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नियमों में ढील देना पड़ेगा भारी

अभिजित लेले / मुंबई December 28, 2018

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के नियामकीय नियमों में ढील देने की मांग को अस्वीकार करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने आज चेतावनी दी कि कर्ज भुगतान में चूक और उसके लिए कम प्रावधान के समय में पूंजी पर्याप्तता और जोखिम भारांश के नियमों को जल्दबाजी में नरम बनाना अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकता है। आरबीआई के नए गवर्नर शक्तिकांत दास की अगुआई में भारत में 2017-18 में बैंकिंग क्षेत्र की प्रगति एवं रुझान पर पहली रिपोर्ट जारी करते हुए आरबीआई ने यह बात कही। 
 
रिपोर्ट में कहा गया है कि बेसल 3 नियम संचयी चूक दर (सीडीआर) और वसूली दर के आधार पर विभिन्न तरह के उधारी निवेश के लिए जोखिम भारांश की सिफारिश करता है और यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य नियम हैं। हालांकि भारत में सीडीआर और चूक के कारण नुकसान (एलजीडी) की दर अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी ज्यादा है। ऐसे में बेसल से जुड़े जोखिम भारांश से कर्ज को लेकर वास्तविक जोखिम को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। इसके साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों की ओर से कर्ज के लिए जो मौजूदा प्रावधान किए गए हैं वह अनुमानित नुकसान को समायोजित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अनुमानित नुकसान को समायोजित करने के लिए पर्याप्त बफर महत्त्वपूर्ण मसला है। ऐसा नहीं है कि आरबीआई नियमों में बदलाव को लेकर क्रियाशीलता नहीं दिखा रहा है। इसने पूंजी संरक्षण बफर के तहत अंतिम किस्त को 0.625 फीसदी करने के प्रावधान को लागू करने के लिए एक साल की और मोहलत दी है और इसे अब 31 मार्च 2020 तक पूरा किया जाना है। हालांकि आरबीआई ने दोहराया है कि बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता जरूरत 9 फीसदी रहनी चाहिए।
 
आरबीआई के मुताबिक यह स्वीकार किए जाने की जरूरत है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली में पूंजी स्तर के बरक्स बिना प्रावधान वाले फंसे कर्ज का ऊंचा अनुपात है। हालांकि दिवालिया कानून और संपत्ति के समाधान के लिए संशोधित ढांचा आने के बाद कर्ज अदायगी की चूक और वसूली की दर सुधरी है। हालांकि जोखिम के दोबारा आकलन या न्यूनतम पूंजी जरूरतों के मामले पर सावधानी से गौर करने की जरूरत भी बताई गई है। संरचनात्मक सुधारों के पूरी तरह लागू होने के पहले नियामकीय रियायतें देना और सीडीआर एवं एलजीडी के पर्यवेक्षण पर ठोस सबूत जुटाना अर्थव्यवस्था के हितों के खिलाफ हो सकता है।
 
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी डाली है। पिछले तीन वर्षों में इस अतिरिक्त पूंजी का 70 फीसदी से भी अधिक हिस्सा बैंकों को हुए नुकसान की भेंट चढ़ गया। यह दिखाता है कि कुल पूंजी आधार के संदर्भ में बड़ी राशि होने पर ही बैंकों में डाली गई नई पूंजी कर्ज आवंटन में वृद्धि पर साफ असर डाल सकेगी। त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई (पीसीए) के संदर्भ में यह कहता है कि आरबीआई का पीसीए ढांचा अमेरिका के पीसीए ढांचे पर आधारित है। यूएस-पीसीए ढांचे की सीमा केवल पूंजी पर आधारित है वहीं भारत में इसके अलावा परिसंपत्ति गुणवत्ता और लाभप्रदता संकेतकों को भी ध्यान में रखा जाता है। पीसीए के लिए अतिरिक्त पैमाने भारतीय संदर्भ में इसलिए जरूरी हैं कि यहां के बैंकों का निम्न प्रावधान दायरा अनुपात होने के साथ ही उनके नुकसान का बड़ा हिस्सा बिना प्रावधान के ही रहता है। 
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