बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड को समझना आवश्यक
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आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड को समझना आवश्यक

ओंकार गोस्वामी /  December 27, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक का बोर्ड शक्तिशाली निगरानी संस्था है। नए गवर्नर को इसकी पुरानी स्थिति बहाल करने देना चाहिए तथा तनाव को खत्म करने का अवसर देना चाहिए। बता रहे हैं ओंकार गोस्वामी 

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य को सुर्खियों में रहने का अभ्यास हो चुका है। 26 अक्टूबर, 2018 के ए डी श्रॉफ स्मृति व्याख्यान में उन्होंने जोर देकर आरबीआई की स्वायत्तता की बात कही। 14 दिसंबर को आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की बैठक के दौरान उन्होंने साफ कहा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ इंगलैंड की तर्ज पर बोर्ड की भूमिका में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए बोर्ड का पूरी तरह से पुनर्गठन करना होगा। आचार्य का तात्पर्य यह था कि अगर आरबीआई को पूरी तरह बोर्ड संचालित केंद्रीय बैंक बनाना है तो मौजूदा केंद्रीय बोर्ड की व्यवस्था, ढांचा और नियम काम नहीं आएंगे। 
 
क्या वाकई ऐसा है? आरबीआई अधिनियम 1934 में ऐसा कुछ नहीं है जो यह कहे कि केंद्रीय बोर्ड को केवल मशविरा देने की क्षमता में काम करना हो। इसके विपरीत अधिनियम की धारा 7 (2) में कहा गया है, 'बैंक के कामकाज की सामान्य दिशा और उसका संचालन केंद्रीय निदेशक मंडल में निहित होना चाहिए जो बैंक द्वारा प्रयोग किए जाने वाले समस्त अधिकारों और क्रियाकलापों का संचालन करे।' ऐसे में कानून के मुताबिक केंद्रीय बोर्ड को निगरानी और पर्यवेक्षण की भूमिका निभानी चाहिए। क्या ऐसी प्रक्रियाएं मौजूद हैं जो उसे यह काम प्रभावी ढंग से करने दें। इसका जवाब हां है। 
 
फिलहाल इस बोर्ड में गवर्नर, चार डिप्टी गवर्नर, चार स्थानीय बोर्डों में से प्रत्येक का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य, केंद्र सरकार द्वारा नामित सात सदस्य और वित्त मंत्रालय के दो अधिकारी शामिल हैं। एक वर्ष में कम से कम छह बार और हर तिमाही में एक बार बोर्ड की बैठक होनी आवश्यक है। जरूरत पडऩे पर इसके अलावा भी बैठक की जा सकती हैं। दरें तय करने का काम मौद्रिक नीति समिति के हवाले है जबकि निगरानी का अधिकांश काम उप समितियों के हवाले है। उदाहरण के लिए बोर्ड सदस्यों की एक उप समिति हर बुधवार को बैठक करके आरबीआई के विभिन्न निर्णयों और प्रस्तावों पर चर्चा करती है, उनकी समीक्षा करती है और उनको मंजूरी प्रदान करती है। समिति का गठन रोस्टर के आधार पर होता है। इन साप्ताहिक बैठकों में रोस्टर से इतर भी कोई भी बोर्ड निदेशक भाग ले सकता है। 
 
मेरा कहना एकदम साफ है। जहां तक मेरी समझ है, दरों के निर्धारण के अलावा आरबीआई का कोई बड़ा निर्णय बिना केंद्रीय बोर्ड की मंजूरी के अथवा उसके द्वारा अधिकार प्राप्त संस्थानों के बिना नहीं लिया गया है। इन निर्णयों में 12 फरवरी, 2018 को लिया गया फंसी हुई परिसंपत्तियों की पहचान का निर्णय तथा 13 अप्रैल, 2018 का त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) का ढांचा आदि शमिल हैं। ऐसे में आचार्य को मौजूदा केंद्रीय बैंक से क्या समस्या हो सकती है? मेरा मानना है कि यह बोर्ड की प्रक्रिया से संबंधित नहीं है लेकिन कुछ निदेशक अब तमाम मुद्दों को लेकर प्रबंधन पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि आचार्य ने खुलकर ऐसा नहीं कहा लेकिन इनमें से तीन हैं वित्त मंत्रालय के सुभाषचंद्र गर्ग और राजीव कुमार तथा स्वदेशी जागरण मंच के एस गुरुमूर्ति।
 
