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समता के सबक

संपादकीय /  December 26, 2018

विश्व आर्थिक मंच वर्ष 2006 के बाद से हर साल दुनिया में महिला और पुरुष के बीच असमानता पर रिपोर्ट जारी करता है। रिपोर्ट में देशों का आकलन इस सूचकांक पर किया जाता है कि आर्थिक भागीदारी एवं अवसर, शैक्षणिक स्तर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और राजनीतिक सशक्तीकरण के आयाम पर पुरुषों एवं महिलाओं के बीच कितनी समानता है। इस रिपोर्ट के नवीनतम संस्करण में शामिल 149 देशों में से भारत को 108वां स्थान दिया गया है। नीति-निर्माताओं का ध्यान इस रिपोर्ट पर जाना चाहिए क्योंकि भारत में लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करने के प्रयासों में ये आंकड़े मार्गदर्शक का काम कर सकते हैं। इस रिपोर्ट का अहम निहितार्थ यह है कि राजनीतिक सशक्तीकरण एवं आर्थिक भागीदारी की श्रेणियां लैंगिक समानता में अधिकतम विचलन पैदा करती हैं। लैंगिक फासले का वैश्विक औसत 68 फीसदी है जो पिछले साल की तुलना में मामूली रूप से सुधरा है। दूसरे शब्दों में, महिला एवं पुरुष के बीच अब भी 32 फीसदी का अंतर है जिसे दूर करना बाकी है। लेकिन राजनीतिक सशक्तीकरण श्रेणी में लैंगिक अंतर 77 फीसदी से अधिक है जबकि आर्थिक भागीदारी के मामले में महिला-पुरुष के बीच 44 फीसदी का फासला है। विश्व आर्थिक मंच के अनुमानों के मुताबिक, राजनीतिक सशक्तीकरण में मौजूद लैंगिक अंतर को दूर करने में 200 साल तक लग जाएंगे।

 
हालांकि भारत दुनिया के उन देशों में है जिसने महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की दिशा में अच्छा प्रदर्शन किया है। इस मोर्चे पर भारत सूची में शामिल देशों में 20वें स्थान पर है। भारत की यह रैंकिंग पिछले साल के बराबर ही है लेकिन उसका कुल स्कोर वर्ष 2017 की तुलना में थोड़ा कम हुआ है। इसी वजह से भारत दक्षिण एशिया के छह देशों में से चौथे स्थान पर खिसक गया। यह खासा निराशाजनक है क्योंकि एक क्षेत्र के तौर पर दक्षिण एशिया का लैंगिक समानता अंक (66 फीसदी) वैश्विक औसत से कम है। हालांकि दक्षिण एशियाई देश सामूहिक रूप से पूर्वी एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र के अपेक्षाकृत समृद्ध देशों से अधिक पीछे नहीं हैं लेकिन शीर्ष 10 देशों की सूची में रवांडा एवं निकारागुआ जैसे निर्धनतम देशों को देखें तो यह खुद को खुशफहमी में रखने जैसा ही है।
 
तुलनात्मक रूप से नीची रैंकिंग होने से भी अधिक फिक्र करने वाली बात भारत के लिए यह है कि इसका समग्र स्कोर वर्ष 2006 के बाद से ही लगातार सुधरा है लेकिन चार में से दो श्रेणियों में लैंगिक अंतर की स्थिति बिगड़ी ही है। ये श्रेणियां स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और आर्थिक भागीदारी एवं अवसर की हैं। सूचकांक लैंगिक समानता के लिए शून्य (पूर्ण असमता) से एक अंक (समता) के बीच नंबर देता है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारत इस साल वह 147वें स्थान तक लुढ़क चुका है जबकि वर्ष 2006 में 103वें स्थान पर था। वहीं आर्थिक भागीदारी एवं अवसर के मामले में भारत की लैंगिक समानता रैंकिंग 2006 के 110वें स्थान से खिसकते हुए 142वें स्थान पर आ चुकी है। खासकर, इस अवधि में सभी आर्थिक पैमानों पर भारत की तीव्र प्रगति होने के बावजूद आर्थिक भागीदारी में महिलाओं की हिस्सेदारी कम होना खतरे की घंटी है। 
 
स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत अपने पड़ोसी देश श्रीलंका से सबक ले सकता है जो इस श्रेणी में 2006 से ही दुनिया में नंबर एक स्थान पर बना  हुआ है। वहीं आर्थिक जगत में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के मामले में बांग्लादेश और श्रीलंका का प्रदर्शन भारत से बेहतर रहा है जबकि पहले उनकी भी हालत खस्ता थी। भारत बांग्लादेश या रवांडा जैसे देशों में लैंगिक समानता लाने की कोशिशों से सीखकर खुद को बेहतर कर सकता है।
Keyword: WEF, male, female, health,,
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