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अर्थशास्त्र पर राजनीति का असर तय करेगा बाजार का रुख

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  December 26, 2018

अगले छह महीनों में निवेशकों का ध्यान कॉर्पोरेट आय पर कम और घरेलू राजनीति एवं वैश्विक भू-राजनीति पर अधिक रहेगा। देश में चुनाव नजदीक आने के साथ ही राजनीति अधिक लोकलुभावन होती जाएगी और सांप्रदायिक हिंंसा जैसे गतिरोध पैदा होने की आशंका अधिक होगी। वैश्विक मोर्चे पर अमेरिकी राष्ट्रपति का रुझान अतार्किक फैसलों की तरफ अधिक रहेगा क्योंकि उनकी कारोबारी गतिविधियों एवं चुनाव अभियान में कथित धांधली को लेकर 17 जांचें चल रही हैं। मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के लिए फंड जुटाने को लेकर डॉनल्ड ट्रंप की कवायद ने अमेरिकी सरकार को लगभग ठप कर दिया है। उनकी सनक वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती है। चीन के साथ जारी कारोबार युद्ध पर केवल विराम ही लगा है। इससे ऊर्जा कीमतोंं में अस्थिरता बढ़ सकती है। अफगानिस्तान और सीरिया में तैनात अमेरिकी सेना वापस बुलाने से इन देशों में अस्थिरता बढ़ सकती है। 

 
ब्रेक्सिट भी अपने तमाम निहितार्थों के साथ वैश्विक कारोबार को प्रभावित करेगा। ब्रेक्सिट लागू होने से यूरोपीय संघ की किस्मत भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाएगी। जहां तक भारतीय व्यापार का सवाल है तो ब्रेक्सिट के सख्त होने का परिणाम या तो यूरोपीय संघ के अन्य देशों (संभवत: आयरलैंड) को अधिक आवंटन के रूप में सामने आएगा या फिर यूरोपीय संघ को नुकसान होगा।  केंद्रीय बैंकों के इस महीने के तीन बड़े फैसले 2019 में मौद्रिक रुझान तय कर सकते हैं। फेडरल रिजर्व ने मुद्रास्फीति एवं वृद्धि आकलन को कम करते हुए अमेरिकी डॉलर की नीतिगत दर को फिर बढ़ा दिया है। इसके अलावा फेड रिजर्व अपनी मात्रात्मक सख्ती को भी जारी रखेगा।
 
यूरोपीय सेंट्रल बैंक जनवरी में अपना मात्रात्मक सुगमता कार्यक्रम रोक देगा लेकिन अपना पोर्टफोलियो परिपक्व होने पर यह उसमें दोबारा निवेश करेगा। इसका प्रभाव सख्त मुद्रा तरलता को कड़ा करने के रूप में पड़ेगा।  इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपना मुक्त बाजार परिचालन बढ़ाने के लिए 600 अरब रुपये मूल्य के बॉन्ड प्रति माह खरीदना चाहता है। यह यूरोपीय संघ के मात्रात्मक सुगमता कार्यक्रम की तरह ही है। लेकिन यूरो एवं अमेरिकी डॉलर के उलट रुपया पूर्ण परिवर्तनीय नहीं है। लिहाजा जहां इससे जोखिम लेने की आदत बढऩी चाहिए वहीं रुपया निवेशकों के लिए सुरक्षा आवरण उतना सुदृढ़ नहीं है। शुद्ध एफपीआई के जरिये रुपया परिसंपत्ति की बिक्री चुनाव तक जारी रह सकती है।
 