आचार्य की शिकायत को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि कैसे आरबीआई ने अतीत में कुछ अहम निर्णय किस प्रकार लिए। शक्तिकांत दास के पहले सन 1991 से तीन गवर्नर आईएएस थे और उन्होंने वित्त मंत्रालय में काफी लंबा अरसा बिताया। विमल जालान आईएएस नहीं थे लेकिन वह बैंकिंग और वित्त सचिव थे। सी रंगराजन के वित्त मंत्रालय के साथ बहुत अच्छे ताल्लुकात थे।  इन गवर्नरों के वित्त मंत्रालय में अपने समकक्षों के साथ अच्छे संबंध रहे लेकिन ब्याज दरों को लेकर उनमें भी मतांतर रहा। उनके बीच स्पष्ट और सुचारु संवाद था और रिजर्व बैंक जो चाहता था वह उसे मिला। इससे ऐसे हालात बने जहां लगातार गवर्नरों को काम करने की जगह मिली और केंद्रीय बोर्ड की भूिमका सलाह देने और तथ्य साझा करने वाली संस्था की रही। यह धारा 7(2) की उसकी भूमिका से विपरीत था। इसी प्रकार बीते कई दशकों के दौरान केंद्रीय बोर्ड के सदस्यों में कई शीर्ष उद्योगपति, कारोबारी नेतृत्वकर्ता और नीतिगत विशेषज्ञ शामिल थे लेकिन इनमें से अधिकांश सक्रिय और जिम्मेदार व्यक्ति के बजाय सलाहकार की भूमिका से प्रसन्न थे। 
 
रघुराम राजन और ऊर्जित पटेल के कार्यकाल में हालात बदल गए। इस दौरान फंसे कर्ज का आकार बहुत बढ़ गया और आरबीआई का सख्ती करना मजबूरी हो गया। आरबीआई सख्त लेखा और आय पहचान मानक अपनाना चाहता था और कमजोर परिचालन वाले बैंकों से जुड़े सुधारात्मक उपाय भी करना चाहता था। सरकार इसमें कुछ रियायत चाहती थी।  राजन केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को लेकर कुछ ज्यादा ही समर्पित थे। ऐसे में कठिन समय में नियामक को वित्त मंत्रालय को जैसी मंजूरी की आवश्यकता थी वह राजन के कार्यकाल के उत्तराद्घ्र्र में देखने को नहीं मिला। परंतु राजन का व्यक्तित्व मजबूत था और वह इससे निपटने में सफल रहे।
 
पटेल की स्थिति ज्यादा थी खराब थी। वह नोटबंदी के मामले में एक समझौता करके पद पर आए और उम्मीद की जा रही थी कि वह थोड़ा समायोजन का रुख दिखाएंगे। परंतु वह भी कम नहीं निकले। बल्कि वह अपने सहयोगियों, कर्मचारियों तथा वित्त मंत्रालय के नौकरशाहों के साथ समुचित संवाद नहीं रखते थे। अगर किसी चर्चा की आवश्यकता होती थी तो वह केवल वित्त मंत्री अथवा प्रधानमंत्री के साथ होता था। जब हर बीतती तिमाही के साथ बैंकिंग संकट बड़ा होता गया तो आरबीआई और वित्त मंत्रालय के बीच का संवाद पूरी तरह समाप्त हो गया। जब आरबीआई ने कड़े उपाय अपनाने शुरू किए तो वित्त मंत्रालय के साथ संंबंध और बिगड़ गए। 
 
शक्तिकांत दास के पद संभालने के बाद हालात बदले हैं। वह एक आईएएस अधिकारी हैं और उनके पास वित्त मंत्रालय का गहन अनुभव है। उन्हें पता है कि सरकार से संवाद कैसे किया जाता है। उन्हें यह भी पता है कि कब और क्या बोलना है। विरल आचार्य को मेरी सलाह यह है कि वह अपने विचार केंद्रीय बोर्ड की बैठकों में रखें और केवल अपनी विशेषज्ञता वाले तकनीकी मसलों पर ही बोलें। दूसरा, उन्हें समझना चाहिए कि तमाम बोर्ड में ऐसे लोग होते हैं जो सर्वज्ञानी होते हैं। एक अच्छा चेयरमैन उनसे निपटना जानता है। मुझे यकीन है कि दास ऐसा कर सकते हैं। तीसरी बात, नए गवर्नर पर भरोसा होना चाहिए। चूंकि वह आईएएस हैं और उन्होंने किसी अमेरिकी विश्वविद्यालय से पीएचडी नहीं की है, मात्र इतने भर से वह पद के अयोग्य नहीं हो जाते। दास संकट को हल करके आरबीआई की प्रतिष्ठा को बचा सकते हैं। आचार्य को इन बातों पर यकीन करना चाहिए। 
 
(लेखक अर्थशास्त्री और सीईआरजी एडवाइजरी प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)
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