बिजनेस स्टैंडर्ड - परिवार नियंत्रित फर्मों में उत्तराधिकार की चुनौती
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परिवार नियंत्रित फर्मों में उत्तराधिकार की चुनौती

पवन लाल / मुंबई 12 25, 2018

बड़ी कंपनियों का संचालन नए चेहरे द्वारा किया जाएगा

बिजनेस स्टैंडर्ड परिवार नियंत्रित फर्मों में उत्तराधिकार की चुनौतीनिकट भविष्य में भारत की बड़ी कंपनियों और समूहों के प्रमुख सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, ऐसे में उनके उत्तराधिकार की योजना खासी अहम होगी। कॉर्न फेरी और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के हालिया अध्ययन के मुताबिक सर्वेक्षण में शामिल 43 फीसदी से भी कम कंपनियों के निदेशक मंडल ने बताया कि उन्होंने शीर्ष नेतृत्व के लिए स्पष्ट उत्तराधिकारी की पहचान कर ली है। स्मॉलकैप फर्मों में से केवल एक-तिहाई ने शीर्ष पद के लिए उत्तराधिकारी को चिह्नित किया है।

एगोन जेंडर के भारत कार्यालय में मैनेजिंग पार्टनर पल्लवी कथुरिया ने कहा, 'भारत की कुछ बड़ी कंपनियों में नेतृत्व के लिए उत्तराधिकार की योजना नहीं होना गंभीर समस्या है।' इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि कंपनी कहां जा रही है और उसकी व्यापक रणनीति क्या है? उसके बाद भावी नेतृत्व से क्या अपेक्षाएं होंगी उसे परिभाषित किया जा सकता है।

औसतन बड़ी कंपनियों में चेयरमैन के सेवानिवृत्ति की कोई निर्धारित उम्र नहीं है लेकिन जब वे उत्तराधिकारी तलाश लेते हैं तो पद छोड़ देते हैं। शार्दूल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर डी दत्ता ने कहा कि आमतौर पर 60 साल की उम्र में पद छोडऩे की उम्मीद की जाती है लेकिन कई 65 साल तक और कुछ तो 70 साल की उम्र तक पद पर बने रहते हैं क्योंकि उन्हें यह भरोसा होता है कि वे अपना उत्तराधिकारी तलाश लेंगे। उन्होंने कहा, 'अगले दस साल में भारत के बड़े संगठनों का परिचालन पूरी तरह नए चेहरों द्वारा किया जाएगा।'

बड़ी कंपनियों को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटा जा सकता है। परिवार द्वारा परिचालित कंपनी जिसमें कई पीढिय़ां शामिल होती हैं, जिनमें गोदरेज समूह, मुरुगप्पा समूह और टाटा समूह शामिल हैं। दूसरी श्रेणी में ऐसा कारोबारी समूह आता है जिसका परिचालन एक शीर्ष व्यक्ति द्वारा किया जाता है। इनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, विप्रो और महिंद्रा समूह का नाम आता है। तीसरी श्रेणी की कंपनियों का परिचालन पेशेवर नेतृत्व द्वारा किया जाता है। ऐसी कंपनियों में लार्सन ऐंड टुब्रो, मारुति सुजूकी आदि आती हैं। उत्तराधिकार योजना पर एगोन जेंडर की रिपोर्ट के अनुसर परिवार द्वारा नियंत्रित कारोबार का वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी है और यह काफी प्रभावशाली है लेकिन इसमें जोखिम भी बहुत है।

यही वजह है कि केवल 30 फीसदी पारिवारिक कारोबार ही दूसरी पीढ़ी तक टिका रहता है और 12 फीसदी तीसरी पीढ़ी तक चलते हैं और चौथी पीढ़ी तक आते-आते ऐसी कंपनियां महज 3 फीसदी रह जाती हैं। ऐसे समूहों के लिए उत्तराधिकारी तलाशना जटिल होता है। इसके साथ ही सर्वोच्च नेतृत्व वाली दूसरी श्रेणी की कंपनियों में भी शीर्ष भूमिका में किसी दूसरे को नियुक्त करना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।

ऐसा इसलिए भी होता है कि उद्योग के अगुआ जैसे कि मुकेश अंबानी, अजीम प्रेमजी और आनंद महिंद्रा जैसे कद के व्यक्ति की जगह किसी दूसरे को कंपनी की कमान देना कठिन होता है। कार्याधिकारी तलाश करने वाली फर्म स्पेंसर स्टुअर्ट इंडिया की सदस्य रितु कोछड़ ने कहा कि उत्तराधिकारी के बारे में सेवानिवृत्ति के दस साल पहले ही विचार करना शुरू कर देना चाहिए न कि सेवानिवृत्त होने के तीन साल पहले इसकी कवायद शुरू करनी चाहिए।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी समूह उत्तराधिकार योजना में देरी करते हैं। मैरिको के चेयरमैन हर्ष मरीवाला ने अपनी जिम्मेदार कंपनी के मुख्य कार्याधिकारी सौगत कुमार को सौंप दी और सार्वजनिक तौर पर बयान दिया कि 'सौगत मुझसे बेहतर हैं।' आदि गोदरेज ने कुछ साल पहले कंपनी की कमान पेशेवर प्रबंधकों को सौंप दी।

टाटा संस के पूर्व अधिकारी आर गोपालकृष्णन ने कहा कि यह धारणा कि शीर्ष भूमिका संभालने वाले लोग ज्यादा नहीं हैं। कथुरिया भी इससे सहमत हैं। दत्ता ने कहा कि एक चुनौती यह है कि कंपनी के प्रमुख पेशेवर को कंपनी में लाना तो चाहते हैं लेकिन उनके द्वारा अहम निर्णय लेने से सहज नहीं होते हैं और कुछ यह भी चाहते हैं कि वे मार्गदर्शक या संरक्षक की भूमिका में उनसे जुड़े रहें।

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