सरकार को नकदी की सख्त जरूरत है और सरकारी उधारी अतिरिक्त तरलता का बड़ा हिस्सा हजम कर जाएगी जिससे तरलता घाटा हो सकता है। खर्च बढ़ा है, जीएसटी संग्रह अनुमान से 40 फीसदी कम चल रहा है और नवीनतम युक्तिसंगत योजनाओं के चलते इसमें और कमी आ सकती है। सार्वजनिक बैंकों में नई पूंजी डालने के साथ-साथ किसान कर्ज माफी जैसे लुभावने कदमों की भी घोषणा की गई है। सरकार विनिवेश के जरिये फंड जुटाने के लिए अधिक विकल्पों पर गौर कर रही है। पीएफसी-आरईसी सौदे के अलावा रेलवे की दो अनुषंगी इकाइयों के आईपीओ आने वाले हैं और सार्वजनिक उपक्रमों के ईटीएफ भी आने वाले हैं। आरबीआई से अंतरिम लाभांश के बारे में कोई भी राय इस पर निर्भर करती है कि आप आर्थिक मामलों के सचिव या वित्त मंत्री में से किस पर यकीन करते हैं। वैसे यह तय है कि आरबीआई के आरक्षित कोष में से अधिकतम राशि जुटाने की कोशिश होगी। 
 
रुपये की किस्मत तेल कीमतों से जुड़ी रहेगी। पिछले पखवाड़े कच्चे तेल में उतार-चढ़ाव रहा है क्योंकि आपूर्ति या मांग के बारे में तस्वीर साफ नहीं है। तेल निर्यातक देश आपूर्ति में अनुमान से अधिक कटौती कर सकते हैं। लेकिन वैश्विक वृद्धि धीमी पडऩे की सूरत में मांग गिर सकती है। अमेरिकी शेल खनिक कीमतों की सीमा रखते हैं क्योंकि वे तेजी से उत्पादन बढ़ा सकते हैं। वे कीमतों की एक निचली सीमा भी रखते हैं क्योंकि शेल खनन महंगा है और कीमतें गिरने पर उत्पादन भी कम कर देते हैं। इसके अलावा घट-बढ़ का कारक भी है। रुपये की अस्थिरता का पहलू भी है। ओपेक देश अपनी मौजूदा नीति की समीक्षा कर सकते हैं और आपूर्ति बढऩे पर वे उत्पादन में कटौती भी कर सकते हैं।
 
बैंकों में नई पूंजी डालने की योजना एक मरहम पट्टïी साबित हो सकती है। इससे सार्वजनिक बैंक उस अवधि में फिर से कर्ज बांटने लायक हो जाएंगे जब लोकलुभावन कदमों के लिए फंड जुटाने होंगे। आईएलऐंडएफएस के ऑडिट को लेकर आई अपुष्ट खबरें यही बता रही हैं कि वहां पर हालात कहीं अधिक खराब हैं। ऐसे में गैर-बैंकिंग वित्त कंपनी (एनबीएफसी) क्षेत्र को लेकर अधिक घबराहट रहेगी। इक्विटी की खुदरा प्रतिबद्धता म्युचुअल फंड प्रवाह की राह पर है। स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों का भाव दिसंबर में तीन महीनों के शीर्ष पर रहा है जो मजबूत घरेलू धारणा को दिखाता है। अगर मुक्त बाजार परिचालन काम करता है तो यह बॉन्ड प्रतिफल को कम कर सकता है और इससे स्टॉक को अधिक मूल्यांकन भी मिल सकता है।
 
दिसंबर में इक्विटी बाजार में उठापटक रही है। निफ्टी और सेंसेक्स का स्मॉलकैप शेयरों से कटाव दिखा है। वर्ष 2018 में निफ्टी ने आंशिक रूप से सकारात्मक रिटर्न दिया है तो स्मॉलकैप के लिए यह काफी नकारात्मक रहा है। ऐसा लगता है कि बीएसई 500 के लिए यह साल सबसे खराब साल में से एक रहेगा। निफ्टी 10,400-11,000 के दायरे में कारोबार कर रहा है और थोड़ी घटबढ़ भी पांच फीसदी का अंतर पैदा कर सकती है। इतिहास बताता है कि चुनावों के पहले कारोबारी रुख नकारात्मक रहता है लेकिन नई सरकार बनते ही धारणा सकारात्मक हो जाती है।
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