर चलने वाले सहकारी बैंक थे। हालांकि नियमों के मुताबिक इन बैंकों को बंद कर देना चाहिए था। इस तरह के निंदनीय कृत्य से आखिर किस तरह का संकेत निकलता है?
 
बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के पीछे की असली मंशा यह थी कि सार्वजनिक बैंक पहले की ही तरह कर्ज देने लगें। लेकिन इसमें थोड़ी विडंबना भी है। पिछले पांच वर्षों में कर्ज आवंटन का परिदृश्य बड़ी तेजी से बदला है। कर्ज आवंटन के बाजार में अब छोटे बैंकों एवं वित्त कंपनियों का दबदबा है। एक वक्त था जब अधिक पूंजी से लैस सार्वजनिक बैंक सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे सकते थे लेकिन अब समय बदल गया है। नई पूंजी डालने के बाद भी इन बैंकों को निजी बैंकों एवं वित्त कंपनियों के हाथों मात खानी पड़ेगी। पुनर्पूंजीकरण का फैसला करने वाले लोग न तो हालात से परिचित हैं और न ही उन्हें इसकी फिक्र ही है। आखिर इस पूरी कवायद में उनका अपना कुछ तो दांव पर लगा नहीं है। उनकी चिंता जल्द आने वाले आम चुनाव हैं। 
Keyword: RBI, shaktikant das, bank, loan, NPA, fund,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सन फार्मा मामले की गहराई से जांच करे सेबी
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.