बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी के लिए खास नियमन की नहीं जरूरत
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एनबीएफसी के लिए खास नियमन की नहीं जरूरत

अजय शाह /  December 26, 2018

गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) और बैंकों में बुनियादी अंतर है। उनके साथ एक जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
बड़े प्राथमिक शेयर और डेट (बॉन्ड) बाजार अनुभव की कमी के मोहताज नहीं हैं। बस प्राथमिक बाजार में अगर किसी चीज की दरकार है तो वह है पारदर्शी व्यवस्था की। यह शर्त पूरी होने के बाद इसमें काम करने वाले पेशेवर वित्तीय सुरक्षा और सूचनाएं नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त ढांचा खड़ा कर सकते हैं। बैंकों और बॉन्ड के माध्यम से रकम जुटाने वाली गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के कामकाज पर नजर रखने के लिए किसी सूक्ष्म नियमन व्यवस्था की जरूरत नहीं है। अगर कोई एनबीएफसी किसी ग्राहक को उधार देती हैतो उस स्थिति में इस बात पर नजर रखने की जरूरत होगी कि ग्राहकों के साथ किस तरह का वित्तीय व्यवहार हो रहा है। 
 
जब से आईएलऐंडएफएस ऋण अदा करने से चूकी है तब से एनबीएफसी को लेकर चारों तरफ हाय-तौबा मची हुई है। इन सब के बीच हमें बाजार की विफलताओं को समझने और एक कारगर नियामकीय उपाय करने को लेकर सतर्क रहना चाहिए। शुरुआत एनबीएफसी के उधारी ढांचे से करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ज्यादातर एनबीएफसी के लिए ग्राहकों से जमा रकम (डिपॉजिट) लेने पर रोक लगा दी क्योंकि  यह अधिकार (डिपॉजिट लेने का) बैंकों को दिया गया है। भविष्य में जमा रकम लेने वाली एनबीएफसी बैंकों में तब्दील होंगी और इस प्रक्रिया में कुछ मुद्दे जरूर उभरते हैं। हालांकि इसे लेकर कोई मुश्किल नहीं नजर आ रही हैं। पिछले साल जिन एनबीएफसी को दिक्कतें पेश आईं, वे जमा रकम लेने वाली नहीं थीं। 
 
आखिर एनबीएफसी लोगों से उधार नहीं लेती हैं तो इसके लिए पूंजी का स्रोत क्या है? प्राथमिक शेयर और बॉन्ड बाजार पूंजी के स्रोत हैं। यह ताना-बाना किस तरह काम करना चाहिए इसके लिए हमारे पास आवश्यक कायदे मौजूद हैं। इस बाजार में एक मात्र वित्तीय प्रहरी निवेशक हैं और इनसे रकम निकालने में आने वाली रुकावटों से किसी भी कंपनी को निपटना है। यह बात केवल एनबीएफसी तक ही सीमित नहीं है। आधुनिक पूंजीवाद के इस युग में शेयर और बॉन्ड बाजार प्रमुख वित्तीय सुरक्षा प्रहरी हैं। जो परियोजनाएं और प्रबंधन टीमें प्राथमिक बाजार का विश्वास जीतती हैं केवल वे ही रकम जुटा पाती हैं। पूंजी आवंटन के लिए यह एक स्वस्थ एवं कारगर बाजार प्रणाली है। प्राथमिक बाजार में पुख्ता खुलासा व्यवस्था की सर्वाधिक जरूरत है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को यह अनिवार्य तौर परिभाषित करना चाहिए कि खुलासे में क्या-क्या बातें होनी चाहिए और सूचनाएं गलत होने की स्थिति में धोखाधड़ी निरोधी कानून का सहारा लिया जाना चाहिए। हमें परिसंपत्तियों के बाजार आधारित मूल्यांकन के लिए इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स (आईएफआरएस) की दूरगामी शैली अपनानी चाहिए। आईएफआरएस अंकेक्षण आंकड़ों से लैस कोई एनबीएफसी बॉन्ड बाजार से पूंजी जुटाना चाहती है तो यह ठीक वैसा है जैसे टाटा स्टील जैसी बड़ी कंपनी रकम जुटाती है। 
 
आईएलऐंडएफएस के फिसलने के बाद भारतीय बॉन्ड बाजार एनबीएफसी के बॉन्ड को लेकर काफी चिंतित हो गए। इससे एनबीएफसी के लिए परिस्थितियां जटिल हो गई हैं। बॉन्ड बाजार में निवेश करने वालेक्रेडिट रेटिंग से इतर अब प्रत्येक कंपनियों से कठिन सवाल पूछ रहे हैं। बेहतर एनबीएफसी रकम जुटा पा रही हैं, जबकि खस्ताहाल इकाइयों के लिए हालात प्रतिकूल हो गए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बाजार की जवाबी प्रतिक्रिया शायद जरूरत से ज्यादा कठोर है, लेकिन विभिन्न स्थितियों के प्रति बाजार का भी अपना एक रवैया होता है। एनबीएफसी इस मायने में बैंकों से अलग हैं कि वे कम अनुभवी ग्राहकों से कोई वादा नहीं करती हैं। जब कोई इकाई या व्यक्ति बैंक में रकम जमा करता है तो बैंक उसे आश्वस्त करता है कि इस रकम पर उसे निश्चित प्रतिफल मिलेगा। बैंक अपने वादे पर खरा उतरे इसके लिए सूक्ष्म और समझ-बूझ भरे नियमन की जरूरत होती है। इसके विपरीत एनबीएफसी लोगों से ऐसा कोई वादा नहीं करती है, इसलिए उनके लिए सूक्ष्म नियमन की आवश्यकता नहीं है। बैंक और बॉन्ड बाजार टाटा स्टील या एचडीएफसी के कर्ज लेने की सीमा तय करते हैं और हमें इन कंपनियों के लिए अधिकतम उधार की सीमा तय करने के लिए सरकार की जरूरत नहीं है। अब महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अगर सारी चीजें इतनी स्वस्थ और पारदर्शी हैं तो हमारे सामने एनबीएफसी/बॉन्ड बाजार/म्युचुअल फंड से जुड़े संकट क्यों मुंह बाए खड़े हैं? सबसे पहला कारण आईएफआरएस अंकेक्षण का अभाव है। अगर बाजार आधारित दूरदर्शी मूल्यांकन प्रक्रिया का इस्तेमाल हुआ होता तो आईएलएफएस की बिगड़ती हालत का इल्म एक साल पहले ही लग जाता और बाजार तक इसकी पहुंच थम गई होती। 
 
दूसरा पहलू था वित्तीय नियमन में क्रेडिट रेटिंग के इस्तेमाल का। भारत जैसे देश में संस्थागत निवेशक खराब निर्णय लेने के बाद प्रतिकूल परिणाम का ठीकरा क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों पर फोड़ देते हैं। किसी कंपनी के बारे में क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां मूल्यवान सुझाव देती हैं, लेकिन इन्हें किसी बात की गारंटी नहीं समझा जाना चाहिए। संस्थागत निवेशकों को पहले अपना आकलन करना चाहिए और फिर वे तय कर सकते हैं कि क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया में क्रेडिट रेटिंग लेने की जरूरत है या नहीं। भारतीय बॉन्ड बाजार का पूर्ण विकास नहीं हो पाना एक तीसरा पहलू था। शेयर बाजार भारत में बेहतर तरीके से काम करने वाला वित्तीय बाजार है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग, मुफ्त प्रवेश, डेरिवेटिव, अल्गोरिदमिक कारोबार, विदेशी निवेशक, शॉर्ट सेलिंग आदि से जुड़ी सुविधाएं हैं। यह बाजार तरलता देने के साथ बेहतर कीमतों की भी पेशकश करता है, साथ ही म्युचुअल फंड उद्योग के विकास की संभावनाओं से भी भरपूर है। बॉन्ड बाजार में ये सभी खूबियां नहीं हैं। भारतीय अर्थतंत्र में म्युचुअल फंड की बुनियाद एक कच्ची जमीन पर रखी गई है। इससे म्युचुअल फंडों के लिए चुनौतियां बढ़ गईं और एनबीएफसी के बॉन्ड की कीमतों में तेज गिरावट आई। 
 
एनबीएफसी के संदर्भ में वित्तीय नियमन के बारे में कुछ अहम पहलुओं पर गौर किया जाए। सभी वित्तीय नियमन चार खंडों- बाजार तंत्र से जुड़े जोखिमों का नियमन, समाधान, सूक्ष्म नियमन और उपभोक्ता सुरक्षा हैं। 
 
प्रणालीगत जोखिम : जब किसी एनबीएफसी का बहीखाता जीडीपी का 1 प्रतिशत से अधिक पार करता है तो इसके भुगतान में चूक करने से पूरे वित्तीय तंत्र पर असर पड़ता है। ऐसे में कुछ सूक्ष्म नियमन की जरूरत पैदा होती है। 
 
समाधान : वित्तीय इकाइयों को 'रिजॉल्यूशन कॉर्पोरेशनÓ परिचालित एक विशेष दिवालिया संहिता की जरूरत है। इसके बिना आईएलएफएस जैसी घटनाएं रोक पाना मुमकिन नहीं होगा। 
 
सूक्ष्म नियमन : हमें एनबीएफसी के लिए सूझ-बूझ वाले सूक्ष्म नियमन की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे लोगों से किसी तरह का वादा नहीं करती हैं। 
 
उपभोक्ता संरक्षण : कुछ एनबीएफसी ऐसे ग्राहकों के साथ कारोबार करते हैं, जिन्हें पर्याप्त अनुभव नहीं होता है।  लिहाजा इनके हितों की सुरक्षा की जरूरत है। इसमें ब्रिकी से जुड़े व्यवहार और बलपूर्वक वसूली के तरीके शामिल होते हैं। 
 
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि एनबीएफसी बैंक की तरह हैं, लेकिन बुनियादी अंतर यह है कि बैंक ग्राहकों को उनकी जमा रकम पर प्रतिफल देने को लेकर आश्वस्त करते हैं। एनबीएफसी ऐसा कोई वादा नहीं करती हैं। आईएलऐंडएफएस की तुलना भूषण स्टील से की जा सकती है ना कि मुश्किल दौर से गुजर रहे किसी बैंक से। आरबीआई को केवल महंगाई के आंकड़ों और सुरक्षित बैंकिंग प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)
Keyword: NBFC, bank, micro finance,,
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